उत्तर प्रदेश सरकार की औद्योगिक और खेल प्रोत्साहन नीतियों का असर अब मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में साफ दिखाई देने लगा है. कभी सिर्फ क्रिकेट के बल्लों के लिए पहचान रखने वाला मेरठ अब देश के सबसे बड़े बहुआयामी स्पोर्ट्स गुड्स हब के रूप में उभर रहा है.
सरकार की ओर से मशीनों पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, ब्याज मुक्त ऋण, ओडीओपी (एक जिला-एक उत्पाद) योजना और खेलो इंडिया अभियान जैसी पहल ने उद्योग को नई गति दी है. इसके साथ ही बड़ी संख्या में महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है.
मेरठ में अब पारंपरिक लकड़ी के क्रिकेट बल्लों के साथ-साथ आधुनिक तकनीक से प्लास्टिक और फाइबर के क्रिकेट बैट भी बड़े पैमाने पर बनाए जा रहे हैं. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और लकड़ी की बढ़ती कीमतों के बीच प्लास्टिक बैट की मांग लगातार बढ़ रही है.
बुची स्पोर्ट्स के मालिक चरणजीत भाटिया बताते हैं कि देश में स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के दो सबसे बड़े केंद्र मेरठ और जालंधर हैं. पहले मेरठ की पहचान केवल क्रिकेट सामान तक सीमित थी, लेकिन अब यहां एथलेटिक्स, जिम्नास्टिक, फुटबॉल, टेबल टेनिस, कैरम बोर्ड और अन्य खेल सामग्री का भी बड़े स्तर पर उत्पादन हो रहा है.

उन्होंने बताया कि सरकार की योजनाओं से उद्योग को सीधा लाभ मिल रहा है. नई मशीनें लगाने पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी मिल रही है और ब्याज मुक्त ऋण मिलने से छोटे उद्योगों को भी विस्तार का अवसर मिला है. हाल ही में उनकी कंपनी ने प्लास्टिक बैट बनाने की मशीन लगाई, जिस पर सरकारी सब्सिडी का लाभ मिला.
भाटिया के अनुसार, पहले मेरठ में केवल चार-पांच स्पोर्ट्स यूनिट थीं, जबकि आज छोटी-बड़ी मिलाकर करीब 5 से 7 हजार यूनिट संचालित हो रही हैं. अनुमान है कि मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री का वार्षिक कारोबार 15 से 20 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है.
उन्होंने बताया कि उनकी फैक्ट्री में प्रतिदिन 8 से 10 हजार प्लास्टिक बैट तैयार किए जाते हैं. नई तकनीक के कारण इन बैटों का वजन अब लकड़ी के बल्लों के लगभग बराबर हो गया है. इंडोर क्रिकेट, बॉक्स क्रिकेट और टेनिस बॉल क्रिकेट में इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है.
बीडीएम स्पोर्ट्स के मालिक आदित्य महाजन का कहना है कि केंद्र और प्रदेश सरकार की खेलो इंडिया नीति ने मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को नई पहचान दी है. पहले यहां मुख्य रूप से क्रिकेट बैट बनते थे, जबकि अब बैडमिंटन, टेनिस, टेबल टेनिस, कैरम बोर्ड, प्लास्टिक स्पोर्ट्स उत्पाद और अन्य खेल सामग्री का बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है.
उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार की ब्याज मुक्त ऋण योजना छोटे उद्योगों के लिए बड़ी राहत साबित हुई है. एक वर्ष तक ब्याज नहीं देना पड़ता और उसके बाद भी ब्याज दर काफी कम रहती है. इससे उद्योगों का विस्तार आसान हुआ है. महाजन के अनुसार, सरकार ने गांव-गांव कौशल प्रशिक्षण केंद्र खोलकर महिलाओं को प्रशिक्षित किया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं. पहले स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में महिलाओं की भागीदारी लगभग एक प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 9 से 10 प्रतिशत तक पहुंच गई है. इससे उद्योग में श्रमिकों की कमी भी काफी हद तक दूर हुई है.

उन्होंने कहा कि पहले क्रिकेट बैट बनाने के लिए कश्मीर और इंग्लैंड से आने वाली लकड़ी पर निर्भरता थी, लेकिन महंगी होती लकड़ी के कारण अब प्लास्टिक बैट की मांग तेजी से बढ़ी है. वर्तमान में मेरठ में 50 से अधिक यूनिटें प्लास्टिक क्रिकेट बैट बना रही हैं और देश के बड़े ब्रांड भी यहां से उत्पाद खरीद रहे हैं.
स्पोर्ट्स उद्योग में काम कर रहीं महिलाओं का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में रोजगार के अवसर बढ़े हैं और कार्यस्थलों पर सुरक्षा व सुविधाओं में भी सुधार हुआ है.
नूरनगर निवासी विमलेश ने बताया कि वह पिछले छह महीने से फैक्ट्री में काम कर रही हैं और अब महिलाएं बिना किसी डर के रोजगार कर रही हैं. फैक्ट्री कर्मचारी अंजू ने कहा कि पहले महिलाओं की संख्या बहुत कम थी, लेकिन अब बड़ी संख्या में महिलाएं उद्योग से जुड़ रही हैं. परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी निभाने में यह रोजगार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.
करीब 23 वर्षों से स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में कार्यरत शिमला बताती हैं कि पहले की तुलना में अब सुविधाएं बेहतर हुई हैं और महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ा है. हर वर्ष नई महिला कर्मचारियों की भर्ती हो रही है. उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि सरकार की योजनाओं से उद्योग को बड़ा लाभ मिला है, लेकिन तेजी से बढ़ते कारोबार को देखते हुए अब स्पोर्ट्स क्लस्टर और नई औद्योगिक भूमि उपलब्ध कराना समय की जरूरत है. उनका मानना है कि यदि यह मांग पूरी होती है तो मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री वैश्विक स्तर पर और मजबूत पहचान बना सकती है.