मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर चरम पर है. ईरान ने दावा किया है कि उसने बहरीन में एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य अड्डे पर सफल हमला किया है. तेहरान के अनुसार यह हमला ऑपरेशन थंडर के तहत किया गया. अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े का मुख्यालय बहरीन में है. इसलिए यह दावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है. हालांकि अमेरिका ने अभी तक इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है.
वहीं अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने दक्षिणी ईरान में आईआरजीसी के दर्जनों ठिकानों पर जवाबी हमलों का जिक्र किया है. बहरीन, जॉर्डन और ईरान के कई प्रांतों में हमलों की खबरों के बीच क्षेत्रीय युद्ध फैलने का डर बढ़ता जा रहा है. यह घटना सिर्फ एक सैन्य दावा नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे अमेरिका-ईरान टकराव का नया अध्याय है.
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ईरान का क्या दावा है और हमला कैसे हुआ
ईरानी सेना के सार्वजनिक संबंध विभाग के बयान के अनुसार, अरश नाम के एडवांस विध्वंसक ड्रोन का इस्तेमाल कर शेख ईसा एयर बेस को निशाना बनाया गया. यह बेस बहरीन में स्थित है. अमेरिकी सेना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. ईरान का कहना है कि हमले में बिजली जनरेटर, नेविगेशन सिस्टम और प्रशासनिक सहायता भवनों को नुकसान पहुंचाया गया.
कुछ रिपोर्ट्स और वीडियो शीर्षकों में इसे 'अमेरिकी नौसेना को अंधा कर देने' और नेविगेशन सिस्टम को नष्ट करने के रूप में पेश किया गया है, लेकिन मूल ईरानी बयान में अरश ड्रोन द्वारा इन लक्ष्यों को निशाना बनाने की बात कही गई है. ईरान इसे हालिया अमेरिकी हवाई हमलों का जवाब बता रहा है. एक Su-24 पायलट की मौत का बदला भी जोड़ रहा है.
ईरान ने दावा किया कि कई एडवांस डिफेंस सिस्टम और मजबूत सुरक्षा के बावजूद उसके ड्रोन सफल रहे. शेख ईसा एयर बेस को अमेरिकी टोही विमानों का मुख्य केंद्र और हेलिकॉप्टर व ड्रोन रखरखाव का बड़ा केंद्र बताया गया है. यह दावा ऑपरेशन थंडर (या थंडरबोल्ट) के 26वें चरण के रूप में पेश किया गया है.
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इससे पहले भी ईरानी सेना और आईआरजीसी ने बहरीन, जॉर्डन और कुवैत के अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन हमलों के कई दावे किए हैं. इन दावों में ईंधन टैंक, गोदाम, बैरक और राडार सिस्टम को निशाना बनाने की बात कही जाती रही है. स्वतंत्र सत्यापन अभी उपलब्ध नहीं है. अमेरिका या बहरीन ने बड़े नुकसान की पुष्टि नहीं की है.
अमेरिका की प्रतिक्रिया
अमेरिका ने ईरानी दावों की सीधी पुष्टि नहीं की है. सेंटकॉम ने कहा है कि उसने दक्षिणी ईरान में आईआरजीसी के कई ठिकानों पर हमले किए हैं. पिछले कई हफ्तों से दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं. कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि अमेरिका ने ईरान के तटीय रक्षा सिस्टम, मिसाइल भंडार और ड्रोन ठिकानों को निशाना बनाया.
वहीं ईरान लगातार क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को अवैध बताते हुए जवाबी कार्रवाई का दावा कर रहा है. बहरीन में अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा तैनात है, जो फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज विश्व के तेल व्यापार का प्रमुख मार्ग है.
यहां किसी भी बड़े संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. जॉर्डन और अन्य खाड़ी देशों में भी हमलों की खबरें आई हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ रही है. कई विश्लेषक मानते हैं कि दोनों पक्ष सीमित हमलों तक खुद को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कोई भी गलत आकलन बड़े युद्ध का रूप ले सकता है.
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इस जंग का रणनीतिक महत्व
यह घटना आधुनिक युद्ध की प्रकृति को भी दर्शाती है. सस्ते और प्रभावी ड्रोन अब महंगे रक्षा सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं. ईरान लंबे समय से अरश और अन्य वन-वे अटैक ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है. ये ड्रोन कम लागत में बड़े नुकसान का दावा करने का मौका देते हैं. वहीं अमेरिका अपनी हवाई और मिसाइल क्षमता से ईरान के सैन्य बुनियादी ढांचे को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है.
विश्लेषकों के अनुसार दोनों पक्षों के दावों में अतिशयोक्ति की संभावना रहती है. ईरान घरेलू मोर्चे पर मजबूती दिखाने और अमेरिका को क्षेत्र से बाहर करने का संदेश देना चाहता है. अमेरिका अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखने और शिपिंग मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर देता है. बहरीन जैसे छोटे देश इन बड़े शक्ति संघर्षों के बीच फंस जाते हैं. स्थानीय आबादी और अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है.
इतिहास देखें तो अमेरिका और ईरान के बीच तनाव दशकों पुराना है. परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और प्रॉक्सी संघर्ष हमेशा विवाद के केंद्र रहे हैं. हाल के महीनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों पर हमले और जवाबी कार्रवाइयों ने स्थिति और बिगाड़ दी. अब ड्रोन और मिसाइल हमलों का सिलसिला जारी है. इससे डर है कि संघर्ष और देशों में फैल सकता है.
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आगे क्या हो सकता है
फिलहाल स्थिति नाजुक है. कूटनीतिक प्रयास सीमित दिख रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर खाड़ी देश और यूरोपीय शक्तियां, तनाव कम करने की अपील कर रही हैं. तेल की कीमतें और शिपिंग रूट प्रभावित हो सकते हैं. यदि दावे सही साबित होते हैं. नुकसान बड़ा हुआ तो अमेरिकी प्रतिक्रिया और तेज हो सकती है. वहीं ईरान भी आगे के चरणों की धमकी दे रहा है.
यह घटना हमें याद दिलाती है कि मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था कितनी नाजुक है. एक तरफ तकनीकी युद्ध चल रहा है. दूसरी तरफ राजनीतिक और आर्थिक हित टकरा रहे हैं. दोनों पक्षों के दावों को सतर्कता से देखना जरूरी है क्योंकि सच्चाई अक्सर बाद में सामने आती है. फिलहाल दुनिया की नजर इस क्षेत्र पर टिकी हुई है कि तनाव कहां तक जाता है. क्या कोई रास्ता निकाला जा सकता है.
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