Crime Katha: 1947 से 2025 तक... वो खलनायक, जिनसे कांपता-घबराता रहा बिहार

बिहार के जंगलराज में गैंगस्टर्स ने अपहरण, हत्या और राजनीतिक संरक्षण से जुर्म का बड़ा साम्राज्य बनाया. इम सफेदपोश माफियाओं में कामदेव सिंह, मोहम्मद शहाबुद्दीन, सूरजभान सिंह, छोटन-मुन्ना शुक्ला, आनंद मोहन, पप्पू यादव, अनंत सिंह और बबलू श्रीवास्तव के नाम शामिल हैं. जानते हैं 1947-2025 तक बिहार में अपराध के बदलते रूप और राजनीतिक नेक्सस की अनकही दास्तान.

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बिहार में बाहुबलियों का बोलबाला रहा है (फोटो-ITG) बिहार में बाहुबलियों का बोलबाला रहा है (फोटो-ITG)

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 03 नवंबर 2025,
  • अपडेटेड 7:08 PM IST

Crime Katha of Bihar: बिहार की मिट्टी में खून, हवा में सत्ता और बंदूक की गूंज हमेशा से गूंजती रही है. साल 1947 से 2025 तक बिहार में गैंगस्टर्स ने अपहरण, हत्या और राजनीतिक संरक्षण के सहारे अपने साम्राज्य खड़े किए. कुख्यात कामदेव सिंह से लेकर मोहम्मद शहाबुद्दीन तक, हर बाहुबली ने जंगलराज की एक नई परिभाषा लिखी. ये कहानी उन्हीं माफियाओं की है, जिन्होंने बूथ कैप्चरिंग से शुरू कर साइबर क्राइम तक का सफर तय किया. बिहार का काला इतिहास लिखा. ऐसा बिहार जहां अपराधी विधायक बने और विधायक अपराधी. 'बिहार की क्राइम कथा' में खोलते हैं इस खौफनाक दास्तान के पन्ने.

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1947-1950: आज़ादी के बाद अपराध का बीज
स्वतंत्र भारत में बिहार की मिट्टी में उस वक्त अपराध के बीज बोए गए, जब जातीय वर्चस्व और आर्थिक असमानता ने गैंगवार की नींव रखी. साल 1947 में बंटवारे के बाद, बिहार के ग्रामीण इलाकों में भूमिहार और राजपूत समुदायों के बीच छोटे-मोटे विवाद हिंसक होने लगे थे. बेगूसराय जैसे जिलों में तस्करी और डकैती का सिलसिला शुरू हो चुका था, जहां स्थानीय जमींदारों ने अपनी सत्ता बचाने के लिए गुंडों को संरक्षण दिया. कामदेव सिंह जैसे उभरते अपराधी उस दौर के प्रतीक बन गए. कामदेव का जन्म 1930 में हुआ था और 1950 तक वो कई छोटे मोटे अपराधों में शामिल हो चुका था. उस दौर में राजनीतिक अस्थिरता ने पुलिस को कमजोर बना दिया था, जिससे अपराधी बेखौफ हो गए. यही दौर बिहार में जंगलराज की शुरुआत था, जहां कानून की जगह बंदूक चलने लगी थी. साल 1952 के पहले विधानसभा चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की शुरुआत हुई, जो बाद में गैंगस्टर्स का हथियार बनी.

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1950-1960: बिहार का पहला माफिया डॉन कामदेव सिंह
1950 के दशक में कामदेव सिंह ने बेगूसराय में अपने जुर्म का साम्राज्य स्थापित किया, जो डकैती, तस्करी और राजनीतिक हिंसा पर टिका था. भूमिहार परिवार से ताल्लुक रखने वाले कामदेव सिंह ने कम्युनिस्टों के खिलाफ एंटी-कम्युनिस्ट अभियान चलाया और कांग्रेसी नेताओं के लिए बूथ कैप्चरिंग का काम किया. 1957 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 34 पोलिंग बूथ कब्जाए, जिससे उनके संरक्षक सूर्युग प्रसाद सिंह की जीत सुनिश्चित हुई. कामदेव सिंह को स्थानीय लोग 'सम्राट' और 'रोबिन हुड' कहते थे. क्योंकि वो गरीबों की शादियां और अंतिम संस्कार का खर्च उठाता था. लेकिन उसकी बेरहमी भी कुख्यात थी; उसने नेपाल से कलकत्ता तक स्मगलिंग नेटवर्क तैयार किया था. 1960 तक कामदेव सिंह का वर्चस्व बिहार के उत्तरी जिलों तक पहुंच गया, जहां उसने गुंडों की फौज खड़ी कर दी थी. यही वो दौर था, जब बिहार में अपराध का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, जहां गैंगस्टर्स चुनावी मसल पावर बन गए थे.

