लैब से बैटलफील्ड तक... कैसे आत्मनिर्भर बन रहा भारत का डिफेंस सेक्टर?

भारत का डिफेंस सेक्टर अब सिर्फ हथियार और सैन्य उपकरण खरीदने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी जरूरत की तकनीक और सिस्टम खुद विकसित करने से लेकर उन्हें दुनिया तक पहुंचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

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डॉ. चंद्रिका कौशिक, डीजी, प्रोडक्शन कोऑर्डिनेशन एवं सर्विसेज इंटरैक्शन, डीआरडीओ और राजिंदर सिंह भाटिया, चेयरमैन, कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड (Photo-ITG) डॉ. चंद्रिका कौशिक, डीजी, प्रोडक्शन कोऑर्डिनेशन एवं सर्विसेज इंटरैक्शन, डीआरडीओ और राजिंदर सिंह भाटिया, चेयरमैन, कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:23 PM IST

भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में पिछले एक दशक में बड़े बदलाव हुए हैं. सरकार के बढ़ते रक्षा बजट, स्वदेशी तकनीक और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी ने देश के डिफेंस इकोसिस्टम को नई गति दी है. आजतक के कार्यक्रम ‘सुरक्षा सभा’ के सेशन ‘रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत’ में डीजी, प्रोडक्शन कोऑर्डिनेशन एवं सर्विसेज इंटरैक्शन, DRDO डॉ. चंद्रिका कौशिक और कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड के चेयरमैन राजिंदर सिंह भाटिया ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की मौजूदा स्थिति और आगे की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की.

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डॉ. चंद्रिका कौशिक ने कहा कि भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, उन्होंने रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देश का कैपिटल एक्सपेंडिचर 2015 में करीब ₹94 हजार करोड़ था, जो 2026 में बढ़कर लगभग ₹2.09 लाख करोड़ हो गया है. इसी तरह डिफेंस बजट भी 2015 के करीब ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2026 में लगभग ₹7.85 लाख करोड़ हो गया है.

उन्होंने कहा कि DRDO द्वारा विकसित सुरक्षा प्रणालियों की क्यूमुलेटिव प्रोडक्शन वैल्यू ₹6 लाख करोड़ से अधिक हो चुकी है, उनके मुताबिक, ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित किए गए डिफेंस सिस्टम तेजी से तैयार, इंटीग्रेट और प्रोड्यूस किए जा रहे हैं. डॉ. कौशिक ने कहा कि आत्मनिर्भरता को लेकर सरकार के विशेष फोकस और प्रयासों के नतीजे अब दिखाई देने लगे हैं, यानी भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का खरीदार बनने के बजाय उनके विकास और उत्पादन में अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है.

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कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड के चेयरमैन राजिंदर सिंह भाटिया ने आत्मनिर्भरता को एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया बताया, उन्होंने कहा कि सेल्फ-रिलायंस की इस जर्नी में कोई स्टॉप नहीं है, टेक्नोलॉजी लगातार विकसित हो रही है और इसलिए भारत को भी उसके साथ लगातार आगे बढ़ना होगा. उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में देश की आत्मनिर्भरता की दिशा में बहुत बड़े बदलाव हुए हैं, उनके मुताबिक, आज सवाल केवल यह नहीं है कि भारत कितना आत्मनिर्भर है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि देश बदलती तकनीक के साथ खुद को कितनी तेजी से अपडेट कर रहा है.

उन्होंने कहा कि तकनीक या तो आपको लीड करने का मौका देती है या फिर आपको उसके पीछे चलना पड़ता है. इसलिए आत्मनिर्भरता के लिए लगातार नई तकनीक विकसित करना और उसे अपनाना जरूरी है.

डिफेंस सेक्टर में टियर स्ट्रक्चर, MSME और स्टार्टअप की अहम भूमिका

रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में MSME और छोटे उद्योगों की भूमिका पर बात करते हुए राजिंदर सिंह भाटिया ने कहा कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां पूरा इकोसिस्टम टियर स्ट्रक्चर में काम करता है, इसमें बड़े स्केल के इंटीग्रेटर के साथ टियर-1, टियर-2 और टियर-3 कंपनियां जुड़ी होती हैं. इनमें MSME और स्टार्टअप भी बड़ी भूमिका निभाते हैं, उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी कंपनी दुनिया में सबसे ज्यादा आर्टिलरी गन बनाती है और DRDO के साथ मिलकर विकसित की गई एक गन के निर्माण में करीब 3,000 वेंडर्स जुड़े हुए हैं.

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भाटिया के मुताबिक, इससे यह समझा जा सकता है कि एक बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट के पीछे हजारों कंपनियों और छोटे-बड़े सप्लायर्स का पूरा नेटवर्क काम करता है. ऐसे में अगर इकोसिस्टम का एक बड़ा हिस्सा आगे बढ़ता है तो उससे जुड़े छोटे और बड़े सभी खिलाड़ी भी आगे बढ़ते हैं.

बड़े प्लेयर के साथ छोटे उद्योगों को आगे बढ़ाना जरूरी

डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता के लिए सिर्फ बड़ी कंपनियों की क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. MSME, स्टार्टअप और छोटे सप्लायर्स को भी तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन क्षमता के स्तर पर मजबूत करना जरूरी है. आज भारत का डिफेंस इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है और इसमें बड़े डिफेंस इंटीग्रेटर्स से लेकर MSME और स्टार्टअप तक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.

लैब से बैटलफील्ड तक पहुंचने में क्यों लगता है समय?

