ट्रेन चल रही थी. लोग अपने-अपने सफर में थे. कोई मोबाइल चला रहा था, कोई खिड़की से बाहर देख रहा था और कोई घर पहुंचने का इंतजार कर रहा था. इसी ट्रेन में 21 साल का नितिन कुमार भी बैठा था. वह घर लौट रहा था. उसे क्या पता था कि रास्ते में एक ऐसा शख्स उसकी जिंदगी में दाखिल होने वाला है, जिसकी पहचान को लेकर पुलिस अब कई सवालों के जवाब तलाश रही है.
पुलिस के मुताबिक, इस शख्स ने पहले नितिन को अपने भरोसे में लिया. फिर धमकाया. परिवार से पैसे मांगे. और आखिर में उसके हाथ-पैर बांधकर चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया. नितिन की मौत हो गई. मामला यहीं खत्म हो जाता, अगर पुलिस की जांच में इस आरोपी का पुराना रिकॉर्ड सामने नहीं आता.
पुलिस के मुताबिक, करीब दो साल पहले भी बक्सर में दो युवकों के साथ इसी तरह की घटना हुई थी. उन्हें भी चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था. दोनों बच गए थे. आरोपी उस मामले में जेल गया. सजा काटी. बाहर आया. और अब सितंबर 2026 में नितिन की मौत के मामले में फिर गिरफ्तार हो गया. यानी कहानी में पहले की तरह ट्रेन है. तरीका मिलता-जुलता है. बस इस बार नितिन की जान नहीं बच सकी.
नितिन कुमार वैशाली का रहने वाला था. रोजी-रोटी के लिए हैदराबाद में मजदूरी करता था. 19 सितंबर 2026 को वह ट्रेन नंबर 07091 दानापुर स्पेशल से घर के लिए निकला. परिवार को इंतजार रहा होगा कि बेटा कुछ घंटे बाद घर पहुंच जाएगा. लेकिन नितिन घर नहीं पहुंचा. परिजनों को जब उसके गायब होने की जानकारी मिली तो उन्होंने रेल पुलिस से संपर्क किया. मुकेश राय की ओर से दिए गए बयान के आधार पर बक्सर रेल थाना में मामला दर्ज किया गया.
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पुलिस के सामने शुरुआती जानकारी यही थी कि नितिन को अज्ञात लोगों ने पैसे के लिए अगवा कर लिया है. मामला साधारण गुमशुदगी का नहीं था. ट्रेन में सफर कर रहा एक युवक गायब था और उसके परिवार से पैसे मांगे जाने की बात सामने आ रही थी. पुलिस ने जांच के लिए टीम बनाई. रेल डीएसपी कंचन कुमारी की अगुवाई में टीम ने मामले की पड़ताल शुरू की. फिर जांच एक नाम तक पहुंची. नाम था- रोहित तिवारी.
कभी पुलिस, कभी GRP, कभी STF
अब कहानी का वो हिस्सा सामने आया, जो इस केस को बाकी अपराधों से अलग करता है. रेल डीएसपी कंचन कुमारी के मुताबिक, आरोपी कथित तौर पर अपने शिकार को फंसाने के लिए अलग-अलग पहचान का इस्तेमाल करता था. कभी पुलिस वाला. कभी GRP का सिपाही. कभी STF का आदमी. मतलब सामने वाला अगर उसकी बातों में आ गया, तो उसे लग सकता था कि वह किसी आम आदमी के साथ नहीं, बल्कि किसी सरकारी अधिकारी के साथ है.
पुलिस के मुताबिक, आरोपी इसी भरोसे या डर का इस्तेमाल करके अपने टारगेट चुनता था. नितिन भी कथित तौर पर इसी जाल में फंसा. पहले बातचीत हुई. फिर कथित तौर पर सिगरेट पीने को लेकर उसे परेशान किया गया. बात आगे बढ़ी तो धमकी देने का सिलसिला शुरू हुआ. इसके बाद परिवार के पास फोन गया. पैसे मांगे गए. रकम करीब 10 हजार रुपये बताई जा रही है. लेकिन इस कहानी का अंत पैसे मिलने पर नहीं हुआ.