1960-1970: राजनीतिक संरक्षण और बढ़ता अपराध
1960 के दशक में कामदेव सिंह का साम्राज्य चरम पर पहुंचा, जब उसने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान अपनी पकड़ मजबूत की. बेगूसराय से लेकर मुजफ्फरपुर तक उसका नेटवर्क फैला हुआ था, जहां वो हथियारों की तस्करी और डकैती के जरिए कमाई करता था. राजनीतिक दलों ने उसे हायर करना शुरू किया. 1969 के चुनावों में उसने मटिहानी में 34 बूथ कब्जाए. इस दौर में जातीय संघर्ष बढ़ने लगा, जहां भूमिहार गैंग्स ने पिछड़ी जातियों को निशाना बनाया. बाद में कामदेव सिंह के बेटे राजकुमार सिंह ने राजनीति में कदम रखा. पुलिस की नाकामी ने अपराध को बढ़ावा दिया. भ्रष्ट अधिकारी टिप्स देते थे. 1970 तक बिहार में 20-30 बड़े गैंग्स उभर चुके थे, जो रंगदारी और हत्याओं में शामिल थे. यह वो समय था, जब अपराध ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चूसने लगा था.

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1970-1980: कामदेव सिंह का पतन 
1970 के दशक में कामदेव सिंह 'बिहार का पाब्लो एस्कोबार' बन चुका था, लेकिन 1980 में पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में उसकी मौत हो गई. गंगा नदी किनारे भागते हुए उसे गोली मार दी गई, और उसकी लाश नदी के तट पर मिली थी. कामदेव सिंह की मौत ने बिहार के अपराध जगत में शून्य पैदा किया, लेकिन उसके गुंडों ने नए गैंग्स बना लिए. इस दौर में सूरजभान सिंह जैसे बाहुबली उभरे, जो मोकामा से राजनीति में आए. 26 आपराधिक मामलों के बावजूद, सूरजभान ने साल 2000 में विधानसभा चुनाव जीता. अपराध का स्वरूप बदलने लगा, बूथ कैप्चरिंग के साथ अपहरण बढ़े. कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव के उदय ने अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण दिया. 1980 तक बिहार में जातीय गैंगवार चरम पर पहुंच गया था, जहां ऊपरी जातियों के मिलिशिया ने निचली जातियों को चुनौती दी थी.

1980-1990: जंगलराज का आगाज़
माना जाता है कि बिहार में 1980 के दशक में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने से जंगलराज शुरू हुआ, जहां गैंगस्टर्स को खुला संरक्षण मिला. मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 1990 में विधानसभा चुनाव जीता, लेकिन उनकी दबंगई 1990 के दशक में चरम पर जा पहुंची. सिवान में उन्होंने किडनैपिंग और हत्याओं का ऐसा सिलसिला शुरू किया, जो खौफ का दूसरा नाम बन गया. उस दौर में छोटन शुक्ला जैसे भूमिहार गैंगस्टर भी उभरे, जो मुजफ्फरपुर में सक्रिय थे. साल 1994 में छोटन शुक्ला की हत्या कर दी गई. इस हत्याकांड ने जातीय हिंसा को हवा दे दी. उसी वक्त बाहुबली आनंद मोहन सिंह ने बिहार पीपुल्स पार्टी बनाई और अपहरण उद्योग को बढ़ावा दिया. यही वो दौर भी था, जब पप्पू यादव ने मधेपुरा में ट्रिगर-हैपी गैंग बनाया. साल 1990 तक 32,000 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें ज्यादातर किडनैपिंग के थे. हालात ये बन चुके थे कि राजनीतिक संरक्षण ने गैंगस्टर्स को अजेय बना दिया था.

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1990-1995: सिवान का सुल्तान बन गया था शहाबुद्दीन
साल 1990 में शहाबुद्दीन ने जिरादेई विधानसभा सीट से चुनाव जीता और लालू प्रसाद यादव के करीबी बन गए. सिवान उनका किला था, आरोप है कि वहीं से उन्होंने किडनैपिंग और हत्या का साम्राज्य चलाया. साल 1994 में छोटन शुक्ला की हत्या के बाद उनके भाई मुन्ना शुक्ला ने बदला लिया, लेकिन शहाबुद्दीन ने 1996 में लोकसभा चुनाव जीत लिया. उसी दौर में आनंद मोहन ने सहरसा से सांसद बनकर अपहरण का धंधा बढ़ाया. उसी दौर में सूरजभान सिंह ने मोकामा में 26 आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद राजनीति में कदम रखा. इल्जाम है कि साल 1995 में लालू सरकार ने गैंगस्टर्स को संरक्षण दिया, जिससे किडनैपिंग केस 32,000 से ज्यादा हो गए. यही वो समय था, जब जातीय गैंगवार ने बिहार को रक्तरंजित कर दिया था.

