चीन-अमेरिका से आगे निकलेगा भारत, फ्रांस के साथ बनाएगा 6th जेनरेशन फाइटर जेट

भारत रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस के नेतृत्व वाले छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम FCAS में शामिल होने की ठोस कोशिश शुरू कर दी है. साथ में ब्रिटेन-इटली-जापान के GCAP का भी आकलन हो रहा है.

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भारत एक साथ दो इंटरनेशनल प्रोजेक्ट की जांच कर रहा है, जो सुटेबल होगा, उसके साथ जाएगा. (Photo: ITG) भारत एक साथ दो इंटरनेशनल प्रोजेक्ट की जांच कर रहा है, जो सुटेबल होगा, उसके साथ जाएगा. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 08 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 12:50 PM IST

भारत की रक्षा तैयारियों में एक महत्वपूर्ण मोड़ आ चुका है. रक्षा मंत्रालय ने संसदीय स्थाई समिति को बताया है कि वह फ्रांस सरकार के नेतृत्व वाले छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम यानी फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम या FCAS में शामिल होने के लिए ठोस और समन्वित प्रयास शुरू कर चुका है. 

साथ ही ब्रिटेन, इटली और जापान के ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम यानी GCAP का भी मूल्यांकन जारी है. यह कदम भारत की वायु शक्ति को 2040 के दशक तक मजबूत बनाने की दिशा में उठाया गया है, जहां आधुनिक खतरे तेजी से बदल रहे हैं. छठी पीढ़ी के सिस्टम में स्टील्थ तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फैसले, लॉयल विंगमैन ड्रोन और नेटवर्क आधारित युद्ध की क्षमताएं शामिल हैं. ये भविष्य की लड़ाई को दल देंगी.

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FCAS क्या है और फ्रांस-जर्मनी विवाद का असर

एफसीएएस की शुरुआत 2017 में फ्रांस और जर्मनी के बीच हुई थी. बाद में स्पेन भी जुड़ गया. इसका मकसद सिर्फ एक नया विमान बनाना नहीं था, बल्कि एक पूरा सिस्टम तैयार करना था जिसमें मुख्य लड़ाकू विमान के साथ रिमोट कैरियर ड्रोन और कॉम्बैट क्लाउड नाम का डेटा नेटवर्क हो. 

इस नेटवर्क से विमान, ड्रोन, जमीन और समुद्र की इकाइयां एक साथ जानकारी साझा कर सकें. लेकिन एयरबस और डसॉल्ट एविएशन के बीच नेतृत्व, काम के बंटवारे और बौद्धिक संपदा को लेकर गहरे मतभेद पैदा हो गए. जर्मनी और फ्रांस की जरूरतें भी अलग थीं. फ्रांस को विमान वाहक पर चलने वाला और परमाणु क्षमता वाला विमान चाहिए, जबकि जर्मनी की प्राथमिकताएं अलग थीं. 

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जून 2026 के आसपास फ्रांको-जर्मन हिस्से में गंभीर गतिरोध के बाद कार्यक्रम के मूल विमान विकास वाले हिस्से को प्रभावी रूप से रद्द या निलंबित माना गया. जर्मनी अपना रास्ता चुनने लगा. इसी खाली जगह में भारत के लिए अवसर पैदा हुआ. फ्रांस अब नए साझेदारों की तलाश में है. भारत का मजबूत रक्षा संबंध उसे आकर्षक बनाता है.

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भारत क्यों इस तरफ बढ़ रहा है

भारतीय वायुसेना की मंजूर स्क्वॉड्रन संख्या 42 है, लेकिन अभी करीब 29 स्क्वॉड्रन ही सक्रिय हैं. पुराने विमान रिटायर हो रहे हैं. चीन जैसे पड़ोसी तेजी से छठी पीढ़ी के प्रोटोटाइप उड़ा रहे हैं. स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ विमान है. 

