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जिसपर अरबों डॉलर फूंके वो निकला 'फुस्स पटाखा', ट्रंप से डील कर ठगा सा महसूस कर रहे खाड़ी देश

अमेरिका ने खाड़ी देशों को THAAD और पैट्रियट मिसाइल सुरक्षा सिस्टम दिए थे. लेकिन ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों के सामने ये असफल साबित हुए हैं. अमेरिकी रक्षा कंपनियों के दावों के बावजूद, ये सिस्टम हमलों को रोकने में नाकाम रहे. इस विफलता ने क्षेत्रीय सुरक्षा को गंभीर संकट में डाल दिया है.

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खाड़ी देशों पर कई सीधे हमले हुए. (Image: Reuters)
खाड़ी देशों पर कई सीधे हमले हुए. (Image: Reuters)

खाड़ी देशों के लिए अमेरिका ने जिस सुरक्षा कवच का वादा किया था, उसका सबसे बड़ा आधार उसकी मिसाइल सिक्योरिटी सिस्टम था. इनमें लॉकहीड मार्टिन का THAAD (टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस) और पैट्रियट PAC-3 बैटरी शामिल थे.

अमेरिकी रक्षा कंपनियों ने हमेशा इन्हें 'गोल्ड स्टैंडर्ड' यानी दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक के रूप में बेचा. दावा था कि ये सिस्टम ईरान जैसी ताकतों की बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों को हवा में ही तबाह कर देंगे. लेकिन इस जंग ने इन दावों का पर्दाफाश कर दिया है.

मई 2025 में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रियाद की यात्रा की और सऊदी अरब के साथ $142 अरब के ऐतिहासिक हथियार पैकेज पर हस्ताक्षर किए. इसमें भारी संख्या में THAAD सिस्टम, पैट्रियट अपग्रेड और बेहतरीन मिसाइलें शामिल थीं. इसका मकसद सऊदी सेना को एडवांस उपकरणों से लैस करना था ताकि ईरान और उसके समर्थित समूहों के खतरों का सामना किया जा सके.

नौ महीने बाद, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए, तो ईरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की. खाड़ी देशों ने जिस सुरक्षा कवच के लिए अरबों डॉलर खर्च किए थे, वो बुरी तरह नाकाम साबित हुए. जलते हुए सैन्य उपकरणों की तस्वीरों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया.

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जब 'सुरक्षा ढाल' में छेद हुए

ईरान ने 400 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलों और लगभग 1,000 ड्रोनों के साथ जवाबी हमला किया. ये हमला बहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, ओमान और यूएई के ऊपर से गुजरा. हमले सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि शहरों, ऊर्जा केंद्रों और एयरपोर्ट पर भी गिरे.

सीएनएन (CNN) ने जो सैटेलाइट तस्वीरें जारी की थीं, उसमें हकीकत साफ झलक रही थी. सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर THAAD रडार (AN/TPY-2), जिसे सिस्टम की 'आंखें' कहा जाता है, जलकर मलबे में तब्दील हो गया. जॉर्डन में मुवाफ्फाक साल्ती एयर बेस पर रडार साइट पर गहरे गड्ढे और काला मलबा देखा गया.

यूएई में अल रुवैस के पास THAAD बैटरी पर कई सीधे हमले हुए. पैट्रियट सिस्टम भी इतनी बड़ी संख्या में आए प्रोजेक्टाइल्स का सामना नहीं कर पाए. ईरान के कम लागत वाले ड्रोन झुंडों ने अमेरिकी मैगजीन को खाली कर दिया.

यह भी पढ़ें: THAAD पर फसाद... अमेरिका की खातिर चीन से टकराया था साउथ कोरिया, अब मिला सबक

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस संकट को स्वीकार करते हुए कहा, 'ईरान हर महीने 100 से ज्यादा ऐसी मिसाइलें बना रहा है. इसकी तुलना उन छह या सात इंटरसेप्टर से करें जो एक महीने में बनाए जा सकते हैं.'

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खाड़ी देशों को इस नाकामी का अंदेशा पहले से था. मार्च 2023 में, चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान ने बीजिंग में अपने रिश्ते बहाल कर लिए थे. सऊदी अरब अब सिर्फ वाशिंगटन पर निर्भर रहने के बजाय अपने सुरक्षा विकल्पों में विविधता ला रहा है.

इस साल की शुरुआत में जब संघर्ष बढ़ा, तो सऊदी अरब ने अमेरिका को अपने एयरस्पेस या सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए करने से साफ मना कर दिया. खाड़ी देशों को डर था कि अमेरिकी कार्रवाई का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा और हुआ भी वही.

'शेल्फ गेम' और भविष्य का संकट

मिसाइलों की कमी को पूरा करने के लिए पेंटागन ने दक्षिण कोरिया से THAAD बैटरियां हटाकर मिडिल ईस्ट भेजना शुरू कर दिया है. दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के कड़े विरोध के बावजूद ये कदम उठाया गया, जिससे अब उत्तर कोरिया के खिलाफ दक्षिण कोरिया की सुरक्षा कमजोर हो गई है.

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आज सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देश एक कड़वी सच्चाई का सामना कर रहे हैं. जिस सुरक्षा कवच को अभेद्य बताकर बेचा गया था, वो लीकेज साबित हुआ है. अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी वो असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. जैसा कि विशेषज्ञ कह रहे हैं, 'THAAD एक धमाके के साथ गिरा, जैसे एक अरब डॉलर का फुस्स पटाखा (dud) हो.'

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