इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को एक महीने से ज्यादा समय हो चुका है और इसका असर अब भारत के घरेलू जीवन पर भी साफ दिखाई देने लगा है. खासकर एलपीजी गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से देश के कई हिस्सों में लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. जगह-जगह गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारें और मारामारी की तस्वीरें सामने आ रही हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का एक गांव इस संकट के दौर में मिसाल बनकर उभरा है, जहां के लोगों को एलपीजी की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ रहा.
सुबह-शाम तीन-तीन घंटे होती है सप्लाई
चंदौली जिले के नियमताबाद ब्लॉक स्थित एकौनी गांव में बायोगैस प्लांट इस समय ग्रामीणों के लिए संजीवनी साबित हो रहा है. करीब डेढ़ सौ परिवारों वाले इस गांव में 125 परिवार बायोगैस का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें एलपीजी सिलेंडर के लिए ना तो लाइन में लगना पड़ रहा है और ना ही बुकिंग की चिंता करनी पड़ रही है. बायोगैस प्लांट से ग्रामीणों को सुबह और शाम तीन-तीन घंटे गैस की सप्लाई मिलती है, जिससे वे आसानी से खाना पका लेते हैं.
बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद लौट आए गांव
दरअसल, इस बदलाव की कहानी गांव के ही युवा चंद्र प्रकाश सिंह से जुड़ी है. उन्होंने भोपाल से बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करने के बजाय गांव लौटकर अपने पिता के साथ गौशाला के काम को आगे बढ़ाने का फैसला किया. उनके पिता ने करीब 10 साल पहले 50 गायों के साथ गौशाला की शुरुआत की थी, जिसे चंद्र प्रकाश ने अपनी मेहनत से बढ़ाकर 200 गायों तक पहुंचा दिया.
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करीब चार साल पहले चंद्र प्रकाश के मन में विचार आया कि गौशाला से निकलने वाले गोबर का बेहतर उपयोग किया जा सकता है. उन्होंने गांव वालों के साथ मिलकर बायोगैस प्लांट लगाने की योजना बनाई, जिसे ग्रामीणों का भी पूरा समर्थन मिला. इसके बाद गांव में बायोगैस प्लांट स्थापित किया गया और 125 परिवारों को इसका कनेक्शन दिया गया.
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क्या कहते हैं गांव के लोग?
गांव की गृहणी कंचन सिंह बताती हैं कि पहले उन्हें इस सुविधा का महत्व पूरी तरह समझ में नहीं आया था, लेकिन अब जब एलपीजी संकट गहराया है, तब उन्हें इसकी असली अहमियत समझ में आई है. उन्होंने कहा कि अब उन्हें गैस के लिए कहीं लाइन में नहीं लगना पड़ता और वे अपनी सुविधा के अनुसार खाना बना पाती हैं.
वहीं, गांव के ही निवासी अखिलेश सिंह का कहना है कि बायोगैस न केवल सस्ती है बल्कि काफी सुविधाजनक भी है. उनके मुताबिक, मौजूदा समय में यह व्यवस्था उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है. अगर यह सुविधा नहीं होती, तो उन्हें भी एलपीजी के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ता.
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3000 किलो गोबर का इस्तेमाल
चंद्र प्रकाश सिंह के अनुसार, बायोगैस की लागत एलपीजी के मुकाबले लगभग आधी है और इससे उनकी गौशाला से रोज निकलने वाले करीब 3000 किलो गोबर का भी सही उपयोग हो जाता है. वर्तमान हालात में जब देश के कई हिस्सों में गैस की किल्लत है, ऐसे में एकौनी गांव के लोग खुद को काफी सुरक्षित और संतुष्ट महसूस कर रहे हैं.
यह गांव अब न केवल आत्मनिर्भर ऊर्जा का उदाहरण बन चुका है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे-छोटे प्रयास बड़े संकट के समय कितने कारगर साबित हो सकते हैं.