इसका प्रोटोटाइप 2020 के दशक के अंत में उड़ान भरने और 2030 के मध्य में सेवा में आने की उम्मीद है. लेकिन छठी पीढ़ी के लिए अतिरिक्त तकनीक और समय चाहिए. रक्षा मंत्रालय का मानना है कि किसी अंतरराष्ट्रीय कंसोर्टियम में शामिल होकर भारत पिछड़ने से बच सकता है. 

संसदीय समिति ने साफ रोडमैप और समयसीमा मांगी है ताकि योजना स्पष्ट हो. फ्रांस के साथ पहले से राफेल विमान, इंजन सह-विकास और अन्य परियोजनाएं चल रही हैं. साफरान के साथ 120 किलोन्यूटन थ्रस्ट वाले इंजन का समझौता एएमसीए मार्क-2 के लिए महत्वपूर्ण है. 

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राफेल का स्थानीय निर्माण भी औद्योगिक आधार मजबूत करेगा. भारत के पास एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और नौसेना राफेल मरीन खरीद रही है, जो फ्रांस की जरूरतों से मेल खाता है.

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एएमसीए और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का संतुलन

एएमसीए पूरी तरह स्वदेशी प्रयास है. इसमें सेंसर फ्यूजन, स्टील्थ और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी क्षमताएं होंगी. लेकिन छठी पीढ़ी में एआई आधारित ऑटोनॉमस फैसले, मानवरहित ड्रोन के साथ टीमिंग और क्लाउड नेटवर्किंग ज्यादा एडवांस होगी. भारत दोनों रास्तों पर चलना चाहता है. एक तरफ एएमसीए को आगे बढ़ाना, दूसरी तरफ एफसीएएस या जीसीएपी जैसी परियोजनाओं से तकनीक हासिल करना. 

GCAP ब्रिटेन, इटली और जापान का कार्यक्रम है जो 2030 के मध्य में सेवा में आने का लक्ष्य रखता है. लेकिन हाल की जानकारी के मुताबिक मंत्रालय ने एफसीएएस पर विशेष जोर दिया है. फ्रांस के साथ द्विपक्षीय साझेदारी कई  देशों के समूह की जटिलताओं से कम झंझट वाली हो सकती है. पहले की चर्चाएं रक्षा मंत्री स्तर पर हो चुकी हैं. भारत फ्रांस को को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन का प्रस्ताव दे रहा है ताकि स्थानीय सामग्री और निर्माण अधिकतम हो.

इस प्रयास से भारत को स्टील्थ सामग्री, एडवांस रडार, एआई सॉफ्टवेयर और ड्रोन नियंत्रण जैसी तकनीकें मिल सकती हैं. औद्योगिक भागीदारी से नौकरियां और निर्यात क्षमता बढ़ेगी. लेकिन लागत बहुत अधिक होगी. कार्यक्रम अरबों डॉलर के हैं. तकनीक हस्तांतरण की शर्तें सख्त हो सकती हैं. समयसीमा लंबी है. 

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2040 के आसपास ही पूर्ण क्षमता आने की उम्मीद है. संसदीय समिति ने एएमसीए की प्रगति की भी रिपोर्ट मांगी है ताकि स्वदेशी और विदेशी दोनों मोर्चों पर नजर रहे. सुरक्षा माहौल में हवाई क्षेत्र की भूमिका बढ़ रही है. नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध में जो देश पीछे रहेगा, वह नुकसान में रहेगा.

भारत की यह कोशिश आत्मनिर्भरता और रणनीतिक साझेदारी का मिश्रण है. फ्रांस के साथ मौजूदा विश्वास और औद्योगिक गठजोड़ इसे संभव बनाते हैं. अगर बातचीत सफल होती है तो भारत न सिर्फ उपयोगकर्ता बल्कि सह-विकासकर्ता बनेगा. इससे वायुसेना 2040 के दशक में आधुनिक खतरों का मुकाबला बेहतर तरीके से कर सकेगी.

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