'युद्ध जीतने के लिए मल्टी डोमेन स्ट्रैटजी जरूरी', CDS ने गिनाई वॉर फ्रंट की चुनौतियां

सीडीएस जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने आजतक सुरक्षा सभा में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ सशस्त्र बलों की नहीं, बल्कि सरकार, उद्योग, तकनीक, अकादमिया और पूरे समाज की जिम्मेदारी है. बदलते खतरों, मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया.

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आजतक सुरक्षा सभा में बोलते सीडीएस जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि. (Photo: India Today Group) आजतक सुरक्षा सभा में बोलते सीडीएस जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि. (Photo: India Today Group)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:10 AM IST

आजतक के सुरक्षा सभा कार्यक्रम 'सबसे आगे हिंदुस्तानी' में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने महत्वपूर्ण संबोधन दिया. उन्होंने साफ कहा कि आज के समय में राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ सशस्त्र बलों की जिम्मेदारी नहीं रह गई है. सरकार, उद्योग, प्रौद्योगिकी समुदाय, अकादमिया और पूरा समाज इसमें बराबर की भूमिका निभाते हैं. आसपास का सुरक्षा वातावरण बहुत तेजी से बदल रहा है. खतरों का स्वरूप बदल रहा है, तकनीक की रफ्तार बढ़ रही है और युद्धक्षेत्र की सीमाएं भी फैल रही हैं. इसलिए तैयारी का तरीका भी बदलना जरूरी है. जनरल सुब्रमणि ने अपनी बात को छह मुख्य बिंदुओं के जरिए रखा.  

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युद्ध और संघर्ष का बदलता स्वरूप तथा प्रतिस्पर्धा का नया स्पेक्ट्रम

पहला बड़ा बदलाव युद्ध और संघर्ष के स्वरूप में आया है. शांति और युद्ध के बीच की रेखा तथा पारंपरिक और गैर-पारंपरिक संघर्ष के बीच का अंतर लगातार धुंधला होता जा रहा है. आज प्रतिस्पर्धा कई रूपों में सामने आ रही है. आर्थिक दबाव, तकनीकी इनकार, साइबर गतिविधियां, सूचना अभियान, समुद्री सहयोग, प्रॉक्सी ऑपरेशन या जनधारणा को प्रभावित करना- ये सब बिना पारंपरिक युद्ध की सीमा पार किए भी हो सकते हैं. तकनीक का लोकतंत्रीकरण भी समीकरण बदल रहा है. 

पहले तकनीक सिर्फ राज्यों के पास थी, लेकिन आज सस्ते ड्रोन जैसी चीजें गैर-राज्य तत्वों के पास भी हैं. असली फायदा उसी को मिलेगा जो तकनीक को सबसे तेज और प्रभावी तरीके से परिचालन लाभ में बदल सके. तकनीक सिर्फ माध्यम है; उसे कैसे इस्तेमाल किया जाए, यही ज्यादा महत्वपूर्ण है. सूचना श्रेष्ठता से निर्णय श्रेष्ठता तक पहुंचना जरूरी है.  

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युद्धक्षेत्र की बढ़ती पारदर्शिता और सेंसर-टू-शूटर साइकिल

दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव युद्धक्षेत्र की पारदर्शिता है. अंतरिक्ष आधारित निगरानी, मानवरहित सेंसर, ओपन सोर्स सूचना और नेटवर्क इंटेलिजेंस ने छिपना बहुत मुश्किल बना दिया है. सेंसर से शूटर तक का समय लगातार सिकुड़ रहा है. पहले घंटों में गिना जाता था, अब यूक्रेन-रूस संघर्ष में मिनटों और कहीं-कहीं सेकंडों में हो रहा है. इसलिए वही फायदे में रहेगा जो सबसे पहले देखे, समझे, निर्णय ले और कार्रवाई करे. इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ज्यादा इस्तेमाल जरूरी है. 

नेटवर्क और डेटा मजबूत होने चाहिए ताकि एल्गोरिदम से फैसले जल्दी लिए जा सकें. आज जानकारी की कमी नहीं है. सफल कमांडर वही होगा जो महत्वपूर्ण जानकारी पहचान सके, अनावश्यक को नजरअंदाज कर सके और सही समय पर सही फैसला ले सके. तकनीक का असली महत्व दूर देखने में नहीं, बल्कि देखी हुई चीज को सही समझने, फैसला लेने और उसे जल्दी पहुंचाने में है.  

जॉइंटनेस से मल्टी-डोमेन इंटीग्रेशन तक

तीसरा बिंदु जॉइंटनेस का है. अब सिर्फ सेवाओं के बीच समन्वय काफी नहीं. भविष्य का युद्धक्षेत्र जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में अलग-अलग नहीं बंटा रह सकता. नौसेना संचालन में अंतरिक्ष जागरूकता, हवाई अभियान में साइबर और इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव, जमीनी अभियान में हवाई समर्थन और मानवरहित सिस्टम जरूरी हैं. 

