
भदोही को दुनिया भर में अपनी बेहतरीन कालीनों के लिए जाना जाता है. अब सरकारी योजनाओं के जरिए इस पारंपरिक उद्योग को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है. एक जिला-एक उत्पाद (OPOD) योजना के तहत पूंजी, बाजार और हुनर इन तीनों मोर्चों पर इस उद्योग को सहारा मिल रहा है.
सरकार के मुताबिक मार्जिन मनी योजना के तहत 347 लाभार्थियों को 131 करोड़ रुपये से ज्यादा का सब्सिडी वाला लोन दिया गया है. इसमें 12 करोड़ रुपये से ज्यादा की सब्सिडी शामिल है. वहीं, 546 उद्यमियों को देश-विदेश के मेलों में अपने उत्पाद का प्रदर्शन करने के लिए 6.85 करोड़ की मदद दी गई. इसके अलावा 2,350 लोगों को ट्रेनिंग और दूसरी मदद देकर कालीन उद्योग को बढ़ावा दिया जा रहा है. भदोही से कालीन अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और मध्य-पूर्व समेत 88 से ज्यादा देशों में निर्यात किया जाता है. भारत से हर साल लगभग 13 हजार करोड़ रुपये की कालीन का निर्यात होता है, जिसमें अकेले भदोही की हिस्सेदारी 60% से ज्यादा है.

भदोगी के इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए इसे OPOD योजना में शामिल किया गया है. साल 2018 से इस योजना के तहत नए और पुराने दोनों कालीन कारोबारियों को वित्तीय मदद, ट्रेनिंग और दूसरी सुविधाएं दी जा रही हैं.
कालीन बुनाई सेंटर के संचालक अक्षय उपाध्याय ने इस योजना को लेकर बताया कि इस योजना से जुड़कर वे और लोगों को रोजगार दे रहे हैं. उनका कहना है कि OPOD योजना ऐसी है जिसने निचले तबके के लोगों की भी मदद की है. उन्होंने बताया कि उन्हें इसके तहत 50 लाख का लोन मिला, जिसमें वे हर महीने 2 हजार गलीचों का उत्पादन करते हैं. इससे वे 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार देते हैं.

एक कालीन निर्यातक अमित मौर्या ने बताया कि उन्हें OPOD योजना के तहत 2 करोड़ का लोन मिला है. इसकी सब्सिडी भी उन्हें मिल चुकी है. उन्होंने बताया कि उनका कारोबार पूरी दुनिया में है. अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया जैसे दूसरे देशों में उनके कालीन निर्यात होते हैं. उनका कहना है कि OPOD योजना से वे अपने इस उद्योग को बढ़ा पाए हैं.
अन्य कालीन निर्यातक इम्तियाज अहमद ने भी OPOD योजना की सराहना की है. उन्होंने बताया कि उन्हें इससे जो लोन मिला उससे वे 10-20 मजदूरों को रखकर अपना काम करते हैं. उन्होंने बताया कि भदोही जिले में ही 200-250 लोगों को इस योजना का सीधा लाभ मिला है. और बहुत से लोगों ने इसकी मदद से अपना स्टार्टअप भी शुरू किया.
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कालीन निर्यातक पीयूष बर्नवाल ने बताया कि इस योजना से उन्हें बहुत मदद मिली है. 21 प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद कालीन तैयार होती है, धागे से शुरू करने से लेकर कालीन बनाने तक बहुत समय लगता है और एक-एक कालीन बनाने में उन्हें 4-12 महीने लग जाते हैं. ऐसे में इस योजना के जरिए उन्हें पूंजी मिल जाती है. उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत उन्होंने 25 लाख की मार्जिन मनी से अपने उद्यम को आगे बढ़ाया है.

डिप्टी कमिश्नर दया शंकर सरोज ने बताया कि इस योजना की शुरुआत 2018 में हुई थी. इसके तहत 3-4 योजनाएं भी संचालित होती हैं. पहली योजना के जरिए व्यक्ति को प्रशिक्षण दिया जाता है. 10 दिन की ट्रेनिंग में हर दिन 200 रुपये के हिसाब से कुल 2 हजार रुपये का मानदेय भी दिया जाता है. वित्त पोषण योजना के तहत बैंक के माध्यम से फाइनेंस कराकर उद्योग स्थापित करने वालों को सहायता भी दी जाती है. इसमें 25 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है.
उन्होंने बताया कि कॉमन फैसिलिटी सेंटर की भी सुविधा दी गई है. अगर किसी क्लस्टर के रूप में कोई काम करना चाहता है और उसके पास पर्याप्त धनराशि नहीं है या उसे सरकार से मदद की जरूरत है तो सरकार क्लस्टर में काम करने के लिए उन्हें मदद देती है. इसमें सरकार 90% तक ग्रांट देती है.