साल था 1951. आचार्य विनोबा भावे ने इसी साल भूदान आंदोलन की शुरुआत की थी. उन्होंने इसे भूदान यज्ञ कहा और जमींदारों के कब्जे से बड़ा भू-भाग छुड़ाकर भूमिहीनों को रहने के लिए जगह दिलवायी. ये काम आसान नहीं था, लेकिन संत विनोबा को बस एक ही बात का आसरा था.
वह कहते थे- 'सबै भूमि गोपाल की, तामें अटक कहां? जाके मन में अटक है, सोई अटक रहा'
यानी ये सारी भूमि श्रीकृष्ण (गोपाल) की है और इसमें सभी को बराबरी से रहने का हक है. सभी उनके ही लोग हैं.
वाकई जब हम मोरपंख धारी, पीतांबर ओढ़ने वाले, वंशीधर, चेहरे पर चपलता और होठों पर मोहिनी मुस्कान लिए भगवान श्रीकृष्ण की छवि को देखते हैं तो पैरों के नीचे की धरती चाहे जिस देश, प्रदेश और शहर की सीमा में आती हो, उस पल भर के लिए तो उसे भूल ही जाते हैं. सिर्फ याद रह जाते हैं तो श्रीकृष्ण.
देवकी और वसुदेव के आठवें पुत्र, नंदगांव में माखनचोर, गोकुल में गोपाल, वृंदावन में बांके बिहारी, नाथद्वारा में गोवर्धनधारी, श्रीनाथजी और द्वारका पहुंचते-पहुंचते द्वारकाधीश, राजा हो जाते हैं. यानी कृष्ण भी एक हैं, उनकी कहानियों का भाव भी एक है, लेकिन भारत के अलग-अलग इलाकों ने अपनी लोक परंपराओं में श्रीकृष्ण को अपने-अपने अनुसार ढाल लिया है.
कृष्ण के बदलते रूपों की यात्रा की स्वाभाविक शुरुआत ब्रज से होती है. उनकी कहानियां अलग-अलग पुराणों में हैं, लेकिन जन्म से लेकर और जीवन भर की कहानियों का विस्तार से वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है. जहां इन्हें 'लीला' कहा गया है.
बचपन की चमत्कारी कहानियों के मामले में श्रीकृष्ण की कथा श्रीराम से कहीं आगे निकल जाती है. कृष्ण जन्म के अगले ही पल के साथ चमत्कारी कहानियों का सिलसिला शुरू हो जाता है. जेल के द्वार खुलना, पूतना वध, कालिया नाग पर नियंत्रण, पर्वत उठा लेना, कंस के भेजे राक्षसों को खेल-खेल में मार डालना और फिर किशोर उम्र में ही कंस का भी वध कर देना. इस तरह की जिन कहानियों ने भारतीय मानस में श्रीकृष्ण के लिए सबसे गहरी जगह बनाई, उनका भूगोल मुख्यतः ब्रज है.
भागवत के दशम स्कंध के अध्याय 21 में कृष्ण की बांसुरी और उससे मोहित होती गोपियों का वर्णन मिलता है. इसी ब्रज-भाव ने आगे चलकर कृष्ण के उस स्वरूप को सबसे ज्यादा सामने रखा जिसमें वे किसी साम्राज्य के राजा नहीं बल्कि गाय चराने वाले साधारण से गोपालक हैं. राधा के लिए बड़े ही साधारण से प्रेमी हैं और ब्रजवासियों के अपने कान्हा हैं. वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में इसी भाव की चरम अभिव्यक्ति दिखाई देती है.
हालांकि बांके बिहारी मंदिर का इतिहास 16वीं सदी से सामने आता है. मान्यता है कि संत और संगीतज्ञ स्वामी हरिदास इन्हीं बांके बिहारी के भक्त थे और उनके राग गायन से प्रभावित होकर श्रीराधा कृष्ण ने उन्हें युगल रूप में दर्शन दिया था. उनकी यही छवि बाद में विग्रह के रूप में स्थापित हुई.
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'बांके' को उनकी त्रिभंगी मुद्रा से जोड़ा जाता है, जबकि 'बिहारी' का भाव विहार करने वाले से है. यहां कृष्ण का आकर्षण उनकी इस खासियत में है, जहां भक्त और भगवान के बीच दूरी मिट जाती है और दोनों ही एक-दूसरे के लिए एक ही भाव में पागल और व्याकुल नजर आते हैं. यही ब्रज की कृष्ण भक्ति की खासियत है.
