सलमान खान चाहते हैं कि शिक्षा भारत का 'नेक्स्ट फैशन ट्रेंड' बने... इस ट्वीट का मतलब क्या है?

क्या पढ़ाई देश का नया 'फैशन' बन सकती है? अभिनेता सलमान खान की पोस्ट ने नीट (NEET) विवाद और भारत की शिक्षा व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है. जानिए क्या भारत एक ग्लोबल एजुकेशनल हब बनने के लिए तैयार है या चुनौतियां अभी भारी हैं.

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Salman Khan: FB Salman Khan: FB

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 23 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 4:11 PM IST

कभी-कभी सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर कर देने वाली चर्चाएं सबसे अप्रत्याशित जगहों से शुरू होती हैं. मेरे लिए इसकी शुरुआत एक दोस्त के साथ कॉफी टेबल पर हुई, जब उसने मुझे भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सलमान खान की एक सोशल मीडिया पोस्ट दिखाई.

उस समय हर तरफ एक ही चर्चा छाई हुई थी, छात्रों का 'चलो संसद' मार्च. छात्र, अभिभावक, राजनेता, सोशल मीडिया और टीवी डिबेट्स... हर कोई NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद पर बात कर रहा था. तभी मेरे फोन पर एक नोटिफिकेशन बजा.

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एक दोस्त ने मुझे सलमान खान की पोस्ट का स्क्रीनशॉट भेजा और लिखा, 'सलमान भाई ने भी इस पर अपनी राय रख दी है.' 

कई सार्वजनिक हस्तियों की तरह, बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान ने भी उस हिंसा पर चिंता जताई, जिसने कथित पेपर लीक को लेकर जवाबदेही मांग रहे एक शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन का रूप बिगाड़ दिया था.

उन्होंने निष्पक्ष और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली की मांग को लेकर एक साथ खड़े होने के लिए छात्रों और अभिभावकों की सराहना की. साथ ही उन्होंने यह भी अपील की कि इस आंदोलन को राजनीति से दूर रखकर केवल छात्रों के हितों पर केंद्रित रहना चाहिए और उम्मीद जताई कि सरकार इसमें ठोस सुधार करेगी.

लेकिन इसी पोस्ट में उनकी आखिरी पंक्ति ऐसी थी, जो दिल को छू गई और गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया. वो कहते हैं कि 'शिक्षा को अगला ट्रेंड और फैशन बनना चाहिए. यह साल-दर-साल इतनी ट्रेंडी और फैशनेबल हो जाए कि बाहर के लोग पढ़ने के लिए भारत आएं और भारत एक 'एजुकेशनल हब' बन जाए.' 

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पहली नज़र में यह एक सेलिब्रिटी का कोई सामान्य बयान लग सकता है. लेकिन जितना अधिक आप इस पर विचार करेंगे, उतना ही यह एक बड़े और गहरे सवाल जैसा लगेगा. शिक्षा को भारत का अगला 'फैशन' बनाने के लिए वास्तव में क्या करना होगा? निश्चित रूप से इसके लिए सिर्फ डिजाइनर कैंपस या चमकदार ब्रोशर काफी नहीं होंगे.
 

जंतर मंतर का एक दृश्य

इसका असली मतलब होगा, एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण करना जिस पर छात्र भरोसा कर सकें, जिसका दुनिया भर के विश्वविद्यालय सम्मान करें, और ऐसे संस्थान बनाना जो सिर्फ इसलिए वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित न करें क्योंकि वे सस्ते हैं, बल्कि इसलिए करें क्योंकि वे दुनिया में सबसे बेहतरीन हैं. सलमान खान की टिप्पणी का समय बेहद महत्वपूर्ण है. भारत एक तरफ उच्च शिक्षा में अपनी वैश्विक उपलब्धियों का जश्न मना रहा है, तो दूसरी तरफ इतिहास के सबसे बड़े परीक्षा संकटों में से एक से जूझ रहा है.

एक ओर भारतीय विश्वविद्यालय वैश्विक रैंकिंग में लगातार ऊपर चढ़ रहे हैं और रिकॉर्ड संख्या में छात्रों का दाखिला ले रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जन-विश्वास पर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. यह विरोधाभास एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है: भारत शिक्षा संकट से नहीं, बल्कि विश्वास के संकट से जूझ रहा है.

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अच्छी खबर: भारत की उच्च शिक्षा की कहानी मजबूत हो रही है
यदि वैश्विक रैंकिंग को एक पैमाना माना जाए, तो भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है. QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में कई भारतीय संस्थानों को दुनिया के अग्रणी विश्वविद्यालयों में जगह मिली है, जो उनके शोध कार्य, रोजगार क्षमता और अकादमिक साख में सुधार को दर्शाते हैं.