हाथ-पैर बांधे और ट्रेन से फेंक दिया
पुलिस के मुताबिक, पूछताछ में रोहित ने नितिन को चलती ट्रेन से फेंकने की बात बताई. आरोप है कि नितिन के हाथ-पैर बांधे गए और फिर उसे चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया. इसके बाद नितिन की मौत हो गई. सोचिए उस परिवार के बारे में, जिसका बेटा ट्रेन में घर के लिए बैठा था. घरवालों को उम्मीद थी कि कुछ समय बाद दरवाजे पर नितिन खड़ा होगा. लेकिन घर पहुंचने के बजाय उसकी मौत की खबर पहुंची. और पुलिस की जांच में अब जो कहानी सामने आई, उसमें एक पुराना केस भी जुड़ा हुआ था.
पुलिस के मुताबिक, 2024 में बक्सर के ही दो युवकों के साथ ऐसी ही घटना हुई थी. दोनों को कथित तौर पर चलती ट्रेन से बाहर फेंका गया था. लेकिन किस्मत से दोनों की जान बच गई. उस मामले में आरोपी को सजा हुई और वह जेल चला गया. अब सवाल उठता है - अगर 2024 में हुई घटना के बाद आरोपी को सजा मिली थी, तो जेल से बाहर आने के बाद फिर वही तरीका कैसे सामने आया?
पुलिस के मुताबिक, आरोपी आदतन अपराधी है और उसके खिलाफ पहले भी मामले दर्ज रहे हैं. नितिन केस की जांच में जब पुराना रिकॉर्ड सामने आया तो पुलिस के लिए यह सिर्फ एक नया हत्या का मामला नहीं रहा. पुराने केस और मौजूदा वारदात के बीच संभावित समानताओं की भी पड़ताल शुरू हो गई.
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जांच टीम लगातार आरोपी तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. आखिरकार पुलिस ने रोहित तिवारी को बक्सर और वाराणसी के बीच मोहनसराय इलाके से गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद पूछताछ हुई. पुलिस का दावा है कि पूछताछ में नितिन को ट्रेन से फेंकने की बात सामने आई. आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है. रेल डीएसपी कंचन कुमारी ने बताया कि पुलिस मामले में जल्द से जल्द स्पीडी ट्रायल के जरिए आरोपी को सजा दिलाने की कोशिश करेगी.
ट्रेन में अकेले सफर करने वालों के लिए सवाल
इस केस के सामने आने के बाद कई सवाल उठते हैं. अगर कोई ट्रेन में मिले और खुद को पुलिस वाला बताए, तो यात्री उसकी पहचान कैसे जांचे? अगर कोई अचानक डराने-धमकाने लगे तो आसपास बैठे यात्रियों को क्या करना चाहिए? और सबसे बड़ा सवाल - अगर 2024 की घटना और 2026 की वारदात के तरीके में समानता है, तो क्या पुलिस के सामने आरोपी के पुराने मामलों की और भी कड़ियां खुल सकती हैं? इन सवालों के जवाब जांच के बाद सामने आएंगे.
फिलहाल पुलिस के मुताबिक, कहानी में एक पैटर्न दिखाई दे रहा है. पहले किसी यात्री के करीब जाना. फिर पहचान और रुतबे का इस्तेमाल करना. फिर डराना. परिवार से पैसे मांगना. और आखिर में कथित तौर पर चलती ट्रेन से बाहर फेंक देना. 2024 में दो युवक इस तरीके से बच गए थे. 2026 में नितिन नहीं बच सका.
एक ट्रेन, दो साल और तीन शिकार
इस पूरी कहानी की सबसे खौफनाक कड़ी शायद यही है. साल 2024 में दो युवक. साल 2026 में नितिन. और तीनों मामलों में ट्रेन. पहले दो युवकों की जान बच गई. नितिन की जान चली गई. पुलिस अब आरोपी के पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा मामले की कड़ियों को जोड़ रही है. नितिन के परिवार के लिए यह सिर्फ एक क्राइम केस नहीं है. उनके लिए यह उस सफर की कहानी है, जो घर पहुंचने के लिए शुरू हुआ था और रास्ते में ही खत्म हो गया. सवाल है कि क्या रोहित तिवारी के अपराध का दायरा उतना ही है, जितना अभी पुलिस की जांच में सामने आया है, या इस कहानी के कुछ और पन्ने भी बाकी हैं. फिलहाल जांच जारी है.
पुष्पेन्द्र कुमार पाण्डेय