इसी तरह राजस्थान के नाथद्वारा के श्रीनाथजी महाराज भी हैं तो ब्रज परंपरा के ही, लेकिन उनका स्वरूप उनकी गोवर्धन धारण की कथा वाला है. राजे-रजवाड़े से लेकर सेठों-सरदारों की पूजा-परंपरा में भी श्रीनाथ जी शामिल हैं. 17वीं शताब्दी में मुगल दौर में इसी विग्रह को ब्रज से सुरक्षित स्थान की ओर ले जाया गया. नाथद्वारा मंदिर के इतिहास के अनुसार 1670 में श्रीनाथजी गोवर्धन से रवाना किए गए और 1672 में मेवाड़ में स्थापित किए गए और नाथद्वारा के श्रीनाथ जी कहलाए.
आज जो लड्डू गोपाल जी वाली पूजा-परंपरा हर जगह दिखाई दे रही है वह श्रीनाथ जी की 'पुष्टिमार्गी सेवा' परंपरा से ही मिलती-जुलती है. भाव ऐसा है कि श्रीकृष्ण को एक ही समय में अपना बालक मानकर उनसे ममता भी दिखाई जाती है और उन्हें ईश्वर भी माना जाता है. पुष्टिमार्ग की 'सेवा' परंपरा में श्रीकृष्ण (श्रीनाथ जी) को जीवित बालक की तरह जगाया जाता है, उनका श्रृंगार होता है, भोजन कराया जाता है और विश्राम भी कराया जाता है.
श्रीनाथजी की आठ प्रहर (अष्टयाम सेवा) की सेवा में मंगला से शयन तक भगवान के वस्त्र, भोजन और भाव बदलते रहते हैं. नाथद्वारा की परंपरा श्रीनाथजी को गोवर्धननाथ भी कहती है और एक शिशु रूप में भी उन्हें न सिर्फ पूजती है, बल्कि उनका लालन-पालन भी करती है.
इस तरह ब्रज के गोवर्धनधारी बाल श्रीकृष्ण राजस्थान पहुंचकर श्रीनाथजी बने और उनके आसपास चित्रकला, संगीत, वस्त्र, भोजन और हवेली-संस्कृति की पूरी दुनिया विकसित हो गई. अब यहां से भारत के पश्चिमी छोर की ओर बढ़ें तो इसी कथा-यात्रा में श्रीकृष्ण का एक और प्रसिद्ध नाम सामने आता है 'रणछोड़राय'
कहानी ऐसी है कि जब श्रीकृष्ण को लगा कि वह जरासंध और कालयवन से संघर्ष में व्यर्थ ही उलझ रहे हैं तो उन्होंने उससे निकलना ही ठीक समझा. नतीजा श्रीकृष्ण ने कालयवन की चुनौती का सीधा जवाब नहीं दिया और भागने लगे. इस तरह कालयवन कृष्ण की नीति में फंसकर महाराज मुचुकुंद की क्रोधाग्नि में भस्म हो गया.
उधर श्रीकृष्ण ने जरासंध के आक्रमणों से यादवों को सुरक्षित करने के लिए समुद्र तट पर नई नगरी द्वारका बसाई और द्वारकाधीश कहलाए. यानी माखन चोरी, रासलीला, गोवर्धन धारण, कंस वध से होते हुए उनका ये सफर द्वारका तक पहुंचता है और श्रीकृष्ण बन जाते हैं द्वारका के स्वामी.
भारत में श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उनको पुकारने वालों ने उन्हें जब जैसा चाहा, उसी नाम से पुकारा. इससे भी बड़ी बात है कि श्रीकृष्ण ने हर एक नाम को अपने जीवन में खास जगह दी. न सिर्फ अपने युग में रहते हुए, बल्कि बाद के दौर में भी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पुरी में मिलता है.
पुरी से जुड़ी एक प्रचलित धार्मिक मान्यता इसे कृष्ण के देहावसान से जोड़ती है. कथा है कि भालका तीर्थ में श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद उनका एक पवित्र अवशेष नष्ट नहीं हुआ और आगे चलकर उसे पुरी के दारु-विग्रह से जोड़ा गया. यहां द्वारका के कृष्ण एक नए और कहीं अधिक व्यापक नाम ‘जगन्नाथ’, यानी जगत के स्वामी के रूप में दिखाई देते हैं. इस तरह उनका रिश्ता सारी दुनिया से ही जुड़ जाता है. वह हर किसी के हो जाते हैं और हर कोई उनका हो जाता है.