1995-2000: छोटन-मुन्ना शुक्ला का बदला, DM का मर्डर
साल 1994 में छोटन शुक्ला की हत्या कर दी गई. इसी कत्ल ने मुन्ना शुक्ला को बदले की आग में झोंक दिया. उसके अंतिम संस्कार के दौरान जुटी भीड़ ने गुस्से में आकर गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की बेरहमी से हत्या कर दी थी, उस भीड़ को आनंद मोहन ने भड़काया था. भाई की हत्या के बाद भी मुन्ना कमजोर नहीं पड़ा. उसने 1998 में मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या करा दी. इस दौर में शहाबुद्दीन ने सिवान में कंगारू कोर्ट चलाए. पप्पू यादव ने 1999 में सीपीएम विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप झेले. अनंत सिंह ने साल 2000 में मोकामा से चुनाव लड़ा, लेकिन सूरजभान ने उसे हरा दिया. उस दौर के जंगलराज में 200 से ज्यादा लोगों की हत्याएं हुईं.

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2000-2005: बाहुबलियों का राजनीतिक वर्चस्व
साल 2000 में नितीश कुमार की सरकार बनी, लेकिन गैंगस्टर्स का प्रभाव बरकरार रहा. शहाबुद्दीन ने साल 2004 में वो तेजाब कांड कराया था, जिसमें सिवान में दो भाइयों को तेजाब डालकर मौत के घाट उतार दिया गया था. कुख्यात मुन्ना शुक्ला ने साल 2005 में ही लोक जनशक्ति पार्टी से चुनाव लड़ा और विधायक बना. उसी दौर में आनंद मोहन को अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन उसी दौर में उसने लोकसभा का चुनाव जेल से लड़ा. पप्पू यादव भी उसी दौर में मधेपुरा से सांसद बने. माफिया डॉन अनंत सिंह ने साल 2005 में ही मोकामा से चुनाव जीता था. उसी वक्त अंडरवर्ल्ड डॉन बबलू श्रीवास्तव ने किडनैपिंग किंग बनकर बिहार-यूपी में अपना आतंक कायम किया था. सच कहा जाए तो उसी दौर में किडनैपिंग इंडस्ट्री बूम हुई थी.

2005-2010: नितीश का सुशासन और गैंगस्टर्स का पतन
बिहार में वक्त के साथ-साथ सत्ता बदली. साल 2005 में नितीश कुमार सरकार ने गैंगस्टर्स पर लगाम लगाने का काम शुरू किया. कुख्यात हो चुके शहाबुद्दीन को साल 2009 में गिरफ्तार किया गया. मुन्ना शुक्ला को साल 2008 में बृज बिहारी हत्याकांड के मामले में सजा मिली. कुख्यात आनंद मोहन उस वक्त जीवन भर की कैद काट रहा था. वहीं पप्पू यादव ने साल 2009 में जेल से चुनाव लड़ा. इसी तरह अनंत सिंह ने साल 2010 में मोकामा से जीत हासिल की. उसी दौर में अनंत सिंह पर पत्रकारों को बंधक बनाने के आरोप लगे. दबंग अपराधी सूरजभान सिंह को साल 2008 में राम सिंह हत्याकांड के सिलसिले में सजा हुई. डॉन बबलू श्रीवास्तव को साल 2008 में ही आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. बिहार में अपराध दर घटी, लेकिन बाहुबली राजनीति में बने रहे.

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2010-2015: बाहुबलियों का पुनरुत्थान और नए खतरे
वक्त का पहिया तेजी से भाग रहा था. साल 2010 में अनंत सिंह ने फिर जीत हासिल की, लेकिन 2013 में वो रेशमा खातून हत्याकांड में फंस गया. शहाबुद्दीन साल 2016 में जमानत पर रिहा हुए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर दी. पप्पू यादव ने साल 2014 का चुनाव जीता और सांसद बने. उधर, मुन्ना शुक्ला साल 2014 में हाईकोर्ट से बरी हो गए थे. जबकि आनंद मोहन जेल में ही था. कुख्यात सूरजभान सिंह ने 2014 में बरी होने के बाद राजनीति की दुनिया में कदम रख दिया. उस वक्त बबलू श्रीवास्तव जेल से गैंग चला रहा था. इस दौरान जुर्म की दुनिया में साइबर क्राइम की एंट्री हुई, लेकिन बिहार के जातीय गैंग्स बने रहे.

