हमारे आसपास जो गिग वर्कर यानी डिलीवरी पार्टनर, टैक्सी राइडर या कैब ड्राइवर घूम रहे होते हैं. उनके बारे में सोशल मीडिया पर बहुत सी बातें कही जाती हैं, उनकी कमाई को लेकर कई दावे भी होते हैं. लेकिन सबकुछ इतना आसान नहीं है. ज़रूरी नहीं कि आपने किसी राइडर को 200 रुपये की पेमेंट की हो, तो वो पूरे पैसे उसके खाते में गए हो. आपकी पेमेंट और उसकी जेब में जाने वाली रकम में ज़मीन आसमान का अंतर होता है.
गिग वर्क प्लेटफॉर्म्स जैसे जेप्टो, स्विगी और उबर पर डिलीवरी पार्टनर्स की कुल कमाई कई हिस्सों को मिलाकर तय होती है. इसका पूरा स्ट्रक्चर बेस पे, इंसेंटिव्स, टिप, बोनस और लागू कटौतियों पर टिका होता है.
कमाई का मेन गणित ये है कि किसी पार्टनर को हर ऑर्डर पर मिलने वाली बेस पेमेंट के साथ अलग-अलग तरह के इंसेंटिव्स, कस्टमर टिप और बोनस जोड़े जाते हैं. इसके बाद लागू कटौतियां घटाई जा सकती हैं. इसी आधार पर कुल पेआउट तय होता है. इसकी अलग-अलग लेयर आप समझिए…
1. बेस पे: ये किसी भी ऑर्डर को पूरा करने पर मिलने वाली न्यूनतम राशि होती है. इसकी गणना पिकअप लोकेशन से स्टोर या रेस्तरां जाने और वहां से ग्राहक तक ऑर्डर पहुंचाने में तय की गई दूरी और लगे समय के आधार पर होती है. इसके साथ सड़क का ट्रैफिक, मौसम की स्थिति और उस समय मांग कितनी है, इसे भी ध्यान में रखा जाता है.
2. इंसेंटिव्स: इंसेंटिव्स पार्टनर्स को टारगेट पूरे करने या व्यस्त समय में काम करने के लिए दिए जाते हैं. इसमें टारगेट या ट्रिप इंसेंटिव शामिल है, जिसके तहत दिन या सप्ताह जैसी तय समयसीमा में एक निश्चित संख्या में ऑर्डर पूरे करने पर अलग से बोनस राशि मिलती है. वहीं पीक आवर या सर्ज पे के तहत दोपहर या रात के भोजन के समय और खराब मौसम जैसे बारिश में काम करने पर प्रति ऑर्डर अतिरिक्त राशि जुड़ती है.
3. टिप: ग्राहक द्वारा ऐप पर दिया गया टिप पूरी तरह से डिलीवरी पार्टनर को मिलता है. प्लेटफॉर्म्स टिप की राशि में से कोई कटौती नहीं करते हैं और इसे पार्टनर की कमाई में सीधे जोड़ दिया जाता है.
4. जॉइनिंग और रेफरल बोनस: रेफरल बोनस नए साथियों या दोस्तों को ऐप पर जुड़वाने और उनके द्वारा निश्चित संख्या में ऑर्डर पूरे करने पर मिलता है. जॉइनिंग या गारंटी ऑफर के तहत नए पार्टनर्स को शुरुआती चरण में निश्चित ट्रिप्स पूरा करने पर गारंटीड राशि या प्रमोशनल रिवॉर्ड दिया जाता है.
कुल कमाई का समीकरण इस तरह समझा जा सकता है. कुल कमाई बराबर बेस पे, इंसेंटिव्स या सर्ज, कस्टमर टिप और बोनस का जोड़, जिसमें से लागू कटौती या टैक्स घटाया जाता है. नोट के तौर पर, कुल कमाई में से ऑनबोर्डिंग फीस, टी-शर्ट या बैग का शुल्क, या लागू टैक्स जैसी कटौतियां की जा सकती हैं. यानी डिलीवरी पार्टनर की अंतिम कमाई कई हिस्सों को मिलाकर बनती है और उसमें कटौतियां भी शामिल हो सकती हैं.
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