इसी भावना के साथ अब दक्षिण की ओर बढ़िए. श्रीकृष्ण की जीवन-कथा का बड़ा और प्रसिद्ध हिस्सा उत्तर और पश्चिम भारत में दिखाई देता है, लेकिन उनकी भक्ति इन भौगोलिक सीमाओं में कभी नहीं बंधी. सुदूर दक्षिण में भी कृष्ण स्थानीय भाषाओं, मंदिरों और भक्ति-परंपराओं में उतनी ही गहराई से रचे-बसे नजर आते हैं.
यहां कृष्ण भक्ति को गहराई देने में तमिल आलवार संतों की बड़ी भूमिका रही. छठी से नौवीं सदी के बीच आलवारों ने विष्णु-कृष्ण को तमिल भक्तिकाव्य का हिस्सा बनाया. पेरियालवार ने कृष्ण को वात्सल्य भाव से देखा तो उनकी पुत्री आंडाल की रचनाओं में कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण दिखाई देता है.
खास बात है कि चेन्नई के तिरुवल्लिकेणी स्थित पार्थसारथी मंदिर में कृष्ण बांसुरी बजाने वाले गोपाल नहीं हैं, बल्कि अर्जुन के सारथी हैं. यह स्वरूप उनके मार्गदर्शक और गीता का उपदेश देने वाले गुरु रूप को सामने लाता है. मंदिर तमिल वैष्णव परंपरा के 108 दिव्यदेशम में शामिल है. केरल पहुंचने पर यही कृष्ण गुरुवायुरप्पन कहलाते हैं. यहां विष्णु-कृष्ण स्वरूप के साथ बाल कृष्ण का वात्सल्य भाव भी गहराई से जुड़ा है. 16वीं शताब्दी में मेलपत्तूर नारायण भट्टतिरि ने गुरुवायूर के भगवान को समर्पित प्रसिद्ध 'नारायणीयम्' की रचना की थी.
उधर महाराष्ट्र के पंढरपुर में तो श्रीकृष्ण अपने भक्त के प्रेम में व्याकुल नजर आते हैं. वारकरी परंपरा की कथा के मुताबिक अपने भक्त पुंडलीक को दर्शन देने जब श्रीकृष्ण उनके द्वारे पहुंचे तो भक्त पुंडलीक पिता की सेवा में लगे थे. उन्होंने द्वार पर आए भगवान की ओर एक ईंट सरका दी और थोड़ा इंतजार करने को कहा.
जहां भक्ति गहरी होती है वहां भगवान भी भक्तों की बात को आदेश जैसा ही मानते हैं. श्रीकृष्ण उसी ईंट पर कमर पर हाथ रखकर खड़े हो गए और पुंडलीक के इंतजार में विठोबा कहलाए. इसी विठोबा के आसपास वारकरी भक्ति परंपरा विकसित हुई, जिसे संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत तुकाराम जैसे संतों ने जन-जन तक पहुंचाया.
श्रीकृष्ण के इतने सारे रूपों को ध्यान से देखिये तो गीता के 11वें अध्याय में आया उनका विश्वरूप बड़ी सहजता से आंखों के सामने तैरने लगता है. जहां श्रीकृष्ण सिर्फ देश-समाज की सीमा से ही नहीं बल्कि काल और ब्रह्मांड की सीमा से भी परे दिखाई देते हैं. वह कब एक माखनचोर-गोपालक से ब्रह्मांडनायक, जगद्गुरु बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता. तब सिर्फ मुंह से इतना ही निकलता है, कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् यानी, अखिल विश्व के मार्गदर्शक श्रीकृष्ण को प्रणाम्.
दरअसल श्रीकृष्ण के क्षेत्रीय रूप केवल प्रतिमाओं का अंतर नहीं बताते, बल्कि भक्त और भगवान के बदलते रिश्ते को दिखाते हैं. नाम, भाषा, वेश और पूजा-पद्धति बदलती रहती है, लेकिन केंद्र में श्रीकृष्ण ही रहते हैं. तभी तो विनोबा के विचार 'सबै भूमि गोपाल की' का स्पष्ट अर्थ समझ में आता है. श्रीकृष्ण की इस पूरी सांस्कृतिक यात्रा का सार भी यही है, जो बाबा तुलसी श्रीराम के लिए लिख गए हैं कि 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.'
कहने का मतलब है कि सीमाएं, नक्शे और भूगोल भले बदलते रहें, लेकिन श्रीकृष्ण नहीं बदलते. जो उन्हें जिस भाव से देखता है, कृष्ण उसे उसी रूप में दिखाई देते हैं. जय श्रीकृष्ण.
विकास पोरवाल