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शाहेद ड्रोन की बौछार में फंसा अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम! ईरान की नई रणनीति से बढ़ी टेंशन

मिडिल ईस्ट की जंग में ईरान ने एक ऐसी खतरनाक चाल चली है, जिसने अमेरिका के सबसे आधुनिक रक्षा तंत्र को ही उलझा कर रख दिया है. एक तरफ दुनिया का सबसे ताकतवर देश है और दूसरी तरफ ईरान के वो सस्ते हथियार, जिन्होंने अरबों के सुरक्षा चक्र में सेंध लगा दी है.

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एक ईरानी धर्मगुरु तेहरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) एयरोस्पेस फोर्स म्यूजियम का दौरा करते हुए (File photo: Reuters)
एक ईरानी धर्मगुरु तेहरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) एयरोस्पेस फोर्स म्यूजियम का दौरा करते हुए (File photo: Reuters)

मिडिल ईस्ट के समुद्र में भारी नुकसान झेलने के बाद भी ईरान के तेवर कम नहीं हुए हैं. जारी संघर्ष के बीच ईरान ने हमले की एक ऐसी रणनीति अपनाई है, जिसने अमेरिका की परेशानी बढ़ा दी है. ईरान अब भारी संख्या में आत्मघाती Shahed-136 ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है. ये ड्रोन तेहरान की हमलावर रणनीति का सबसे अहम हिस्सा बन चुके हैं, जो बार-बार अमेरिका और उसके साथी देशों के एयर डिफेंस नेटवर्क की कड़ी परीक्षा ले रहे हैं.

सैटेलाइट तस्वीरों में हुआ बड़ा खुलासा

पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के इन हमलों का असर क्षेत्र के कम से कम सात देशों पर पड़ा है, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं. इन हमलों ने वहां के संचार (कम्युनिकेशन) और रडार सिस्टम को नुकसान पहुंचाया है.

इन दावों की पड़ताल इंडिया टुडे की ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) टीम ने सैटेलाइट तस्वीरों और जियोलोकेशन डेटा के आधार पर की है. इस जांच में खाड़ी देशों के कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर रडार डोम और सैटेलाइट कम्युनिकेशन टर्मिनल्स को नुकसान पहुंचने के साफ संकेत मिले हैं.

यह भी पढ़ें: Israel vs Iran War: कितने ताकतवर हैं ईरान के शाहेद और लूकस ड्रोन?

तबाही से ज्यादा सिस्टम पर दबाव

इस पूरी पड़ताल से एक बात साफ हो गई है कि ईरान का मकसद सिर्फ इमारतों को ढहाना नहीं है. दरअसल, ईरान की रणनीति उस संचार नेटवर्क (कम्युनिकेशन सिस्टम) को कमजोर करने की है, जिसके जरिए एयर डिफेंस सिस्टम आपस में तालमेल बिठाकर काम करते हैं. सस्ते Shahed-136 ड्रोन का बार-बार इस्तेमाल यह दिखाता है कि कैसे मामूली कीमत वाले ये हथियार, दुनिया के सबसे महंगे डिफेंस नेटवर्क की नाक में दम कर रहे हैं.

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क्या खाली हो रहा है अमेरिका का खजाना और हथियार?

भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे हैं कि अमेरिका का हथियार भंडार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है, लेकिन रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों का आकलन कुछ और ही इशारा कर रहा है.

असलियत यह है कि अमेरिका के THAAD (थाड), Patriot (पैट्रियट) और Aegis (एजिस) जैसे महंगे डिफेंस सिस्टम पर इन ड्रोन हमलों की वजह से भारी दबाव है. विशेषज्ञों को डर है कि अगर इसी रफ्तार से हमले जारी रहे, तो कहीं ऐसा न हो कि तेहरान के ड्रोन खत्म होने से पहले ही अमेरिका की कीमती मिसाइलें खत्म हो जाएं.

लाखों का ड्रोन बनाम करोड़ों की मिसाइल

ईरान की यह रणनीति अमेरिका को आर्थिक रूप से गहरी चोट पहुंचा रही है. आंकड़ों पर नजर डालें तो एक Shahed-136 ड्रोन की कीमत करीब 18 से 46 लाख रुपये बताई जाती है. कम कीमत होने की वजह से ईरान इन्हें सैकड़ों की संख्या में दाग सकता है. लेकिन इन्हें हवा में मार गिराने का खर्च बेहद ज्यादा है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जहां ईरान का एक ड्रोन लाखों में आता है, वहीं उसे गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक पैट्रियट (Patriot) मिसाइल का खर्च करीब 34 से 37 करोड़ रुपये बैठता है. इतना ही नहीं, थाड (THAAD) सिस्टम की एक मिसाइल करीब 110 से 137 करोड़ रुपये की पड़ती है.

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वहीं समुद्र से हमला रोकने वाले एजिस (Aegis) डिफेंस सिस्टम में इस्तेमाल होने वाली SM-6 मिसाइल करीब 82 से 92 करोड़ रुपये की होती है, जबकि SM-3 इंटरसेप्टर की कीमत 247 से 256 करोड़ रुपये तक बताई जाती है.

इसका सीधा सा मतलब है कि अमेरिका का एक इंटरसेप्टर दागने का खर्च कई बार ईरान के दर्जनों ड्रोन की कुल कीमत के बराबर हो सकता है. मौजूदा संघर्ष में ईरान इसी आर्थिक अंतर का फायदा उठाता दिख रहा है.

यह भी पढ़ें: खामेनेई का बेटा नहीं तो कौन होगा ईरान का अगला 'सुप्रीम लीडर'? भारत में ईरानी दूत ने बताया

कहां-कहां हुआ नुकसान?

सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से पता चला है कि ईरान ने इन ठिकानों को निशाना बनाया है.

  • कुवैत और बहरीन: यहां सैटेलाइट कम्युनिकेशन और रडार डोम को नुकसान पहुंचा है.
  • सऊदी अरब और कतर: प्रिंस सुल्तान एयर बेस और अल उदेद एयर बेस में संचार इमारतों और सैटेलाइट डिश पर असर पड़ा है.
  • UAE: अल धफरा एयर बेस में रडार सपोर्ट सिस्टम पर हमलों के संकेत मिले हैं.
  • ये सभी ठिकाने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सैन्य ऑपरेशंस के लिए सबसे महत्वपूर्ण केंद्र हैं, जो अब ईरान की 'ड्रोन रणनीति' के चलते सीधे खतरे में हैं.
     
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