
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को उन सभी देशों को प्रतिबंधों की धमकी दी है जो ईरान से तेल खरीदते हैं. ट्रंप की यह धमकी ऐसे वक्त में आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच इस शनिवार को होने वाली परमाणु वार्ता स्थगित कर दी गई है. ट्रंप ने उन देशों को भी धमकी दी है जो ईरान पर लगे प्रतिबंधों की वजह से अप्रत्यक्ष रूप से ईरानी तेल खरीद रहे हैं.
ईरान का तेल खरीदने वाले देशों को धमकी देते हुए ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'ईरान से सभी तरह की तेल खरीद और पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स पर अभी रोक लगनी चाहिए. जो भी देश या इंसान ईरान से ये उत्पाद खरीद रहा है वो अमेरिका से किसी भी तरह से व्यापार नहीं कर पाएगा.'
ट्रंप की इस धमकी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला देश चीन है क्योंकि चीन ही अप्रत्यक्ष तरीके से ईरान का लगभग सारा तेल खरीद रहा है. तेल टैंकर को ट्रैक करने वाले डेटा के आधार पर यूएस एनर्जी इंफोर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन ने पिछले साल अक्टूबर में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. रिपोर्ट से पता चला था कि चीन ने 2023 में ईरान के कच्चे तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खरीदा.
ट्रंप ने चार भारतीय कंपनियों पर भी लगाया था प्रतिबंध
इससे पहले फरवरी में ट्रंप ने ईरानी तेल की खरीद-बिक्री से जुड़ी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया था. प्रतिबंध की जद में भारत की चार कंपनियां भी आई थीं जिसमें ऑस्टेनशिप मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड (नोएडा), बीएसएम मरीन लिमिटेड (गुड़गांव), कॉसमॉस लाइन्स (तंजावुर) और फ्लक्स मैरीटाइम (नवी मुंबई) शामिल थीं. इन कंपनियों पर आरोप था कि इन्होंने ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद तेल बेचने में उसकी मदद की जो कि अमेरिकी प्रतिबंधों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र के ईरान पर लगे प्रतिबंधों का भी उल्लंघन है.
अमेरिका का कहना था कि इन चारों भारतीय कंपनियों ने प्रतिबंध के बावजूद ईरानी तेल के परिवहन, बिक्री और मार्केटिंग में योगदान दिया. भारतीय फर्मों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ अमेरिका ने इनसे जुड़े कार्गो शिप को भी निशाना बनाया था.
Gabon फ्लैग्ड टैंकर Yateeka बीएसएम मरीन लिमिटेड से जुड़ा है, जबकि Eswatini फ्लैग्ड AMAK ऑस्टेनशिप मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है. इन दोनों पर भी प्रतिबंध लगा दिए गए थे. इसके अलावा, फ्लक्स मैरीटाइम एलएलपी को ईरानी तेल शिपमेंट को सुविधाजनक बनाने में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया गया था.
प्रतिबंध के बावजूद क्या ईरान से तेल खरीदता है भारत?
एक वक्त ईरान भारत का शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ता हुआ करता था. 2019 के दौरान ईरान सऊदी अरब और ईराक के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था. लेकिन ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से धीरे-धीरे ईरान से तेल खरीद में कमी आने लगी और 2023 के खत्म होते-होते भारत ने ईरानी तेल खरीदना आधिकारिक तौर पर बिल्कुल बंद कर दिया था.
संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर COMTRADE डेटाबेस के मुताबिक, 2023 में भारत ने ईरान से 1.02 अरब डॉलर का तेल खरीदा था. वर्तमान में भारत ईरान से न के बराबर तेल खरीदता है.

ईरान से तेल खरीदना भारत के लिए फायदेमंद सौदा था. भारत ईरान से तेल खरीद का भुगतान अपनी करेंसी, रुपया में करता था. बदले में ईरान उन पैसों से भारत से सामान खरीदता था. ईरान के साथ रुपये में व्यापार फायदेमंद था क्योंकि भारत अपनी मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण के प्रयासों में लगा हुआ है.
ईरानी तेल की क्वालिटी भी काफी अच्छी होती है और भारत को अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर ईरानी तेल मिल रहा था. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान से तेल व्यापार पर पूर्णतः रोक लग गई है.
वैश्विक तेल बाजार के लिए कितना अहम है ईरानी तेल?
ईरान दुनियाभर में कच्चे तेल का सातवां सबसे बड़ा उत्पादक देश है. ईरान के पास दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार है. पेट्रोलियम उत्पादक देशों के संगठन (OPEC) में ईरान तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है जो रोजाना लगभग 30 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है.
ईरान अपने तेल का करीब 50 फीसद निर्यात कर देता है जिसका सबसे ज्यादा हिस्सा चीन को जाता है.
अगर अमेरिकी धमकी की वजह से चीन ईरानी तेल खरीदना बंद कर देता है तो उसे अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अन्य देशों का रुख करना पड़ेगा. इससे तेल आपूर्ति में कमी हो सकती है और तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. तेल की कीमतें अगर बढ़ती हैं तो दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत भी प्रभावित होगा और महंगाई बढ़ सकती है.
प्रतिबंधों के बावजूद कैसे ईरानी तेल खरीद लेता है चीन
ईरानी तेल पर प्रतिबंध लगे हैं, बावजूद इसके चीन कैसे उसका अधिकांश तेल खरीद रहा है? इसका जवाब है- ईरान मलेशिया जैसे देशों के जरिए ईरानी तेल खरीद रहा है.
चीन ने ईरान से तेल खरीद के लिए एक खास तरह का व्यापार सिस्टम विकसित किया है जो दुनिया से छिपकर काम करता है. इसके लिए चीन छोटी रिफाइनरियां, डार्क फ्लीट टैंकर और क्षेत्रीय बैंकों का इस्तेमाल करता है.

