पिछले चार हफ्तों से अशरफ वानी एक ऐसी कहानी के भीतर जी रहे हैं, जिसे दुनिया के ज्यादातर लोग केवल टुकड़ों में देखते हैं- सुर्खियों में, छोटे वीडियो में, या उन आंकड़ों में जो इंसानी ज़िंदगियों को महज नंबरों में बदल देते हैं.
दक्षिणी लेबनान अब सिर्फ नक्शे पर एक जगह नहीं रह गया है. यह एक युद्धभूमि बन चुका है. एक ऐसा बदलता हुआ परिदृश्य जहां पूरे-के-पूरे गांव खाली हो चुके हैं, जहां रास्ते सन्नाटे की ओर जाते हैं, और जहां गवाह होना ही एक तरह का जोखिम बन गया है.
अशरफ वहां पहुंचे, जब ज़्यादातर लोग वहां से जा रहे थे. परिवारों के काफिले उत्तर की ओर बढ़ रहे थे. गाड़ियों में जरूरत से ज़्यादा सामान, छतों पर बंधे गद्दे, बच्चों के हाथों में जो कुछ बचा था, निकासी के आदेशों ने कस्बों को रातों-रात वीरान कर दिया. दरवाजे हवा में झूल रहे थे. दुकानें खुली थीं, लेकिन खाली. यहां तक कि आवारा जानवर भी इस अचानक ख़ालीपन से उलझन में थे.
लेकिन अशरफ रुके रहे, क्योंकि किसी को देखना था, और किसी को बताना था.
उन्होंने जो देखा, वह सिर्फ तबाही नहीं थी, वह अधूरापन था. ज़िंदगियां जैसे बीच में ही रुक गई हों. रसोई में चूल्हे पर रखा बर्तन, आंगन में पड़ा स्कूल बैग, रस्सी पर टंगे कपड़े, जो दिनों से वैसे ही पड़े हैं. यह हिंसा सिर्फ इमारतों को नहीं तोड़ती, यह जीवन की निरंतरता को तोड़ देती है.
घर इस तरह तबाह किए जाते हैं कि वे अपने ही भीतर ढह जाते हैं. पुलों को बम से उड़ा दिया जाता है, जिससे जो थोड़ी बहुत आवाजाही बची है, वह भी खत्म हो जाती है. सड़कें अब रास्ते नहीं रहीं, वे मलबे और गड्ढों में बदल चुकी हैं और जो लोग बचाने आते हैं, राहत दल- वे भी इस हमले से अछूते नहीं हैं.
यहां कुछ भी सुरक्षित नहीं है. न घर, न ढांचा, न ही वे लोग जो दूसरों को बचाने की कोशिश करते हैं.
एक पत्रकार के लिए, यहां चुनौती सिर्फ शारीरिक नहीं है, यह अस्तित्व से जुड़ी है.
इन खाली कराए गए गांवों में रिपोर्ट करना ऐसा है जैसे आप अपनी पहचान खो देते हों. यहां जो भी बचा है, उसे आम नागरिक नहीं समझा जाता, बल्कि शक की नजर से देखा जाता है. ऊपर से देखने वालों के लिए गवाह और लड़ाके के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.
अशरफ बताते हैं कि हर पल एक हिसाब चलता रहता है— कब चलना है, कहां रुकना है, कितनी देर ठहरना है. आसमान अब सिर्फ आसमान नहीं है, वह खतरे का संकेत है. दूर से आती विमान की आवाज एक चेतावनी बन जाती है. हर ध्वनि का मतलब होता है.
यहाँ कोई सुरक्षित जगह नहीं है— बस कुछ पल होते हैं, जो थोड़े कम खतरनाक लगते हैं.
संचार भी एक लड़ाई है. नेटवर्क बार-बार चला जाता है. बिजली नहीं रहती. एक छोटी-सी रिपोर्ट भेजने में घंटों लग जाते हैं. कभी-कभी सिग्नल पाने के लिए खुले और जोखिम भरे इलाकों में जाना पड़ता है.
लेकिन सबसे भारी चीज डर नहीं है, सबसे भारी है जिम्मेदारी.
क्योंकि जो अशरफ देख रहे हैं, वह सिर्फ मलबा नहीं है. उस मलबे में छिपी इंसानी कहानियां हैं. वे ज़िंदगियाँ जो इन घरों में थीं, वे आवाज़ें जो अब नहीं सुनाई देतीं, या जिन्हें कहीं और खामोश कर दिया गया है.
वह उन गांवों में चलते हैं जहां समय ठहर गया है. टूटे हुए फोटो फ्रेम, धूल में दबे बच्चों के खिलौने, ऐसे दरवाजे जो अब कहीं नहीं खुलते. हर चीज एक सबूत है, हर तस्वीर एक गवाही.
कभी-कभी डर बहुत करीब आ जाता है- जब कोई हमला पास गिरता है, जब जमीन कांपती है, जब शरीर भागने को कहता है, लेकिन कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जब सन्नाटा खुद एक आवाज बन जाता है और उन पलों में यह काम और भारी हो जाता है, क्योंकि अब वहां कोई नहीं बचा, जो अपनी कहानी खुद सुना सके, तो वह उनकी तरफ से बोलते हैं.
यहां रहना मतलब यह समझना है कि दिखाई देना भी खतरा है. कैमरा या नोटबुक आपको सुरक्षित नहीं बनाते. कई बार वे आपको और ज्यादा असुरक्षित बना देते हैं. खाली घोषित जगह में मौजूद होना ही आपको निशाना बना सकता है.
फिर भी, वहां से चले जाना एक और तरह की हार होगी. इसका मतलब होगा- खामोशी की जीत.
इसलिए अशरफ वानी वहीं रहते हैं- दक्षिण के उन खाली पड़े कस्बों और गांवों में, जहां अब भी जिंदगियों की गूंज मौजूद है और वह उस सच्चाई को दर्ज करते हैं, जो तब भी जारी रहती है जब वहां किसी के होने की उम्मीद नहीं की जाती.
क्योंकि एक ऐसी लड़ाई में, जहां गवाह भी निशाने पर हैं, सच को दर्ज करना सिर्फ पेशा नहीं रह जाता, यह खुद सच के ज़िंदा रहने की जद्दोजहद बन जाता है.