डॉ. चंद्रिका कौशिक ने बताया कि किसी नए डिफेंस सिस्टम को विकसित करने के बाद उसे सेना तक पहुंचाने की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं, उन्होंने कहा कि किसी सिस्टम का पहला प्रोटोटाइप तैयार करने में करीब दो-तीन साल लग सकते हैं. इसके बाद अलग-अलग परिस्थितियों में उसके ट्रायल होते हैं. आर्मी के किसी सिस्टम के लिए हाई एल्टीट्यूड, डेजर्ट, समर और विंटर ट्रायल जैसे कई परीक्षण किए जाते हैं.  इन ट्रायल्स के बाद GST इवैल्यूएशन, RFP जारी होने, टेक्निकल प्रक्रिया और कॉन्ट्रैक्ट प्लेसमेंट जैसे कई चरण आते हैं. डॉ. कौशिक के मुताबिक, यही पूरी प्रक्रिया टेक्नोलॉजी को लैब से बैटलफील्ड तक पहुंचने में समय लेती है.

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उन्होंने कहा कि इस समय दो स्तरों पर प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश की जा रही है. पहला, DAP यानी Defence Acquisition Procedure में बदलाव कर यह देखने की कोशिश की जा रही है कि किन प्रक्रियाओं को समानांतर चलाया जा सकता है. दूसरा, DRDO बड़े सिस्टम के विकास में शुरुआत से ही एक या दो लीड इंडस्ट्री को डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर के तौर पर साथ लेकर चल रहा है.

डॉ. कौशिक ने कहा कि इससे डॉक्यूमेंटेशन और दूसरी जरूरी गतिविधियां इंडस्ट्री के साथ मिलकर की जा सकती हैं और पूरी प्रक्रिया की टाइमलाइन को कम किया जा सकता है, उन्होंने यह भी माना कि सिस्टम के साथ उससे जुड़ी ancillary activities भी महत्वपूर्ण हैं और सीमित मैनपावर के कारण इनमें इंडस्ट्री का सहयोग बेहद अहम है.

‘Make in India’ से ‘Make for the World’ की तरफ बढ़ रहा भारत

जब भारत के ‘Make in India’ से आगे बढ़कर दुनिया के लिए डिफेंस सिस्टम बनाने के सवाल पर राजिंदर सिंह भाटिया ने कहा कि यह दौर कुछ क्षेत्रों में पहले ही शुरू हो चुका है, उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी के ग्रुप ने पिछले दो वर्षों में 100 से ज्यादा आर्टिलरी गन एक्सपोर्ट की हैं और इनमें विकसित देशों को किए गए निर्यात भी शामिल हैं. भाटिया ने कहा कि भारत आज दुनिया के बड़े एम्युनिशन प्रोड्यूसर्स में शामिल है, उन्होंने अपनी कंपनी का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां करीब 2,000 आर्टिलरी शेल रोजाना बनाए जाते हैं.

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हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उत्पादन क्षमता बढ़ना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि भारत हर टेक्नोलॉजी डोमेन में आत्मनिर्भर हो गया है, उनके मुताबिक, अभी काफी उपलब्धियां हासिल हुई हैं, लेकिन आगे भी कई गैप्स को भरना बाकी है.

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ऑपरेशन सिंदूर के बाद तेज हुई निर्णय लेने की रफ्तार

ऑपरेशन सिंदूर के बाद आत्मनिर्भरता की दिशा में आए बदलाव पर डॉ. चंद्रिका कौशिक ने कहा कि इसका असर साफ तौर पर दिखाई दिया है, उन्होंने कहा कि डिसिजन मेकिंग की गति काफी तेज हुई है और कई प्रक्रियाओं में सुधार हुआ है. उन्होंने बताया कि इंडस्ट्री भी तेजी से स्केल कर रही है. ड्रोन के क्षेत्र में कई कंपनियां काम कर रही हैं और अलग-अलग तरह के सेंसर तथा पेलोड विकसित किए जा रहे हैं. DRDO न केवल इंडस्ट्री को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर रहा है, बल्कि जरूरत पड़ने पर सशस्त्र बलों को भी ऐसी तकनीक उपलब्ध करा रहा है जिसे वे अपनी डिपो और वर्कशॉप में तैयार कर सकें.

2047 तक आत्मनिर्भरता के सामने क्या चुनौतियां?

2047 तक आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की चुनौतियों पर डॉ. चंद्रिका कौशिक ने खास तौर पर टेस्ट फैसिलिटीज और इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने की जरूरत बताई, उन्होंने कहा कि इंजन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में विंड टनल और अन्य टेस्टिंग फैसिलिटीज को मजबूत करना जरूरी है, उन्होंने यह भी कहा कि इंडस्ट्री को डिजाइन और डेवलपमेंट के स्तर पर और अधिक योगदान देना होगा. स्टार्टअप, MSME और बड़ी इंडस्ट्री सभी अगर रिसर्च और डेवलपमेंट में ज्यादा भागीदारी करें तो आत्मनिर्भरता की रफ्तार और बढ़ सकती है.

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इसके साथ ही उन्होंने बेहतर समन्वय और ज्वाइंट कंपोजिट टीमों की जरूरत बताई, ताकि फैसले तेजी से लिए जा सकें और डेवलपमेंट टाइमलाइन को कम किया जा सके.

राजिंदर सिंह भाटिया ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद देश में एक नया आत्मविश्वास आया है, उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री और डेवलपमेंट काफी हद तक सेंटीमेंट पर भी निर्भर करते हैं और इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है, उनके मुताबिक, पहले अक्सर यह सुनने को मिलता था कि भारत में कुछ नहीं हो सकता, लेकिन अब माहौल बदल चुका है और विश्वास बढ़ा है कि जो चाहिए, वह भारत में बनाया जा सकता है, भाटिया ने कहा कि भारतीय सिस्टम ने बैटलफील्ड में अपनी क्षमता साबित की है और यह आत्मविश्वास आगे की तकनीकी और औद्योगिक यात्रा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.


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