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'...तो नोबेल प्राइज का नाम बदलकर ट्रंप प्राइज कर दें', अमेरिकी सीनेटर ने क्यों कहा ऐसा?

लिंडसे ग्राहम ने कहा कि अमेरिका के अरब सहयोगियों को राष्ट्रपति ट्रंप की मदद करनी चाहिए. अगर आप उन्हें ‘ना’ कहते हैं, तो यह खतरनाक साबित हो सकता है.

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डोनाल्ड ट्रंप के साथ खुलकर आए लिंडसे ग्राहम (Photo- REUTERS)
डोनाल्ड ट्रंप के साथ खुलकर आए लिंडसे ग्राहम (Photo- REUTERS)

मिडिल ईस्ट महाजंग की आग और भड़कने लगी है. बंदर अब्बास पर अमेरिकी एयरस्ट्राइक के बाद ईरान ने भी बौखलाहट में कुवैत में अमेरिकी एयरबेस पर हमले किए हैं. इस तनातनी के बीच अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने खुलकर ट्रंप की तारीफ की है.

लिंडसे ग्राहम ने कहा कि अगर डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब को इजरायल को मान्यता देने के लिए तैयार करवा देते हैं, तो नोबेल प्राइज का नाम बदलकर ट्रंप प्राइज कर देना चाहिए. फॉक्स न्यूज से बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे अरब सहयोगियों को राष्ट्रपति ट्रंप की मदद करनी चाहिए. अगर आप उन्हें ‘ना’ कहते हैं, तो यह आपके लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान के साथ संभावित समझौते को अब्राहम अकॉर्ड से जोड़ दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देशों को इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने वाले अब्राहम समझौते से जुड़ना चाहिए.

ट्रंप ने इशारों में खाड़ी मुल्कों को चेताया
उन्होंने कहा कि सऊदी अरब, कतर और अन्य देशों को तुरंत इस समझौते में शामिल होना चाहिए. ये मुल्क हमारे प्रति यह जिम्मेदारी निभाने के कर्जदार हैं. अगर वे ऐसा करते हैं तो यह ऐतिहासिक होगा. उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं.

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ट्रंप ने संकेत दिया कि यदि खाड़ी देश समझौते में शामिल नहीं होते हैं तो अमेरिका मिडिल ईस्ट में शांति प्रयासों को सीमित कर सकता है. उन्होंने कहा कि अगर वे हस्ताक्षर नहीं करते हैं तो मुझे नहीं लगता कि हमें डील करनी चाहिए.

क्या है अब्राहम अकॉर्ड?
बता दें कि अब्राहम अकॉर्ड एक ऐसा समझौता है, जिसकी शुरुआत 2020 में डोनाल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी. इसका नाम इब्राहिम (अब्राहम) के नाम पर रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में माना जाता है. इस समझौते का मकसद इजरायल और अरब देशों के बीच राजनयिक और आर्थिक संबंध स्थापित करना था. 

सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए. बाद में मोरक्को और सूडान भी बाद में इस ढांचे से जुड़े. इसके बाद व्यापार, टेक्नोलॉजी, पर्यटन, कृषि और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में कई समझौते हुए. 

अमेरिका का दावा है कि इस समझौते ने क्षेत्र में नए व्यापारिक रास्ते और आर्थिक साझेदारी के द्वार खोले हैं. इसे 1979 में मिस्र और 1994 में जॉर्डन द्वारा इजरायल के साथ की गई शांति संधियों के बाद मिडिल ईस्ट के इतिहास में सबसे बड़ा राजनयिक बदलाव माना जाता है. ट्रंप का मानना है कि इस समझौते के व्यापक विस्तार से एक मजबूत और एकजुट मिडिल ईस्ट का निर्माण होगा.

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