IIT दिल्ली: 118वीं वैश्विक रैंक के साथ भारत में सबसे आगे है.
IIT बॉम्बे: 134वें स्थान पर है.
IIT मद्रास: 170वें स्थान पर है.

इसके अलावा IIT खड़गपुर, IISc बेंगलुरु, IIT कानपुर, दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और कई अन्य संस्थानों ने भी इस सूची में अपनी मजबूत जगह बनाई है.

क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में आईआईटी दिल्ली भारत के शीर्ष संस्थान में

रैंकिंग के आंकड़ों से परे देखें तो आईआईटी दिल्ली का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रिसर्च इम्पैक्ट और एम्प्लॉयर रेपुटेशन में रहा है. यानी इसके ग्रेजुएट्स न केवल प्रभावशाली रिसर्च कर रहे हैं, बल्कि इंडस्ट्री में भी उनकी भारी मांग है.

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 'स्टूडेंट सिटीज' में भारत के 4 शहर
कोई भी यूनिवर्सिटी अकेले अस्तित्व में नहीं रह सकती. उसके आसपास का शहर छात्रों के अनुभव को उतना ही आकार देता है जितना कि क्लासरूम और लैब. QS बेस्ट स्टूडेंट सिटीज 2027 रैंकिंग ने भारत के चार शहरों को दुनिया के शीर्ष 150 छात्र गंतव्यों में मान्यता दी है:

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मुंबई (91वां स्थान): रोजगार के अवसरों, वहनीयता (Affordability) और संस्थागत मजबूती के कारण भारत में सबसे आगे.
दिल्ली (99वां स्थान): एम्प्लॉयर एक्टिविटी और किफायती पढ़ाई में सबसे आगे, लेकिन छात्र संतुष्टि का स्कोर यहां आश्चर्यजनक रूप से कम रहा.
बेंगलुरु: छात्रों का पसंदीदा शहर बनकर उभरा, जिसने स्टूडेंट एक्सपीरियंस में सबसे ज्यादा स्कोर हासिल किया.
चेन्नई: किफायती रहने और पढ़ाई के माहौल के साथ इस सूची में जगह बनाने में सफल रहा.

ये आंकड़े बताते हैं कि भारत एक ऐसे गंतव्य के रूप में उभर रहा है जहां पश्चिमी देशों की तरह मोटी फीस चुकाए बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त की जा सकती है. लेकिन यह उन क्षेत्रों को भी उजागर करता है जहां सुधार की जरूरत है: छात्रों का अनुभव, वैश्विक प्रतिष्ठा और अंतर्राष्ट्रीय आकर्षण.

क्यूएस बेस्ट स्टूडेंट सिटीज 2027: भारत के ये चार शहर हैं दुनिया के शीर्ष 150 छात्र गंतव्यों में

रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रहा है उच्च शिक्षा में दाखिला
ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2023–24 के अनुसार, भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में अब रिकॉर्ड 4.5 करोड़ छात्र नामांकित हैं. इस बदलाव का सबसे बड़ा जरिया महिलाएं बनी हैं. लगातार सातवें साल महिलाओं का नामांकन पुरुषों से ज्यादा रहा है. स्नातक (UG) स्तर पर लगभग आधी छात्र महिलाएं हैं, जबकि स्नातकोत्तर (PG) स्तर पर उनकी संख्या पुरुषों से अधिक बनी हुई है.

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निजी संस्थानों का दायरा भी तेजी से बढ़ा है, जो अब कॉलेज जाने वाली 70% से अधिक आबादी को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं. वहीं, कला (Arts) और STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स) दोनों क्षेत्रों में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है. STEM पाठ्यक्रमों में दाखिला पहली बार 1 करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है. कागजों पर भारत की उच्च शिक्षा की कहानी कभी इतनी मजबूत नहीं दिखी. लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक पहलू है.

कहानी का दूसरा पहलू: जब भरोसा टूटने लगता है
जिस साल भारतीय विश्वविद्यालयों ने वैश्विक रैंकिंग में सुधार का जश्न मनाया, उसी साल देश को परीक्षा प्रणाली के सबसे बड़े विवादों में से एक का सामना करना पड़ा. एक तरफ भारत विश्व स्तरीय संस्थान बनाने के लिए तारीफें बटोर रहा था, तो दूसरी तरफ देश के लाखों छात्र यह सवाल पूछ रहे थे कि क्या भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं पर अब भी भरोसा किया जा सकता है?

