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'अमेरिकी ठिकाने हम पर बोझ हैं', ईरान जंग में भारी नुकसान के बीच भड़के UAE स्कॉलर

यूएई को ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष में भारी नुकसान हुआ है. ईरान ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर यूएई में सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं. यूएई ने अकेले ही इन हमलों का सामना किया और अमेरिका इजरायल को बचाने में लगा रहा. ईरान युद्ध ने खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा के प्रति अविश्वास पैदा किया है और अब वहां के बुद्धिजीवी अमेरिकी ठिकानों का विरोध कर रहे हैं.

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यूएई नेतृत्व के करीबी स्कॉलर ने कहा है कि अब यूएई को अमेरिका की जरूरत नहीं है (Photo: Reuters)
यूएई नेतृत्व के करीबी स्कॉलर ने कहा है कि अब यूएई को अमेरिका की जरूरत नहीं है (Photo: Reuters)

ईरान अमेरिका की जंग में खाड़ी देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को भारी नुकसान पहुंचा है. इस नुकसान के बीच यूएई नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले वरिष्ठ स्कॉलर अब्दुलखालेक अब्दुल्ला ने कहा है कि यूएई को अब अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने पर विचार करना चाहिए, क्योंकि वे रणनीतिक संपत्ति नहीं बल्कि बोझ बन चुके हैं. 

यूएई के प्रमुख स्कॉलर अब्दुलखालेक अब्दुल्ला ने रविवार शाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर यह टिप्पणी की. उन्होंने इससे पहले रॉयटर्स से बातचीत में भी इसी तरह की बात कही थी.

अब्दुल्ला ने लिखा, 'यूएई को अब अपनी रक्षा के लिए अमेरिका की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसने ईरानी आक्रामकता के दौरान साबित कर दिया है कि वो खुद शानदार तरीके से अपनी रक्षा करने में सक्षम है.'

उन्होंने आगे कहा, 'यूएई को जरूरत सिर्फ अमेरिका के पास मौजूद सबसे बेहतरीन और आधुनिक हथियार हासिल करने की है. इसलिए अब अमेरिकी ठिकानों को बंद करने पर विचार करने का समय आ गया है, क्योंकि वे बोझ हैं, रणनीतिक संपत्ति नहीं.'

ईरान जंग में खाड़ी देशों को छोड़ इजरायल को बचाने में लगा रहा अमेरिका

ईरान जंग के दौरान ईरान ने सऊदी, यूएई, कतर समेत लगभग सभी खाड़ी देशों पर बड़े हमले किए. ईरान ने इन हमलों से क्षेत्र में अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की. हमले नागरिक ढांचे पर भी हुए जिससे तेल संपन्न खाड़ी देशों को भारी नुकसान हुआ.

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जब इन देशों पर ईरान के ताबड़तोड़ हमले हो रहे थे तब अमेरिका उनकी मदद के लिए कहीं नहीं था. ट्रंप प्रशासन का पूरा फोकस ईरानी हमले झेल रहे इजरायल की रक्षा करने पर था. इससे खाड़ी देशों में गलत संदेश गया और उन्हें समझ आ गया कि सुरक्षा के लिए अकेले अमेरिका पर निर्भरता ठीक नहीं है.

सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ अपने सुरक्षा सहयोग को बढ़ाया है और यूएई भारत के साथ अपने रक्षा संबंध मजबूत कर रहा है. खाड़ी देश रूस और चीन के साथ भी अपना सहयोग बढ़ा रहे हैं.

मध्य-पूर्व में अमेरिका के कितने सैन्य ठिकाने और सैनिक हैं?

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अनुसार, अमेरिका के मध्य पूर्व में कम से कम 19 सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें से आठ को स्थायी माना जाता है. रक्षा अधिकारियों के अनुसार, युद्ध से पहले इस क्षेत्र में करीब 40,000 अमेरिकी सैनिक तैनात थे.

इनमें से लगभग 3,500 सैनिक संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में मौजूद हैं. इसके अलावा वहां अल-धफरा एयरबेस भी है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका, फ्रांस और यूएई संयुक्त रूप से करते हैं.

28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमले शुरू किए थे जिसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इजरायल और खाड़ी में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया.

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ईरानी हमलों में यूएई को भारी नुकसान

ईरान के हमलों में यूएई को विशेष रूप से भारी नुकसान झेलना पड़ा, जहां सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल हमले हुए. मार्च के आखिर तक ईरान यूएई पर 398 बैलिस्टिक मिसाइलें, 1,872 ड्रोन और 15 क्रूज मिसाइलें दाग चुका था.

युद्ध के कारण यूएई को दशकों के सबसे गंभीर आर्थिक झटके का सामना करना पड़ रहा है. देश की अर्थव्यवस्था पर्यटन, रियल एस्टेट, लॉजिस्टिक्स और वित्तीय सेवाओं पर काफी निर्भर है.

बताया गया है कि पिछले कुछ हफ्तों में दुबई और अबू धाबी स्टॉक एक्सचेंजों के बाजार पूंजीकरण से 120 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम साफ हो चुकी है. साथ ही 18,400 से ज्यादा उड़ानें भी रद्द हुई हैं.

मार्च के अंत तक दुबई का रियल एस्टेट इंडेक्स युद्ध शुरू होने के बाद से कम से कम 16 प्रतिशत गिर चुका था.

हालांकि यूएई पर हुए अधिकांश हमलों को रोक दिया गया, लेकिन मलबे से अबू धाबी और दुबई में नुकसान हुआ. इसमें बुर्ज अल अरब, पाम जुमेराह, दुबई एयरपोर्ट और फुजैरा तेल औद्योगिक क्षेत्र शामिल हैं. ईरान के हमलों ने यूएई की उस छवि को भारी नुकसान पहुंचाया है जिसमें वो निवेशकों और पर्यटकों के सामने खुद को बहुत अधिक सुरक्षित और स्थिर देश के रूप में पेश कर रहा था.

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