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41 साल पुराने घूस मामले में पूर्व लेखपाल की सजा बरकरार, इलाहाबाद HC ने खारिज की अपील, 1977 में ली थी 300 रुपये रिश्वत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर जिले में करीब पांच दशक पहले साल 1977 में चकबंदी कार्यवाही के दौरान महज 300 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े गए पूर्व लेखपाल महेश चंद की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है.

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इलाहाबाद  हाई कोर्ट. ( PHOTO-ITG)
इलाहाबाद हाई कोर्ट. ( PHOTO-ITG)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1977 में मात्र 300 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े गए एक पूर्व लेखपाल की 1985 की सजा को बरकरार रखा है. न्यायालय ने 41 वर्ष पुरानी आपराधिक अपील को खारिज करते हुए पूर्व लेखपाल महेश चंद को एक वर्ष की कठोर कारावास की सजा का आदेश दिया और उन्हें चार हफ्ते के अंदर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है.

न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकलपीठ ने तीन जुलाई को दिए फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के ये साबित कर दिया है कि आरोपी ने चकबंदी (consolidation) की कार्यवाही के दौरान अवैध रूप से पैसे लिए थे.

जमीन आवंटन के बदले मांगी थी रिश्वत

दरअसल, ये मामला कानपुर जिले में कृषि भूमि से जुड़ी चकबंदी कार्यवाही से जुड़ा था. अभियोजन पक्ष के अनुसार, वीरेंद्र सिंह कृषि भूखंडों के आवंटन के संबंध में आशा देवी द्वारा दायर अपील का मुकाबला कर रहे थे.

आरोप था कि उस वक्त लेखपाल के तौर पर काम कर रहे महेश चंद ने कानूनगो चंद्र सेन के साथ मिलकर वीरेंद्र सिंह के जमीन आवंटन को सुरक्षित रखने के लिए 400 रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की थी.

पीड़ित के बेटे ने की थी शिकायत

अभियोजन पक्ष का दावा है कि वीरेंद्र सिंह ने शुरू में चंद्र सेन को 100 रुपये दिए और बाद में उनके बेटे जय विजय सिंह से बाकी 300 रुपये मांगे गए. पैसे का इंतजाम करने के बजाय, जय विजय सिंह विजिलेंस डिपार्टमेंट के पास गए, जिन्होंने एक ट्रैप (जाल) बिछाया.

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केमिकल टेस्ट से हुई पुष्टि

विजिलेंस विभाग के इस ऑपरेशन के दौरान लेखपाल महेश चंद को अदालत परिसर के पास स्थित एक होटल से फिनोलफ्थलीन पाउडर लगे 300 रुपये स्वीकार करते हुए रंगे हाथों दबोच लिया गया था. आरोपी के पास से वो निशान लगे नोट बरामद किए गए थे और केमिकल टेस्ट (रासायनिक जांच) में भी नोटों के संपर्क में आने की पूरी पुष्टि हुई थी.

सही था निचली अदालत का फैसला: HC

कोर्ट ने कहा, 'इस तरह का ट्रैप सीक्रेट रूप से बिछाया जाता है और जानकारी रेडिंग पार्टी के सदस्यों के बीच गुप्त रखी जाती है और जगह का इंतजाम इस तरह किया जाता है कि आरोपी को रंगे हाथों पकड़े जाने का कोई शक न हो.'

जस्टिस कुमार ने मुकदमे के दौरान दर्ज सभी सबूतों की गहन जांच की और अभियोजन पक्ष के मामले को प्रभावित करने वाली कोई भी विसंगति नहीं पाई. कोर्ट ने नोट किया कि विजिलेंस अधिकारियों, सार्वजनिक गवाह और जय विजय सिंह के बयान रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने के मामले में पूरी तरह सुसंगत थे. इसके बाद हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन कर बिल्कुल सही सजा सुनाई थी.

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