दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग, होर्मुज स्ट्रेट में इस वक्त सन्नाटा नहीं, बल्कि एक गहरी छटपटाहट है. उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच स्थित इस संकरे जलमार्ग के पास लगभग 2,000 जहाज हफ्तों से फंसे हुए हैं.
इन जहाजों के यहां फंसने की वजह है ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) द्वारा लगाया गया एक अघोषित 'टोल टैक्स' और एक जटिल 'क्लियरेंस कोड' सिस्टम, जिसने वैश्विक सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है. जिसके तहत जहाजों को पहले क्लियरेंस लेना होता है, तभी उन्हें स्ट्रेट पार करने की अनुमति मिलती है.
यह पूरा सिस्टम ईरान की IRGC के नियंत्रण में बताया जा रहा है. इसी वजह से अब जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने के लिए सामान्य समुद्री नियमों के अलावा IRGC की प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ रहा है. हालांकि भारत सरकार का कहना है कि भारतीय जहाजों के होर्मुज से सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करने के लिए नई दिल्ली द्वारा ईरान को कोई भुगतान नहीं किया गया है.
होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का 20% कच्चा तेल और LNG गुजरता है. ईरान द्वारा इस मार्ग की 'डी-फैक्टो' नाकेबंदी ने कच्चे तेल की कीमतों को 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है. अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के अनुसार, फंसे हुए जहाजों में से कई ऐसे हैं जो लंबी दूरी का रास्ता (अफ्रीका के चक्कर काटकर) तय करने के बजाय यहीं रुककर ईरान से 'अनुमति' मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.
यह भी पढ़ें: होर्मुज के दरवाजे पर अटके 5 भारतीय जहाज, ईरान जंग के साए में टिकी है नजर
IRGC का 'टोल बूथ' और क्लियरेंस कोड: कैसे होती है वसूली?
भले ही अंतरराष्ट्रीय कानून 'ट्रांजिट पैसेज' की वकालत करते हों, लेकिन जमीन पर IRGC ने अपना समानांतर शासन स्थापित कर दिया है. 'लॉयड्स लिस्ट' और अन्य खुफिया समुद्री सूत्रों के अनुसार, इस वसूली की प्रक्रिया बेहद सुनियोजित है.
अल जजीरा की रिपोर्ट्स के अनुसार, स्ट्रेट पार करने से पहले जहाज संचालकों को IRGC से जुड़े बिचौलियों से संपर्क करना होता है. इसके बाद जहाज की पूरी जानकारी जमा करनी होती है. इसमें जहाज का नाम, इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (IMO) नंबर, जहाज पर लदा सामान, क्रू मेंबर की जानकारी और जहाज कहां जा रहा है- ये सभी विवरण देने होते हैं.
इसके बाद IRGC इस जानकारी की जांच करता है. अगर जहाज को अनुमति मिल जाती है, तो उसे एक “वेसल क्लियरेंस कोड” जारी किया जाता है. यही कोड स्ट्रेट पार करने का परमिट माना जाता है.
जब जहाज स्ट्रेट में प्रवेश करता है, तो ईरानी नौसेना के अधिकारी रेडियो पर जहाज से संपर्क करते हैं और क्लियरेंस कोड मांगते हैं. अगर जहाज सही कोड बताता है, तो ईरानी गश्ती बोट उस जहाज को अपने समुद्री क्षेत्र से एस्कॉर्ट करके सुरक्षित बाहर निकालती है. अगर जहाज के पास कोड नहीं होता या अनुमति नहीं होती, तो उसे वापस भेज दिया जाता है.
एस्कॉर्ट और 'टोल' भुगतान
कोड सही पाए जाने पर ईरान की तेज रफ्तार बंदूकधारी नावें उस जहाज को एस्कॉर्ट करती हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, इस 'सुरक्षित मार्ग' के लिए ईरान 20 लाख डॉलर (करीब 16.5 करोड़ रुपये) तक का शुल्क वसूल रहा है. कुछ मामलों में यह भुगतान चीनी युआन (Yuan) में लिया जा रहा है. यह भुगतान सीधे नहीं बल्कि बिचौलियों के जरिए कराया जाता है. कुछ मामलों में भुगतान विदेशी मुद्रा, खासकर युआन में किए जाने की भी खबरें हैं.
हालांकि, यह फीस कितनी है, यह आधिकारिक तौर पर तय नहीं ह, ईरान का तर्क है कि वह जहाजों को सुरक्षा दे रहा है, इसलिए ट्रांजिट फीस लेना गलत नहीं है.
यह भी पढ़ें: होर्मुज के लिए फ्रांस का प्लान-35 क्या है? इजरायल-अमेरिका के हमलों से अलग ये क्या चल रही कवायद
'डार्क शिप्स' और चोरी-छिपे पारगमन
इस संकट के बीच 'डार्क शिप्स' (Dark Ships) की संख्या बढ़ गई है. ये वे जहाज हैं जो पकड़े जाने के डर से अपना AIS (Automatic Identification System) बंद कर देते हैं. सैटेलाइट इमेज में देखा गया है कि कई विशाल टैंकर रात के अंधेरे में अपना ट्रैकर बंद कर होर्मुज पार करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन IRGC के आधुनिक रडार सिस्टम से बचना नामुमकिन साबित हो रहा है.
ईरान का तर्क है कि वह इस क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और 'युद्ध के समय' में सुरक्षा शुल्क लेना उसका संप्रभु अधिकार है. वहीं, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और पश्चिमी देशों ने इसे 'आर्थिक आतंकवाद' करार दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान होर्मुज को एक 'भू-राजनीतिक सौदेबाजी' (के रूप में इस्तेमाल कर रहा है ताकि वह अमेरिका और इजरायल पर युद्धविराम के लिए दबाव बना सके.
फिलहाल, 2000 जहाजों का यह जमावड़ा केवल एक लॉजिस्टिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक आर्थिक बम है. यदि 6 अप्रैल तक कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता तो तेल की कीमतें $120 तक जा सकती हैं.