महिलाओं ने लगातार सातवें साल उच्च शिक्षा में नामांकन के मामले में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है (सांकेतिक तस्वीर)

रैंकिंग तो सुधरी, लेकिन दरारें कायम हैं
विश्वविद्यालयों में अंतर्राष्ट्रीय फैकल्टी की भारी कमी है, विदेशी छात्रों की संख्या काफी कम है और वैश्विक रिसर्च सहयोग भी सीमित हैं. यदि भारत को वाकई ग्लोबल एजुकेशनल हब बनना है, तो केवल सस्ती पढ़ाई या IITs का नाम काफी नहीं होगा; इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़े हुए कैंपस और मजबूत रिसर्च इकोसिस्टम की आवश्यकता होगी.

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जब परीक्षाओं से उठने लगता है विश्वास
NEET-UG 2026 विवाद की शुरुआत केवल एक कथित लीक पेपर से नहीं हुई थी, बल्कि यह आशंकाओं से शुरू हुई. जब छात्रों ने दावा किया कि एक 'गेस पेपर' वास्तविक परीक्षा पत्र से बहुतायत में मिल रहा था, तो यह मामला देखते ही देखते देश के सबसे बड़े परीक्षा संकट में बदल गया.

छात्र सड़कों पर उतर आए, अभिभावक जवाब मांगने लगे और मामला अदालतों तक पहुंच गया. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे, जिसके बाद मूल परीक्षा रद्द करके राष्ट्रव्यापी री-टेस्ट कराने का फैसला लेना पड़ा. संसद तक इस मुद्दे की गूंज सुनाई दी, जहां विपक्ष ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की. प्रतियोगी परीक्षाएं करोड़ों युवाओं के लिए सिर्फ एक टेस्ट नहीं, बल्कि उनके भविष्य और सालों की कड़ी मेहनत का जरिया होती हैं. जब इस प्रक्रिया से विश्वास डगमगाता है, तो नुकसान बहुत गहरा होता है.

सपनों के पीछे का 'करोड़ों का कारोबार'
JEE या NEET की तैयारी अब केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं रही. यह करोड़ों रुपये की एक इंडस्ट्री बन चुकी है, जहां कोचिंग संस्थान किसी कॉर्पोरेट ब्रांड की तरह प्रतिस्पर्धा करते हैं.

स्टार टीचर्स को करोड़ों के पैकेज दिए जाते हैं, विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है और टॉपर छात्रों की सफलता का विपणन (Marketing) किया जाता है. सफलता खुद एक 'उत्पाद' बन गई है. इस होड़ में शैक्षणिक मूल्यों से ज्यादा व्यावसायिक मुनाफा हावी होने लगा है.

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डेटा की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
परीक्षा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी छात्रों की चिंताएं खत्म नहीं होतीं. हाल ही में सीबीएसई और नीट जैसी परीक्षाओं में शामिल छात्रों का डेटा (नाम, फोन नंबर, पता) महज ₹1,500 में बेचे जाने की रिपोर्ट ने प्राइवेसी और सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. परीक्षा खत्म होते ही छात्रों के फोन पर कोचिंग संस्थानों के कॉल्स और मैसेजेस की बाढ़ आ जाती है. इस दौर में छात्र के डेटा की सुरक्षा केवल एक प्रशासनिक काम नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है.

तो सबसे बड़ा सवाल क्या है?
शायद सलमान खान असल में केवल 'फैशन' की बात नहीं कर रहे थे. वे आकांक्षा और संकल्प की बात कर रहे थे. भारत को वैश्विक शिक्षा हब बनने के लिए सिर्फ विश्व स्तरीय यूनिवर्सिटीज या सस्ते कैंपस नहीं चाहिए. उसे 'विश्वास' पर टिका एक इकोसिस्टम चाहिए जहां परीक्षाएं पूरी तरह पारदर्शी और विश्वसनीय हों, छात्रों का डेटा सुरक्षित रहे, कोचिंग संस्थान नैतिक दायरों में काम करें और सफलता का पैमाना किसी लूपहोल या धांधली से नहीं, बल्कि केवल कड़ी मेहनत से तय हो.

भारत के पास शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने का हुनर, संस्थान और क्षमता सब कुछ है. लेकिन उसकी अगली बड़ी उपलब्धि केवल बेहतर रैंकिंग्स से नहीं, बल्कि मजबूत ईमानदारी और पारदर्शिता से तय होगी. तभी शिक्षा सही मायनों में भारत का अगला 'ट्रेंड' बन पाएगी क्योंकि दुनिया भारत के दावों पर तभी भरोसा करेगी, जब वह भारत के क्लासरूम्स की साख पर भरोसा कर सकेगी. 
 

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लेख- करन यादव, इंड‍िया टुडे

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