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जॉइंटनेस का मतलब है हर सेवा एक साथ मल्टी-डोमेन ऑपरेशन में काम करे. प्लेटफॉर्म केंद्रित सोच से क्षमता केंद्रित सोच की ओर जाना होगा. सिंगुलर सिस्टम से सिस्टम ऑफ सिस्टम्स की ओर बढ़ना होगा. हर प्लेटफॉर्म एक नोड है; उसकी ताकत तब बढ़ेगी जब वह बाकी नोड्स से जुड़कर पूरा प्रभाव पैदा करे. इसके लिए इंटरऑपरेबल मानव संसाधन भी जरूरी है जो दूसरी सेवाओं के साथ तालमेल से काम कर सकें. यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि परिचालन अनिवार्यता है.  

हालिया संघर्षों के सबक और विकसित भारत की सुरक्षा चुनौतियां

हालिया संघर्षों ने कुछ पुरानी सच्चाइयों को फिर साबित किया है. अब कोई जगह सुरक्षित नहीं. चाहे ठिकाने हों, बल एकत्रीकरण हों, लॉजिस्टिक नोड हों या महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा- सब निशाने पर हो सकते हैं. युद्धक्षेत्र अब सिर्फ मोर्चे तक नहीं, बल्कि पूरे देश की गहराई तक फैला है. 

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ड्रोन, मिसाइल और सटीक हथियारों के प्रसार से हमला और बचाव का समीकरण बदल रहा है. इसलिए सैन्य और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे की सुरक्षा बहुत जरूरी है. माननीय प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन सुदर्शन चक्र की घोषणा की है, जो इसी दिशा में कदम है. लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक क्षमता भी युद्धक्षेत्र का हिस्सा बन चुकी है. 

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कोई सेना उतनी देर तक लड़ सकती है जितनी उसकी लॉजिस्टिक क्षमता हो. तकनीक ने मनुष्य को अप्रासंगिक नहीं बनाया, बल्कि तकनीकी रूप से प्रशिक्षित और सक्षम जनशक्ति और ज्यादा जरूरी हो गई है. सवाल मशीन बनाम मनुष्य का नहीं, बल्कि मशीन से मनुष्य को सशक्त बनाने का है. समुद्री क्षेत्र की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है. जलडमरूमध्य, बंदरगाह और समुद्री स्थान आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं.  

विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ते हुए सुरक्षा परिदृश्य भी बदलेगा. अर्थव्यवस्था बढ़ने के साथ डिजिटल बुनियादी ढांचा, ऊर्जा नेटवर्क, बंदरगाह, औद्योगिक क्लस्टर, सेमीकंडक्टर, वित्तीय और संचार नेटवर्क तथा अंतरिक्ष आधारित संरचना पर निर्भरता बढ़ेगी. 

ये सिर्फ आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति हैं. सुरक्षा अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं. नेटवर्क, आपूर्ति श्रृंखला, बुनियादी ढांचा, तकनीक और सूचना युद्ध भी राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए विकसित भारत को लचीला भारत भी बनना होगा. विकास और सुरक्षा साथ-साथ बढ़ने चाहिए.  

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लचीलापन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और पूर्ण स्पेक्ट्रम तैयारी

लचीलापन और तकनीकी आत्मनिर्भरता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. लंबे संघर्ष में वही राष्ट्र टिकेगा जो झटके सह सके, जल्दी उबर सके और काम जारी रख सके. हमें पूछना होगा कि नेटवर्क खराब होने या सिस्टम बाधित होने पर भी क्या हमारी सेनाएं काम कर सकती हैं? 

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क्या संघर्ष के दौरान उपकरण रिपेयर और रिप्लेनिश हो सकते हैं? क्या आपूर्ति नेटवर्क और उद्योग जरूरत के अनुसार तेजी से क्षमता बढ़ा सकते हैं? लचीलापन संकट के समय नहीं, बल्कि डिजाइन में ही होना चाहिए. रक्षा में आत्मनिर्भरता का मतलब है ज्यादा से ज्यादा उपकरण और महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला खुद बनाना. अंत में, प्रतिस्पर्धा से संघर्ष तक पूरे स्पेक्ट्रम में भारत की तैयारी जरूरी है. सिर्फ युद्ध लड़ने की नहीं, बल्कि स्थिति को आकार देने, रोकने, प्रतिक्रिया देने और प्रभावी रहने की तैयारी करनी होगी.  

जनरल सुब्रमणि के इस संबोधन से साफ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अब सिर्फ सैन्य मामला नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है. बदलते खतरों के मुताबिक मल्टी-डोमेन एकीकरण, तकनीकी लाभ, लचीलापन और आत्मनिर्भरता पर जोर देकर ही भारत भविष्य के संघर्षों के लिए तैयार रह सकता है.  

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