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सऊदी, कतर, तुर्की... यूरोप दूर खड़ा रहा और ट्रंप के आगे झुक गया मुस्लिम वर्ल्ड, उठे सवाल

सऊदी अरब समेत आठ मुस्लिम देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने की घोषणा की है. मुस्लिम देशों के इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रियाएं आई हैं. कुछ लोग इसे फिलिस्तीन के हितों के खिलाफ मान रहे हैं.

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बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने वाले 8 मुस्लिम देशों के विदेश मंत्री (Photo: AFP)
बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने वाले 8 मुस्लिम देशों के विदेश मंत्री (Photo: AFP)

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, तुर्की, जॉर्डन, मिस्र, इंडोनेशिया, पाकिस्तान... ये सभी दुनिया के बड़े मुसलमान मुल्क हैं और इन सभी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस को जॉइन कर लिया है. बुधवार को इन अरब और इस्लामिक देशों ने घोषणा की कि वो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड में शामिल हो रहे हैं. यह बोर्ड इजरायल-हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी को स्थिर करने और उसके पुनर्निर्माण के मकसद से बनाया गया है.

एक संयुक्त बयान में सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, कतर और यूएई के विदेश मंत्रालयों ने कहा कि उन्होंने गाजा पीस बोर्ड में भागीदारी के लिए ट्रंप के निमंत्रण का स्वागत किया है.

इन आठ देशों ने बयान में कहा कि वो इस बोर्ड के मिशन का समर्थन करेंगे. एक तरफ जहां मुस्लिम दुनिया के सभी बड़े देश डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस का समर्थन कर रहे हैं और इसमें शामिल हो रहे हैं, अमेरिका के करीबी यूरोपीय सहयोगी इस बोर्ड में शामिल होने को इच्छुक नहीं दिखते. रिपोर्ट के मुताबिक, कई यूरोपीय देश इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वो ट्रंप के निमंत्रण को ठुकराएं या नहीं.

मुस्लिम देश उछल रहे, यूरोप बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से बच रहा

फ्रांस, ब्रिटेन समेत यूरोप से सभी बड़े अमेरिकी साझेदार इस बोर्ड में शामिल होने से बच रहे हैं. हाल ही में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के एक करीबी सूत्र ने बताया था कि वो ट्रंप के बोर्ड में शामिल होने को इच्छुक नहीं हैं.

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ग्रीनलैंड पर ट्रंप के आक्रामक रुख को लेकर यूरोपीय देश नाराज हैं और वो ट्रंप के दबाव में कोई ऐसा कदम नहीं उठा रहे हैं जो उनकी संप्रभुता से समझौता हो. ट्रंप डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को किसी भी तरह से अमेरिकी क्षेत्र बनाना चाहते हैं जिसे लेकर यूरोपीय देश अमेरिका से नाराज हैं. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने तो खुलकर ट्रंप के खिलाफ बोला भी है.

ट्रंप के आगे झुक गए मुस्लिम देश?

बोर्ड ऑफ पीस को लेकर यह आशंका भी जताई जा रही है कि इसमें इजरायल के हितों को ध्यान में रखते हुए काम होगा जो कि फिलिस्तीनियों के साथ अन्याय होगा. बोर्ड की कमान पूरी तरह से ट्रंप के हाथों में होगी और ट्रंप इजरायल के बड़े हितैषियों में से एक माने जाते हैं.

बावजूद इसके मुस्लिम देशों का इस बोर्ड में शामिल होना मुस्लिम दुनिया के लोगों को रास नहीं आ रहा. लोग कह रहे हैं कि फिलिस्तीनी राष्ट्र की वकालत करने वाले देश कैसे गाजा का शासन किसी बोर्ड के जिम्मे सौंप सकते हैं जिसका कंट्रोल अमेरिका के हाथों में है.

इधर, हमास-इजरायल के बीच सीजफायर के बावजूद, गाजा में लगातार हमलों की खबर आ रही है. इसे लेकर भी मुस्लिम देशों के लोग सवाल उठा रहे हैं कि उनके राष्ट्राध्यक्ष फिलिस्तीनियों की पीड़ा को भूलकर ट्रंप के साथ समझौता कर रहे हैं.

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ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का विरोध

पाकिस्तान के इको-सोशलिस्ट जुल्फिकार अली भुट्टो अपने एक्स अकाउंट पर लिखते हैं, 'पाकिस्तान ने गाजा के लिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने की सहमति देकर अपने गिरने की हद पार कर दी है. जब फिलिस्तीन के लोग हजारों की तादाद में शहीद हो रहे थे, तब हमें फिलिस्तीन के समर्थन और उसकी रक्षा में सबसे आगे खड़ा होना चाहिए था.'

अंतरराष्ट्रीय शांति वार्ताकार नोमी बार याकोव ने भी मुस्लिम देशों के ट्रंप के बोर्ड में शामिल होने पर नाराजगी जताई है. उन्होंने अल अरबिया से बातचीत में कहा कि तुर्की, कतर समेत कई मुस्लिम देशों के संबंध इजरायल से बेहद खराब हैं. ऐसे में गाजा को लेकर इन देशों के बीच कोई आम सहमति नहीं बन पाएगी. 

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