राम मंदिर के कथित दान घोटाले की जांच जारी है. लेकिन पूछताछ में जो बातें बाहर आ रही हैं, वो जांच की दिशा का इशारा जरूर करती हैं. सूत्रों के मुताबिक, अनिल मिश्रा ने पुलिस के सामने खुद को बेगुनाह बताया और पूरा ठीकरा टिन्नू यादव पर फोड़ दिया. हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि करोड़ों की कथित गड़बड़ी होती रही और उन्हें पता कैसे नहीं चला, तो उन्होंने निगरानी में चूक होने की बात मान ली.
सूत्रों के मुताबिक, अनिल मिश्रा ने कहा कि दान की गिनती करने वाले कर्मचारी टिन्नू यादव के निर्देश पर काम करते थे और कथित गड़बड़ी में उनकी कोई भूमिका नहीं थी. यानी जो कुछ हुआ, उसकी जिम्मेदारी उन्होंने सीधे टिन्नू यादव पर डाल दी.
लेकिन पूछताछ यहीं खत्म नहीं हुई. पुलिस ने अगला सवाल पूछा- जब मंदिर प्रबंधन में आपकी भूमिका थी, तब कथित तौर पर करोड़ों रुपये की गड़बड़ी कैसे होती रही? और अगर हुई तो आपको इसकी भनक क्यों नहीं लगी?
सूत्रों के मुताबिक, इस सवाल के जवाब में अनिल मिश्रा ने कहा कि कथित गड़बड़ी का पता खुद ट्रस्ट को चला था. जैसे ही मामला सामने आया, जांच शुरू कराई गई और बाद में एसआईटी जांच की मांग भी की गई. हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि निगरानी के स्तर पर चूक हुई थी.
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बताया जा रहा है कि पूछताछ के दौरान कई ऐसे सवाल भी पूछे गए, जिनका अनिल मिश्रा संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. अब जांच एजेंसियां उनके बयान का दस्तावेजों, रिकॉर्ड और अन्य लोगों के बयानों से मिलान कर रही हैं.
इस मामले में गोपाल राव के भी जल्द बयान दर्ज किए जा सकते हैं. जांच का फोकस अब यह पता लगाने पर है कि कथित अनियमितता अगर हुई, तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है और किसकी भूमिका सामने आती है. फिलहाल पुलिस की ओर से पूछताछ को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है. जांच अभी जारी है और आगे आने वाले साक्ष्यों के आधार पर तस्वीर और साफ हो सकती है.
ट्रस्ट के फाइनेंशियल रिकॉर्ड की पड़ताल करेगी एसआईटी
एसआईटी अब ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड, भुगतान प्रक्रिया और दान से जुड़े दस्तावेजों की भी पड़ताल करेगी. जांच एजेंसी का फोकस यह समझने पर है कि वित्तीय लेन-देन में कहीं ऐसी खामियां तो नहीं थीं, जिनका फायदा उठाकर कथित गड़बड़ी को अंजाम दिया गया. इसी कड़ी में पिछले पांच वर्षों के ऑडिट रिकॉर्ड, लेखा-जोखा और संबंधित दस्तावेजों का मिलान भी किया जाएगा.
सूत्रों का कहना है कि जांच के दौरान कई ऐसे बिंदु सामने आए हैं, जिनकी वजह से ट्रस्ट के कुछ सीनियर पदाधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है. इसके अलावा मंदिर निर्माण कार्य से जुड़े भुगतान, ठेकों और कथित कमीशनखोरी के आरोपों की भी पड़ताल की जा रही है.
दान के रूप में सोने-चांदी के जेवरात भी आए. अब एसआईटी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन आभूषणों का रिकॉर्ड किस तरह रखा गया, उनका वेरीफिकेशन कैसे हुआ और क्या समय-समय पर उनका ऑडिट कराया गया था. फिलहाल एसआईटी 15 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपने की तैयारी में है.