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अंडाल भू-धंसान: 24 घंटे बाद भी दहशत बरकरार, घरों में रह गए जरूरी दस्तावेज, पुनर्वास और मुआवजे की मांग तेज

पश्चिम बंगाल के आसनसोल के अंडाल इलाके में हुए भीषण भू-धंसान के 24 घंटे बाद भी हालात सामान्य नहीं हो सके हैं. करीब एक हजार लोग अब भी अपने घरों से दूर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं. प्रशासन ने पूरे इलाके को सील कर दिया है, जिससे लोग अपने घरों में रखे आधार कार्ड, बैंक दस्तावेज और जरूरी सामान तक नहीं निकाल पा रहे हैं.

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लोग कर रहे पुनर्वास और मुआवजे की मांग. (Photo: Screengrab)
लोग कर रहे पुनर्वास और मुआवजे की मांग. (Photo: Screengrab)

घर तो बच गए... लेकिन उनमें लौटने की इजाजत नहीं. अंडाल में भू-धंसान के बाद 1000 लोगों की जिंदगी बीच रास्ते में अटक गई. एक रात में सब कुछ बदल गया. जो घर कल तक सुरक्षित लग रहा था, आज उसके दरवाजे तक जाना भी मना है. अलमारी में बच्चों की मार्कशीट पड़ी है. किसी का आधार कार्ड, किसी की बैंक पासबुक, किसी की शादी के गहने... सब घर के अंदर हैं. लेकिन घर अब सिर्फ मकान नहीं, खतरे का इलाका घोषित हो चुका है.

यह तस्वीर पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्दवान जिले के अंडाल के विश्वेश्वरी इलाके के धोबा पाड़ा की है, जहां मंगलवार को हुए भीषण भू-धंसान के 24 घंटे बाद भी लोगों की जिंदगी सामान्य नहीं हो सकी है. करीब एक हजार लोग अब भी अपने घरों से बेघर हैं. प्रशासन और ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) ने पूरे प्रभावित इलाके को घेरकर सील कर दिया है. वजह है- जमीन अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही.

asansol andal land subsidence thousand displaced demand rehabilitation and compensation

बुधवार सुबह भी इलाके में लोगों की चिंता कम नहीं हुई. कई जगह जमीन में नई दरारें दिखाई दीं. कुछ मकानों की दीवारें झुक गईं. ऐसे में किसी को भी अपने घर के भीतर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है.

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लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल सिर्फ बेघर होना नहीं है. लोगों के आधार कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड, बैंक के कागजात, बच्चों के शैक्षणिक प्रमाणपत्र और रोजमर्रा का जरूरी सामान अब भी घरों के अंदर फंसा हुआ है. कई परिवार अपने दस्तावेज निकालने के लिए सुरक्षा घेरा पार करना चाहते हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें वापस लौटा देता है.

उधर प्रशासन ने प्रभावित लोगों के लिए भोजन और राहत की व्यवस्था शुरू कर दी है. लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि सिर्फ खाना मिलने से जिंदगी पटरी पर नहीं लौटेगी. उनका सवाल है- अगर घर ही नहीं बचा, तो आगे रहेंगे कहां? बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी? और जिनके सारे जरूरी कागज घर में रह गए, उनका क्या होगा?

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इस भू-धंसान का असर बच्चों पर भी साफ दिखाई दे रहा है. कई छात्र राहत शिविरों और धर्मशालाओं में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं. स्कूल की किताबों से ज्यादा उन्हें अपने घर की चिंता सता रही है.

इस बीच रानीगंज के विधायक पार्थ घोष और पांडवेश्वर के पूर्व CPI(M) विधायक गौरांग चटर्जी ने प्रभावित इलाके का दौरा किया. दोनों नेताओं ने ECL पर लापरवाही का आरोप लगाया. उनका कहना है कि बंद पड़ी खदानों वाले इस इलाके में भू-धंसान की आशंका पहले से जताई जाती रही थी, लेकिन समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए.

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स्थानीय लोगों की नाराजगी भी कुछ ऐसी ही है. उनका कहना है कि यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि लंबे समय से बरती गई लापरवाही का नतीजा है. उनका दावा है कि बारिश के मौसम में इस इलाके में भू-धंसान का खतरा पहले भी कई बार सामने आ चुका था, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन परिवारों के घर अब असुरक्षित घोषित किए जा चुके हैं, उनका स्थायी पुनर्वास कब होगा? क्या उन्हें मुआवजा मिलेगा? और जिनकी पूरी जिंदगी अभी भी उन बंद घरों के अंदर कैद है, उन्हें वापस अपनी दुनिया कब मिलेगी?

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