भारत के बड़े शहरों में अपना घर खरीदना अब सिर्फ बढ़ती मांग की वजह से महंगा नहीं हो रहा, बल्कि जमीन की कीमतों और डेवलपर मार्जिन जैसे कारक भी घरों की कीमत को लगातार ऊपर धकेल रहे हैं. ANAROCK की एक नई रिपोर्ट बताती है कि 2021 से 2025 के बीच देश के सात प्रमुख शहरों में मकानों की कीमतें निर्माण लागत की तुलना में करीब दोगुनी रफ्तार से बढ़ीं. इस बढ़ोतरी ने घर बनाने की वास्तविक लागत और खरीदारों से वसूली जा रही कीमत के बीच अंतर को और चौड़ा कर दिया है.
ANAROCK के मुताबिक, 2021 से 2025 के दौरान स्टैंडर्ड-प्लस श्रेणी के आवासीय प्रोजेक्ट को तैयार करने की औसत लागत 34 फीसदी बढ़ी, यह करीब 6.9 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) के बराबर है. निर्माण लागत 2021 में ₹2,681 प्रति वर्ग फुट थी, जो 2025 तक बढ़कर ₹3,604 प्रति वर्ग फुट हो गई.
इसके मुकाबले इसी अवधि में घरों की औसत आवासीय पूंजीगत कीमत 59 फीसदी बढ़ गई. यह कीमत ₹5,826 प्रति वर्ग फुट से बढ़कर ₹9,260 प्रति वर्ग फुट पहुंच गई. यानी घरों की कीमत में सालाना करीब 12 फीसदी की CAGR दर्ज हुई.
रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण लागत और घरों की बिक्री कीमत में करीब 25 प्रतिशत का अंतर सामने आया है. यह अंतर एक तरफ खरीदारों के लिए बढ़ती अफोर्डेबिलिटी की चुनौती दिखाता है, तो दूसरी ओर डेवलपर्स के मार्जिन पर भी दबाव बढ़ा सकता है.
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आखिर घरों की कीमत इतनी क्यों बढ़ रही है?
ANAROCK के विश्लेषण के मुताबिक, घरों की कीमत में हुई कुल वृद्धि का करीब 66 फीसदी हिस्सा निर्माण से जुड़े खर्चों से जुड़ा है. वहीं बाकी 34 फीसदी वृद्धि के पीछे जमीन की बढ़ती कीमत, डेवलपर मार्जिन और बाजार में मांग एवं आपूर्ति के बदलते समीकरण जैसे कारण प्रमुख हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि निर्माण लागत में सीमेंट, स्टील और श्रम जैसे खर्च शामिल होते हैं, लेकिन जमीन की कीमत इसमें शामिल नहीं होती, ऐसे में जमीन के दाम बढ़ने का सीधा असर घर की अंतिम कीमत पर पड़ता है.
ANAROCK के वाइस चेयरमैन संथोष कुमार के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में बड़े शहरों में जमीन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है. इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से होने वाली कीमतों में बढ़ोतरी, मांग-आपूर्ति का संतुलन, लोकेशन प्रीमियम और डेवलपर्स की प्राइसिंग रणनीति ने आवासीय संपत्तियों के दाम बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.
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NCR और बेंगलुरु में जमीन सबसे ज्यादा महंगी
रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से H1 2026 के बीच देश के सात प्रमुख शहरों में ज्यादातर जगहों पर जमीन की कीमतें 50 से 120 फीसदी तक बढ़ीं, कुछ बाजारों में यह वृद्धि इससे भी अधिक रही. NCR में जमीन की कीमतों में करीब 70-130 फीसदी तक का उछाल दर्ज किया गया, जबकि बेंगलुरु में यह वृद्धि 60-120 फीसदी के बीच रही. इन दोनों बाजारों में जमीन की कीमतों में हुई तेज बढ़ोतरी ने आवासीय संपत्तियों के अंतिम दाम पर खासा असर डाला है.
रियल एस्टेट डेवलपर्स के लिए चुनौती यहीं खत्म नहीं होती, ANAROCK के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण स्टील, ईंधन आधारित लॉजिस्टिक्स, आयातित फिनिशिंग मटेरियल और MEP (मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग) से जुड़े खर्चों में भी तेज बढ़ोतरी हुई है. ANAROCK के अनुसार, इन कारणों से कुल निर्माण लागत पर अनुमानित 8-10 फीसदी का अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. ऐसे में डेवलपर्स के सामने दुविधा है कि बढ़ी हुई लागत का कितना हिस्सा खरीदारों पर डाला जाए और कितना खुद वहन किया जाए, ताकि घरों की बिक्री और मांग पर प्रतिकूल असर न पड़े.
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खरीदारों के लिए बढ़ती अफोर्डेबिलिटी की चुनौती
आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में घर बनाने की लागत और घरों की कीमतों के बीच अंतर लगातार बढ़ा है. निर्माण लागत जहां 34 फीसदी बढ़ी, वहीं आवासीय संपत्तियों के दाम 59 फीसदी तक चढ़ गए. यानी घर की कीमत सिर्फ ईंट, सीमेंट, स्टील और मजदूरी की लागत से तय नहीं हो रही. जमीन, लोकेशन, इंफ्रास्ट्रक्चर, बाजार की मांग और डेवलपर की प्राइसिंग रणनीति अब अंतिम कीमत में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, यही वजह है कि प्रमुख शहरों में घर खरीदने की चुनौती आने वाले समय में और गंभीर हो सकती है.
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