क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इसी धरती पर एक ऐसी जगह है जहां दूसरे ग्रहों जैसा नजारा है. जहां पानी में एसिड है, हवा में जहर है. जहां बारिश होते ही तेजाब वाला पानी फैलने लगता है. जहां जमीन चीरकर केमिकल कभी भी चारों ओर पसर सकता है. लेकिन देखने में जहां का नजारा किसी परिलोक जैसा खूबसूरत भी हो. यानी जिंदगी की उम्मीदों के बीच खूबसूरत मौत का जुगाड़...
कल्पना कीजिए आप किसी ऐसे मैदान में खड़े हैं जहां की जमीन चमकीले पीले रंग की है, पैर के नीचे नमक के क्रिस्टल चटक रहे हैं और चारों तरफ से ऐसी गंध आ रही है जैसे हजारों सड़े हुए अंडे एक साथ फोड़ दिए गए हों. आप प्रोटेक्शन ग्लास हटाकर देखना चाहते हैं, लेकिन आपकी आंखों में जलन होने लगती है क्योंकि हवा में ऑक्सीजन के साथ-साथ तेजाब का धुआं भी मिक्स है. यह किसी और ग्रह का नजारा नहीं है, बल्कि इसी धरती की एक जगह है जिसे वैज्ञानिक धरती पर 'नर्क का द्वार' कहते हैं.
तस्वीरों में आप इस जगह को देखेंगे तो हॉलीवुड की किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का नजारा दिखेगा. लेकिन जब जमीन पर पहुंचेंगे तो यहां आपको जिंदगी का नामोनिशान तक नहीं मिलेगा. यह जगह है अफ्रीका के इथियोपिया में बसा डैलोल.
पुरानी सभ्याताओं का इतिहास हमें सिखाता है कि जहां पानी है, वहां जीवन है... लेकिन ये बात यहां एकदम सच साबित नहीं होती. नेचर कम्युनिकेशन की एक रिचर्स में पाया गया कि डैलोल के एसिड वाले पानी से भरे तालाबों में एक कोशिका वाला बैक्टीरिया भी जिंदा नहीं रह सकता. यानी, धरती की उन बेहद दुर्लभ जगहों में से एक, जहां जीवन के संकेत लगभग नहीं के बराबर हैं.
यहां की प्राकृतिक खूबसूरती दरअसल मौत का एक जाल है. लोगों के लिए रहस्य है कि यहां का पानी इतना रंगीन क्यों है? डैलोल समुद्र तल से 130 मीटर नीचे बसा है. यहां जमीन के नीचे दबे लावा की गर्मी जब ऊपर मौजूद नमक और पोटैशियम के भंडारों से टकराती है, तो एक रासायनिक विस्फोट होता है. यहां के पानी में पीला रंग सल्फर की वजह से, लोहे की जंग की वजह से लाल/नारंगी रंग तो हरा रंग तांबे के लवणों की वजह से मिक्स हो जाता है. इससे pH लेवल शून्य से भी नीचे गिर जाता है. साधारण शब्दों में कहें तो, यह पानी बैटरी के तेजाब से भी ज्यादा खतरनाक है.
दूसरे ग्रह जैसे बन चुके इस जगह पर अब सिर्फ वैज्ञानिकों का डेरा है. उनका मानना है कि डैलोल की परिस्थितियां बिल्कुल वैसी ही हैं जैसी मंगल ग्रह पर. यह जगह इतना गर्म है कि यहां का तापमान औसतन 48°C के पार ही रहने लगा है. वैज्ञानिकों ने यहां एक नई 'साल्ट चिमनी' का निर्माण होते देखा है, जो पिछले 10 सालों में सबसे बड़ी है. यह संकेत है कि जमीन के नीचे मैग्मा की हलचल बढ़ रही है.
यहां वैज्ञानिक रिसर्च के लिए पहुंचना कम खतरनाक नहीं है. यहां काम करने वाले रिसर्चर्स बताते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती गर्मी नहीं, बल्कि हवा है. यहां क्लोरीन और सल्फर डाइऑक्साइड गैसों के अदृश्य बादल तैरते रहते हैं. अगर अचानक हवा का रुख बदल जाए, तो बिना गैस-मास्क के इंसान के फेफड़े कुछ ही मिनटों में काम करना बंद कर सकते हैं. यहां तक कि पास के 'अफार' जनजातीय लोग भी इसे 'भूतों का शहर' कहते हैं और यहां रुकने की हिम्मत नहीं करते.
पर्यटकों के लिए यहां नजारा कम है, खतरे ज्यादा. अगर आप एडवेंचर के शौकीन हैं, तो यहां पहुंचना 'मौत को छूकर आने' जैसा है. कोई पक्की सड़क नहीं है, केवल ऊंटों का रास्ता या उबड़ खाबड़ रास्ते पर चलने वाली फोर-व्हीलर गाड़ियां. यहां रहने के लिए कोई होटल नहीं है. पर्यटकों को प्लास्टिक के टेंट में रहना पड़ता है और हर वक्त मिलिट्री सुरक्षा साथ रहती है. लेकिन असल खतरा है कि यहां बारिश का पानी गिरते ही तेजाब में बदल जाता है. हालांकि, ताजा शोध में यहां ऐसे 'नैनो-क्रिस्टल' मिले हैं जो दवाइयों की डिलीवरी के लिए भविष्य में क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं. यहां की जमीन कांच की तरह पतली है, एक गलत कदम और आप नीचे उबलते हुए एसिड के तालाब में हो सकते हैं.
डैलोल के कुछ सच ऐसे हैं जो वहां जाने के पहले सोचकर डरा देंगे-
-डैलोल के ऊपर से गुजरते समय प्रवासी पक्षी अक्सर जहरीली गैसों के गुबार की चपेट में आ जाते हैं. ये पक्षी सीधे एसिड के तालाबों में गिरते हैं.
-यहां जमीन के नीचे दबाव इतना अधिक है कि गर्म पानी और गैसें नमक की परतों को फाड़कर बाहर निकलती हैं. यह नजारा ऐसा लगता है जैसे जमीन से नमक के गोले दागे जा रहे हों.
-वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर हमें मंगल ग्रह पर कभी जीवन मिला, तो वह डैलोल जैसा ही दिखेगा- कठोर, बदबूदार और रसायनों से भरा.
दरअसल, डैलोल की जमीन पर कदम रखना प्रकृति की उस सीमा को छूना है जहां जीवन हार मान लेता है. यह जगह हमें याद दिलाती है कि हम इंसान जिस धरती को अपनी जागीर समझते हैं, उसके कुछ कोने आज भी हमारे लिए 'अजूबे' हैं. यहां के चमकीले पीले और हरे रंग किसी सुंदर भविष्य का वादा नहीं, बल्कि एक प्राचीन और उग्र रासायनिक युद्ध की चेतावनी हैं. डैलोल हमें एक बड़ी सच्चाई सिखाता है कि इंसान चाहे जितनी तरक्की कर ले, कुदरत के पास आज भी ऐसे रहस्य हैं जिन्हें सुलझाना तो दूर, उनके करीब जाना भी जान जोखिम में डालने जैसा है.