2015-2020: सरकार की चुनौतियां और पुराने दुश्मन
साल 2015 में अनंत सिंह ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और वो फिर जीत गया. लेकिन साल 2021 में जब कोरोना का कहर चल रहा था, उसी दौर में कोविड से शहाबुद्दीन की मौत हो गई. पप्पू यादव ने साल 2019 में हार गए, लेकिन 2020 में फिर लड़े. उस वक्त भी आनंद मोहन जेल में था. जबकि मुन्ना शुक्ला साल 2020 में फिर कई मामलों में फंसता जा रहा था. सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी ने भी चुनाव में हाथ आजमाए और 2014 में मुंगेर से चुनाव जीत लिया. डॉन बबलू श्रीवास्तव साल 2015 में अपहरण के मामलों में फंसता गया. उस वक्त अपराध में संगठित नेटवर्क बढ़ते जा रहे थे, लेकिन नितीश सरकार ने भी बदमाशों के एनकाउंटर बढ़ा दिए थे.

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2020-2025: बाहुबलियों की विरासत और अपराध
साल 2020 में अनंत सिंह ने आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता, लेकिन साल 2022 में आर्म्स एक्ट के मामले में उसे 10 साल की सजा मिली. मगर साल 2024 में हाईकोर्ट ने उसे बरी कर दिया. इसी तरह से कुख्यात बाहूबली आनंद मोहन साल 2023 में जेल से रिहा हो गया. इसके पीछे सरकार की नई जेल पॉलिसी मददगार बनी. पप्पू यादव ने साल 2024 में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और सांसद बन गए. उसी बीच मुन्ना शुक्ला को साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सजा सुना दी. इस बार यानी 2025 में सूरजभान सिंह की पत्नी चुनाव लड़ रही है. अब बबलू श्रीवास्तव ने भी अदालत से रिहाई की मांग की है. जुर्म अब साइबर और सैंड माफिया में बदल गया, लेकिन बाहुबलियों की राजनीति बनी रही. साल 2025 के विधानसभा चुनाव में गैंगवार फिर भड़कने की आशंका है.

जाति से साइबर क्राइम तक... बदलता जुर्म 
बिहार के गैंगस्टर्स का सफर जातीय वर्चस्व से शुरू होकर साइबर क्राइम तक जा पहुंचा. पहले 1947 से 1980 तक बूथ कैप्चरिंग प्रमुख था, 1990-2010 तक अपहरण और हत्या, और अब सैंड-लिकर माफिया का जमाना है. शहाबुद्दीन जैसे डॉन राजनीतिक संरक्षण से मजबूत हुए. नितीश युग में गिरफ्तारियां बढ़ीं, लेकिन विरासत बनी रही. 2025 तक बिहार में 20-30 बड़े गैंग्स सक्रिय हैं, जो चुनाव प्रभावित करते हैं.

राजनीतिक में क्राइम नेक्सस
बिहार के कुख्यात गैंगस्टर्स ने राजनीति की अपराधीकरण कर दिया. कामदेव सिंह से लेकर अनंत सिंह तक, सभी ने कई पार्टियों के टिकट हासिल किए. चुनाव लड़े और जीते भी. लालू प्रसाद युग में आरजेडी ने शहाबुद्दीन को संरक्षित किया था, तो नीतीश कुमार सरकार ने कुख्यात आनंद मोहन को रिहा कराया. अब साल 2025 के चुनाव में वीणा देवी और अनंत सिंह जैसे बाहुबली फिर से मैदान में हैं. कहा जाता है कि यही नेक्सस बिहार में सत्ता की कुंजी है.

विरासत और सबक
साल 2025 तक बिहार के गैंगस्टर्स ने राज्य को आर्थिक रूप से लूटा, लेकिन उनकी कहानी एक सबक है. नीतीश के सुशासन ने सूबे में अपराध तो घटाया, लेकिन उसकी जड़ें अभी भी गहरी हैं. युवाओं को अपराध से दूर रखना किसी चुनौती से कम नहीं. सच कहें तो बिहार को एक नई शुरुआत की जरूरत है.

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