चीन ने ईरानी तेल को रिफाइन करने के लिए छोटी अर्ध सरकारी रिफाइनरियां बना रखी हैं और ये छोटी रिफाइनरियां प्रतिबंधों से बची रहती हैं.
इसके अलावा चीन ने तेल पहुंचाने वाले टैंकरों का अपना अलग ही नेटवर्क बना लिया है जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से मुक्त छिपकर काम करने के लिए जाना जाता है. ईरान से चला तेल टैंकर सीधे चीन नहीं आता बल्कि वो एक जहाज से दूसरे जहाज पर ट्रांसफर होते हुए ही आता है और मलेशिया के जलक्षेत्र से होते हुए चीन जाता है. यहां तेल टैंकर दूसरे शिप से जुड़ता है जिससे यह भ्रम पैदा किया जा सके कि तेल ईरान का नहीं बल्कि मलेशिया का है.
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मलेशिया जितना तेल उत्पादन करता है, उससे कहीं अधिक चीन को बेच रहा है जिससे पता चलता है कि ईरानी तेल मलेशिया के जरिए चीन पहुंच रहा है.
चीन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने के लिए ईरानी तेल का भुगतान अपने बड़े बैंकों के जरिए नहीं करता बल्कि इस काम में उसके छोटे क्षेत्रीय बैंक लगे हुए हैं. चीन तेल का भुगतान डॉलर के बजाए अपनी मुद्रा युआन में ही करता है.
अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भी चीन ईरानी तेल खरीदता है क्योंकि ईरानी तेल सस्ता है और इसकी क्वालिटी भी काफी अच्छी है. ईरान चीन को कम से कम 5 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर तेल बेच रहा है.
चीन के अलावा और कौन से देश खरीद रहे ईरानी तेल
ईरान ने प्रतिबंधों के बावजूद अपने तेल को बेचने के लिए कई तरीके निकाल लिए हैं. वो चीन के अलावा कई देशों को तेल बेचता है जिसमें ईराक, संयुक्त अरब अमीरात(UAE) और तुर्की जैसे देश शामिल हैं.
पिछले साल जुलाई में ईरान के तेल मंत्री जवाद ओवजी ने कहा था कि ईरान 17 देशों को कच्चा तेल निर्यात करता है जिसमें कुछ यूरोपीय देश भी शामिल हैं.
हालांकि, उन्होंने ये नहीं बताया कि ईरान किन 17 देशों को तेल बेच रहा है. अगस्त 2024 में आई रॉयटर्स की रिपोर्ट में शिपिंग सूत्रों और आंकड़ों के हवाले से कहा गया कि ईरान बांग्लादेश और ओमान जैसे देशों को भी तेल निर्यात कर रहा है.
ईरान पर अमेरिका ने क्यों लगाया है प्रतिबंध
अमेरिका ने ईरान पर उसके परमाणु प्रोग्राम को लेकर प्रतिबंध लगा रखा है. अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है जबकि ईरान इन दावों को खारिज करता है. ईरान का कहना है कि उसका परमाणु प्रोग्राम केवल नागरिक उद्देश्यों के लिए है.
साल 2002 में ईरान के छिपे हुए परमाणु ठिकानों की जानकारी सामने आई थी जिसके बाद से ही उस पर अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का शक गहरा गया. परमाणु प्रोग्राम को लेकर अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने 2010 में ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए.

कई सालों की वार्ता के बाद 2015 में अमेरिका और ईरान के बीच एक परमाणु समझौता हुआ लेकिन 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समझौते से अलग हट गए और उन्होंने ईरान पर फिर से प्रतिबंध कड़े कर दिए.
जो बाइडेन के आने के बाद भी अमेरिका ईरान के साथ दोबारा परमाणु समझौता नहीं कर पाया और अब ट्रंप ने दोबारा सत्ता में आने के बाद ईरान से साथ इस समझौते को लेकर कोशिशें तेज कर दी हैं. इस शनिवार को अमेरिका और ईरान के बीच इटली की राजधानी रोम में वार्ता होने वाली थी लेकिन ऐन वक्त पर इसे स्थगित कर दिया गया है और ईरानी तेल पर शिकंजा और अधिक कस गया है.