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'जंग आपने शुरू की, कीमत हम चुका रहे...' ट्रंप से खफा हुए खाड़ी मुल्कों के नेता

यूरेशिया ग्रुप में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका मामलों के निदेशक फिरास मक्सद का कहना है कि फारस की खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों को लगता है कि उन्हें एक ऐसे युद्ध में "बेवजह उलझाया गया" जिसे सुलझाने के लिए ट्रंप अब संघर्ष कर रहे हैं.

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खाड़ी देशों के दोस्त ट्रंप से नाराज़(File photo: Reuters)
खाड़ी देशों के दोस्त ट्रंप से नाराज़(File photo: Reuters)

खाड़ी देश सुरक्षा के करीबी साझेदार और हथियारों की आपूर्ति के लिए वाशिंगटन पर निर्भर बने हुए हैं. कतर और बहरीन में बड़े अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं. खाड़ी देश के एक अधिकारी ने नाम न बताए जाने की शर्त पर कहा कि ट्रंप ने युद्ध शुरू किया लेकिन इसकी कीमत हमें चुकानी पड़ रही है. 

एक वरिष्ठ यूरोपीय अधिकारी का कहना है कि पिछले सप्ताह सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ आपसी रक्षा समझौता "अमेरिका के लिए एक संकेत" था. खाड़ी देशों के नेताओं के नियमित संपर्क में रहने वाले अधिकारी का कहना है कि यह समझौता दर्शाता है कि शक्तिशाली सुन्नी देश अपने रक्षा साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि उनकी नजर में अमेरिका ही काफी नहीं है. 

जबकि व्हाइट हाउस के एक अधिकारी का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप के सभी खाड़ी साझेदारों के साथ असाधारण संबंध रहे हैं. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस के नियमों के तहत पहचान गुप्त रखने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया, "अमेरिका 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' से पहले से ही हमारे सभी क्षेत्रीय सहयोगियों के नियमित संपर्क में रहा है."

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यूरेशिया ग्रुप में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका मामलों के निदेशक फिरास मक्सद का कहना है कि शुरुआत से ही निराशा देखी गई है. उनका कहना है कि फारस की खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों को लगता है कि उन्हें एक ऐसे युद्ध में "बेवजह उलझाया गया" जिसे सुलझाने के लिए ट्रंप अब संघर्ष कर रहे हैं.

यह भी पढ़ें: ईरान जंग के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने लिया ऐसा फैसला, गदगद हुआ चीन!

वाशिंगटन स्थित अरब गल्फ स्टेट्स इंस्टीट्यूट की फेलो एना जैकब्स ने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका पर भरोसा कम होते जा रहा है. उन्होंने कहा कि अमेरिका के सहयोगी देशों का मानना ​​है कि इस इलाके में अमेरिकी व्यवहार से उनकी सुरक्षा बढ़ने की बजाय कम हो रही है.

इस इलाके में मौजूद एक पश्चिमी राजनयिक का कहना है कि इन बदलावों से अमेरिका के प्रति लोगों की सोच में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. उन्होंने कहा कि ईरान के साथ जंग होने से पहले ही इस इलाके में अमेरिकी सेना का बहुत जोश के साथ स्वागत नहीं किया जाता था. 

हाल के हफ़्तों में सऊदी अरब पर खासा दबाव बढ़ा है. इराक में ईरान और ईरानी समर्थित गुटों के हमलों के अलावा, यमन में ईरान के करीबी हूथी विद्रोहियों ने भी सऊदी अरब को निशाना बनाया था. हूथी सेना ने कई बार सऊदी अरब के ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए हैं. बताया गया है कि वे लाल सागर के मुहाने पर मौजूद बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) को बंद करने की कोशिश कर रहे हैं. जब से ईरान ने युद्ध के शुरुआती दिनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद किया है तब से सऊदी अरब अपने तेल के निर्यात के लिए लाल सागर में मौजूद बंदरगाहों पर निर्भर रहा है.

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खाड़ी देशों की भी समय-समय पर युद्ध को लेकर सोच बदली है. ओमान ने जहां शुरू से ही इस संघर्ष का विरोध किया है वहीं सऊदी अरब, UAE और बहरीन ने कई बार इसका समर्थन किया है. 

यूरोप के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि अबू धाबी और रियाद में यह सोच थी कि एक तेज़ और निर्णायक जीत फायदेमंद साबित हो सकती है. हालांकि अधिकारी ने बताया कि अप्रैल में ईरान और अमेरिका के बीच पहले दौर की बातचीत से ठीक पहले यह सोच बदलने लगी थी. ऐसा तब हुआ जब यह साफ हो गया कि न तो ईरानी सरकार गिरेगी और न ही वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलेगी.

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक,  व्हाइट हाउस के अधिकारी ने कहा कि ट्रंप इस बात को लेकर हमेशा स्पष्ट रहे हैं कि वे कूटनीति को प्राथमिकता देंगे. व्हाइट हाउस के अधिकारी का कहना है कि ईरान ने अमेरिकी सैनिकों की हत्या करके, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी हरकतें करके और इलाके में अपने पड़ोसियों पर हमले करके हिंसा का रास्ता अपनाया, इन सबके बाद कमांडर-इन-चीफ़ ने यह पक्का किया कि उन्हें उन फ़ैसलों का नतीजा भुगतना पड़े.

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पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में कुवैत और इराक में अमेरिकी राजदूत रहे डगलस सिलिमन का कहना है कि हाल के दौर में उन्हें खाड़ी देशों में अमेरिका के प्रति नाराजगी दिखी. हालांकि, उनका कहना है कि अब लोगों में ईरान के खिलाफ भी गुस्सा बढ़ता दिख रहा है क्योंकि ईरान लगातार बुनियादी ढांचों पर हमले कर रहा है. साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने से भी इनकार कर रहा है. 

फिलहाल डगलस सिलिमन अरब गल्फ स्टेट्स इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष हैं. उन्होंने खाड़ी देशों की स्थिति को अजीब विरोधाभास बताया है. उनका कहना है कि एक ओर ये देश जंग शुरू करने के लिए अमेरिका से नाराज हैं और वहीं दूसरी ओर हथियार, गोला-बारूद और खुफिया जानकारी के लिए अमेरिका पर ही निर्भर हैं. 

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