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मिडिल ईस्ट की जंग से बढ़ी भारतीयों की मुसीबत, कच्चे तेल के दाम बेकाबू! अब क्या करेगी सरकार?

रिजर्व बैंक ने पिछले साल अनुमान लगाया था कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी का पूरा बोझ आम लोगों पर डाला जाता है तो इससे महंगाई में 30 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी होगी और ग्रोथ में 15 बेसिस पॉइंट्स की कमी आएगी.

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क्रूड ऑयल की कीमत में उछाल से दुनिया में टेंशन. (Photo: Reuters)
क्रूड ऑयल की कीमत में उछाल से दुनिया में टेंशन. (Photo: Reuters)

अमेरिका और इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर जो जंग शुरू की थी, वह अब खतरनाक होती जा रही है. जंग का बदला लेने के लिए ईरान ने मिडिल ईस्ट के कई देशों पर हमला कर दिया. इस कारण कई देशों को हमले के डर से तेल का उत्पादन रोकना पड़ा. नतीजा ये हुआ कि कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ रही है. 

सोमवार को ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया. ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की जंग शुरू होने के बाद से ये 42% ज्यादा है. भारत का कहना है कि उसके पास काफी रिजर्व है लेकिन लंबे समय तक कीमतों में उतार-चढ़ाव से आम घरों से लेकर पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है.

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ये क्यों मायने रखता है?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसदी कच्चा तेल बाहर से खरीदता है, जिससे कीमतें बढ़ने पर उसे सीधा नुकसान हो सकता है. कच्चे तेल की ज्यादा कीमतें महंगाई बढ़ा सकती हैं, व्यापार घाटा बढ़ा सकती हैं और घरों का बजट बिगाड़ सकती हैं, खासकर कुकिंग गैस के मामले ममें. सरकार ने पहले भी ऐसे झटकों को कम करने के लिए कदम उठाए हैं और अब फिर ऐसा ही कुछ करने की जरूरत आ गई है. ये इसलिए मायने रखता है क्योंकि...
ब्रेंट क्रूड सोमवार को 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया.
युद्ध शुरू होने के बाद से तेल की कीमतें 42% बढ़ गईं हैं.
भारत अपनी जरूरत का 90% तेल आयात करता है.
कच्चे तेल की कीमत 10% बढ़ने से महंगाई में 30 बेसिस प्वॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है.
2025 में होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाला 87% क्रूड और 86% LNG एशिया आया था.
भारत का 90% से ज्यादा LPG आयात मिडिल ईस्ट से होता है.

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ऐसे हालातों से कैसे निपटता है भारत?

रिजर्व बैंक ने पिछले साल अनुमान लगाया था कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी का पूरा बोझ आम लोगों पर डाला जाता है तो इससे महंगाई में 30 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी होगी और ग्रोथ में 15 बेसिस पॉइंट्स की कमी आएगी.

यह इसलिए गंभीर है, क्योंकि खाड़ी देश एशिया की ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी है. 2025 में होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाला 87% कच्चा तेल और 86 फीसदी LNG एशियाई देशों में ही आया. यह रास्ता अब बंद हो गया है.

मिडिल ईस्ट में संकट का असर अब दिखने भी लगा है. कुछ दिन पहले ही LPG की कीमत भी बढ़ा दी गई है, जो लगभग एक साल बाद पहली बढ़ोतरी है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा LPG कंज्यूमर है और 90% से ज्यादा LPG मिडिल ईस्ट से आता है.

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केंद्र सरकार ने तेल के झटकों से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए पहले भी टैक्स में कटौती की है. 2022 में जब रूस-यूक्रेन जंग के बाद कच्चा तेल 116 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया था तो सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कम कर दी थी, ताकि कीमतें स्थिर रहें. इससे पहले 2008 में जब क्रूड 147 डॉलर पर आ गया था तो महंगाई को काबू में करने के लिए इंपोर्ट और एक्साइज ड्यूटी को कम कर दिया गया था. अधिकारियों का कहना है कि अभी भी ऐसे ही कदम उठाए जा रहे हैं.

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अब क्या है भारत के पास रास्ता?

रूसी तेल से भी समस्या हल नहीं हुई. अब सिर्फ विदेश नीति का संकट नहीं है. यह भारत के लिए एक इकोनॉमिक टेस्ट बनता जा रहा है. खाड़ी देशों से सप्लाई जितनी ज्यादा समय देर तक रुकी रहेगी, भारत के लिए ईधन की बढ़ती कीमतों से ग्राहकों को बचाना उतना ही मुश्किल होगा. ऐसी स्थिति में सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि उसका भी नुकसान न हो. विदेश मंत्री जयशंकर ने हाल ही में कहा था कि हमारे लिए भारतीय कंज्यूमर का हित हमेशा सबसे ऊपर रहा है और रहेगा.

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