पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और सत्ता परिवर्तन के बाद से टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी की टेंशन खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. टीएमसी के सांसद अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हुए हमले के खिलाफ ममता बनर्जी कोलकाता के रानी रासमणि एवेन्यू में सड़कों पर उतरीं, लेकिन वो खुद को पार्टी के भीतर अकेला खड़ी पा रही हैं.
ममता बनर्जी ने मंगलवार को धरना दिया, जिसमें टीएमसी टीएमसी के ज्यादातर विधायकों और सांसदों ने दूरी बना रखी थी. टीएमसी के 8 विधायक और 6 सांसद ही प्रोटेस्ट शामिल हुए. ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी विधायक और सांसद क्यों प्रोटेस्ट में ममता बनर्जी के साथ क्यों नहीं पहुंचे?
बंगाल चुनाव के बाद से ही टीएमसी के भीतर दरार गहरी होती जा रही है. ममता बनर्जी की टीएमसी नेताओं पर पकड़ लगातार कमज़ोर पड़ रही है, जिसका नतीजा है कि मंगलवार को पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन से ज़्यादातर विधायक नदारद रहे.
ममता के प्रोटेस्ट से टीएमसी विधायक-सांसद की दूरी
बंगाल में सत्ता बदलते ही सियासत भी बदल गई है. टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगातार हिंसक हमले हो रहे हैं, जिसके खिलाफ ममता बनर्जी ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने की इजाजत मांगी थी. कोलकाता पुलिस ने सुरक्षा और अनुमति का हवाला देते धरने का परमिशन नहीं दिया था. इसके बाद भी ममता बनर्जी ने कोलकाता के रानी रासमणि एवेन्यू पहुंचकर धरना दिया, लेकिन टीएमसी के ज्यादातर नेताओं ने दूरी बनाए रखी थी.
ममता के इस धरने में शामिल होने वाले विधायकों में सिर्फ सोभनदेब चट्टोपाध्याय, नान्या बंदोपाध्याय, मदन मित्रा, अशोक देब, असीमा पात्रा, बिमान बनर्जी, फ़िरहाद हकीम और कुणाल घोष शामिल थे. टीएमसी के सांसदों में डोला सेन,कल्याण बनर्जी, डेरेक ओ ब्रायन, समीरुल इस्लाम, मेनका गुरुस्वामी और नदीमुल हक शामिल थे
ममता के प्रोटेस्ट में 8 विधायक और 6 सांसद पहुंचे
ममता बनर्जी के धरना प्रदर्शन ने टीएमसी के भीतर चल रहे भयंकर अंतर्विरोध को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया. टीएमसी के पास कुल 80 विधायक और संसद में 41 सांसद (लोकसभा और राज्यसभा) हैं, उसके महाधरने में ममता बनर्जी के साथ मंच साझा करने के लिए मात्र 8 विधायक और 6 सांसद ही पहुंच थे.
मंगलवार को ममता बनर्जी ने अपनी पूरी राजनीतिक ताकत झोंकने के लिए रानी रासमणि एवेन्यू को चुना, तो यह विधायकों संख्या घटकर मात्र 8 रही तो सांसद 6 रहे . टीएमसी के 72 विधायकों और 23 सांसदों का इस तरह दीदी के सबसे बड़े आंदोलन से दूरी बना लेना यह साफ संकेत देता है कि टीएमसी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
पश्चिम बंगाल में टीएमसी क्या टूट जाएगी?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर लगी आग अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी है.ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व और आई-पैक की कार्यशैली को लेकर कितना गहरा आक्रोश व्याप्त है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह बगावत अचानक नहीं हुई है. इसकी पटकथा उसी दिन लिख दी गई थी जब अभिषेक बनर्जी पर हुए कथित हमले के बाद ममता बनर्जी ने पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई थी, जिसमें सिर्फ 20 विधायक ही पहुंचे थे.
टीएमसी में यह राजनीतिक संकट तब और गहरा गया जब पार्टी से हाल ही में निकाले गए मुखर नेता रिजू दत्ता ने एक सनसनीखेज दावा कर दिया. रिजू दत्ता ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस अब औपचारिक रूप से दो धड़ों में बंटने की कगार पर खड़ी है.
उन्होंने दावा किया कि टीएमसी के 80 विधायकों में से 50 से अधिक विधायक एक साथ आकर खुद को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित करने की अंतिम तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में अगर यह दावा सच साबित होता है, तो बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के युग का यह सबसे दर्दनाक अंत हो सकता है, जहां उनके अपने ही सिपहसालार उन्हें मझधार में छोड़कर नई राह पकड़ रहे हैं.