'हम अफसर बनने आए थे, नेताजी बना दिए गए' JPSC प्रोटेस्ट में बैठे टॉपर ने बताई आपबीती

झारखंड में ज्यादातर साधारण मध्यम वर्गीय पर‍िवार अपने बच्चों के ल‍िए एक ही सपना देखते हैं. वो सपना है एक जेपीएससी या जेएसएससी जैसी भर्ती परीक्षा क्ल‍ियर करो या कोई और प्रतियोगी परीक्षा न‍िकालो और सरकारी नौकरी पा लो. लेकिन जब पेपरलीक और धांधली जैसी मुश्क‍िलें आती हैं तो क‍िताबें उठाने वाले छात्र आंदोलन में उतर जाते हैं. ऐसे ही एक छात्र की आपबीती यहां पढ़‍िए.

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छात्र शहबाज नौकरी का सपना देखकर आए थे मिली नेतागीरी की राह छात्र शहबाज नौकरी का सपना देखकर आए थे मिली नेतागीरी की राह

मानसी मिश्रा

  • रांची ,
  • 07 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:31 AM IST

पाकुड़ के गांव इल्मी का वो लड़का जिसने अपनी स्कूल की हर क्लास में टॉप किया. जिसका नाम एमएससी (M.Sc.) और एम.एड (M.Ed.) की डिग्री में अव्वल रहा और जो यूनिवर्सिटी का सेकंड टॉपर बना... आज उसकी पहचान बदल चुकी है. वह अफसर बनने रांची की लॉज में आया था, लेकिन आज जब गांव लौटता है तो लोग उसे 'साहब' नहीं, ताने मारते हुए 'नेताजी' कहकर बुलाते हैं.

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यह सिर्फ पाकुड़ के शाहबाज हुसैन की कहानी नहीं है, बल्कि रांची के 10x10 के कमरों में उबले चने खाकर दिन काट रहे उन हजारों युवाओं का सच है, जिनकी किताबें अब धरना स्थलों की धूप और बारिश में भीग रही हैं.

'स्कूल टॉपर से नेताजी बनने तक का सफर'
aajtak.in से बातचीत में शाहबाज बताते हैं कि कैसे एक होनहार छात्र का मनोबल सिस्टम की दीमक ने चाट लिया. उनकी आपबीती उनके बचपन के सपने से शुरू हुई. वो बताते हैं कि मैं बचपन से पढ़ाई में तेज था. स्कूल टॉपर रहा, ग्रेजुएशन में भी सेकंड टॉपर. फिर सोच-समझकर अधिकारी बनने का सपना लेकर पीसीएस (JPSC) की तैयारी में जुट गया. लेकिन आयोग की खस्ताहाली और पेपर लीक के सिंडिकेट ने ऐसा तोड़ा कि आज सड़कों पर खड़ा होना पड़ रहा है.

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वे आगे कहते हैं कि जब महीनों की मेहनत के बाद खबर आती है कि पेपर रद्द या लीक हो गया, तो लगता है जिंदगी का एक हिस्सा छिन गया. आज जब अपने हक के लिए सड़क पर उतरते हैं, तो लोग ताने मारते हैं, 'लो, नेताजी आ गए!' घर वाले भी डरते हैं, दूर रहने की नसीहत देते हैं. पर अब मुझे अपने हक के लिए लड़ने में कोई शर्म नहीं है. अगर सच बोलना नेतागिरी है, तो हां, मैं नेताजी ही सही!"

घर के ताने, सीमित बजट और 'मानसिक अवसाद' की मार

रांची की लॉज में दिन गिन रहे छात्रों के लिए हर महीना एक नया आर्थिक और मानसिक युद्ध लेकर आता है. सीमित पारिवारिक साधनों के बीच हर महीने मकान मालिक का किराया, राशन और किताबों का खर्च जुटाना किसी चुनौती से कम नहीं है.

शहबाज कहते हैं कि जब भी गांव जाओ, तो पड़ोसियों और रिश्तेदारों के चुभते सवाल सामने होते हैं, जब वो पूछते हैं कि 'और कब तक तैयारी चलेगी?' ये सवाल दिल को छलनी कर देते हैं. शाहबाज बताते हैं कि इस अनिश्चितता और डिप्रेशन की वजह से उनके कई साथियों ने पढ़ाई छोड़ दी और घर लौट गए. यह पूछे जाने पर कि क्या कभी सब कुछ छोड़कर भाग जाने का ख्याल आता है? शाहबाज का जवाब बेहद भावुक कर देने वाला है. 

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वो कहते हैं कि तनाव जब हद से बढ़ जाता है, तो लगता है कि सब छोड़कर वापस लौट जाऊं. लेकिन फिर मां-बाप का भरोसा और बचपन के सपने आंखों के आगे तैर जाते हैं. हम किसी अव्यवस्था को फैलाने के लिए सड़क पर नहीं उतरे हैं, हम बस यह चाहते हैं कि हमारी मेहनत का सौदा बंद हो. अब तो जिस तरह से स‍िस्टम ने मुझे इस हाल में पहुंचा दिया है, मैं सोचने लगा हूं कि नौकरी से ज्यादा अब नेता बनकर सिस्टम सुधारने की द‍ि‍शा में काम करने में ही भलाई है. 

आज सरकार से मेरी मुख्य मांग है कि सभी भर्ती परीक्षाएं पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से कराई जाएं, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और योग्य अभ्यर्थियों को समय पर न्याय मिले. जांच किस एजेंसी से हो, यह सरकार और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है, लेकिन छात्रों की अपेक्षा है कि जांच ऐसी हो जिस पर सभी पक्षों का भरोसा बन सके और सच्चाई सामने आए.

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