बांग्लादेश की सियासी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के मुखिया डॉ. शफीकुर्रहमान ने शनिवार शाम सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी की है. उन्होंने अपने पोस्ट में पब्लिक लाइफ में महिलाओं की भागीदारी की आलोचना करते हुए कामकाजी महिलाओं की तुलना वेश्यावृत्ति से कर दी और इसे नैतिक पतन का कारण बताया. इसके विरोध में ढाका और जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर उतर आए हैं और उनके खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं.
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और तमाम छात्र संगठनों ने इस बयान को पिछड़ी और घटिया विचारधारा करार दिया है. भारी दबाव के बाद जमात-ए-इस्लामी ने पोस्ट डिलीट करते हुए दावा किया कि शफीकुर्रहमान का अकाउंट हैक हो गया था और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.
हालांकि, प्रदर्शनकारी महिलाएं और छात्र इस दलील को खारिज करते हुए माफी की मांग कर रहे हैं. यह विवाद 12 फरवरी को होने वाले मतदान से ठीक पहले खड़ा हुआ है.
'कामकाजी महिलाएं वेश्या नहीं हैं...'
ढाका यूनिवर्सिटी के ऐतिहासिक 'टीचर स्टूडेंट स्क्वायर' पर रविवार को बड़ी तादाद में महिलाओं और छात्रों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि शफीकुर्रहमान की सोच महिलाओं को पिंजरे में कैद करने वाली है. जातीय छात्र दल ने बयान जारी कर कहा कि कामकाजी महिलाओं की तुलना वेश्यावृत्ति से करना उनकी बराबरी के अधिकार को नकारना है. छात्रों ने चेतावनी दी है कि वे ऐसी कट्टरपंथी विचारधारा को सफल नहीं होने देंगे.
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हैकिंग का बहाना और राजनीतिक दलों की निंदा
विवाद बढ़ता देख जमात-ए-इस्लामी ने हाथी झील पुलिस स्टेशन में अकाउंट हैकिंग की शिकायत दर्ज कराई है. लेकिन मुख्य विपक्षी दल BNP ने इसे सिर्फ एक बहाना बताया है. BNP का कहना है कि यह जमात की असली सोच है, जो महिलाओं के योगदान को अपमानित करती है. शफीकुर्रहमान ने अपने पोस्ट में यह भी कहा था कि महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका नहीं दी जा सकती, जिसे समाज का हर वर्ग अब सिरे से खारिज कर रहा है.
चुनावों में महिलाओं की भागीदारी और लैंगिक असमानता
बांग्लादेश के 13वें आम चुनाव में 51 पार्टियां मैदान में हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात है कि 35 सियासी दलों ने एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा है. इनमें जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगी कट्टरपंथी संगठन शामिल हैं. कुल 1981 उम्मीदवारों में से सिर्फ 78 महिलाएं हैं, जिनमें 65% कामकाजी और शिक्षित महिलाएं हैं. 30 महिला उम्मीदवार 25-39 वर्ष की उम्र वर्ग की हैं, जो वैचारिक रूप से स्वतंत्र मानी जाती हैं.
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तालिबानी विचारधारा बनाम बांग्लादेशी युवा
अफगानिस्तान और पाकिस्तान की तुलना में बांग्लादेश में कामकाजी महिलाओं की तादाद ज्यादा है. ऐसे में जमात प्रमुख का यह 'तालिबानी' बयान युवाओं और महिलाओं को रास नहीं आ रहा है. जानकारों का मानना है कि इस विवाद का सीधा असर चुनाव नतीजों पर पड़ सकता है. चुनाव में महिलाओं की अहम भूमिका को देखते हुए जमात-ए-इस्लामी को अपनी इस पिछड़ी सोच का भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.