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स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती

स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती (Swami Jitendranand Saraswati), जिन्हें आचार्य जितेंद्र के नाम से भी जाना जाता है, एक धार्मिक नेता, संत, पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक विषयों पर सक्रिय वक्ता हैं. वर्तमान में वे अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव के रूप में कार्य कर रहे हैं. इसके अलावा उन्होंने हिंद-बालोच फोरम (HBF) की स्थापना भी की, जो भारत में बलोच मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा और जागरूकता से संबंधित मंच के रूप में जाना जाता है.

स्वामी जीतेंद्रानंद का जन्म 25 फरवरी 1972 को हुआ था.

स्वामी जीतेंद्रानंद ने देश के विभिन्न हिस्सों में बलूचिस्तान से जुड़े विषयों पर कई सेमिनार और कार्यक्रम आयोजित किए हैं. वे वर्ष 1991 के पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम के खिलाफ भारत के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाले पहले धार्मिक याचिकाकर्ता के रूप में भी चर्चा में रहे हैं. इस मामले के माध्यम से उन्होंने अधिनियम से जुड़े कानूनी पहलुओं को न्यायालय के समक्ष रखा.

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी स्वामी जीतेंद्रानंद लंबे समय से सक्रिय हैं. वर्ष 2000 से वे गंगा महासभा के साथ जुड़े हुए हैं. गंगा नदी से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर उन्होंने कई सामाजिक और जनजागरूकता अभियानों में भाग लिया. वर्ष 2008 में उन्होंने गंगा पर प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं के संबंध में कई नेताओं से मुलाकात की और इस विषय पर अपनी बात रखी. इसी दौरान उन्होंने पर्यावरणविद् प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल से भी संवाद किया, जिसके बाद उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया.

वर्ष 2010 में स्वामी जीतेंद्रानंद ने गंगा पर प्रस्तावित लोहारीनाग-पाला जलविद्युत परियोजना के संबंध में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक नेताओं से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय और राज्य स्तर के नेताओं के साथ चर्चा की. 

स्वामी जीतेंद्रानंद ने समय-समय पर अन्य सार्वजनिक मुद्दों पर भी अपनी राय व्यक्त की है. उन्होंने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर बख्तियारपुर का नाम बदलकर चाणक्यपुर या शीलभद्रपुर करने का सुझाव दिया था.

धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ स्वामी जीतेंद्रानंद सामाजिक, पर्यावरण और सार्वजनिक नीति से जुड़े विभिन्न विषयों पर लगातार सक्रिय रहे हैं. वे देशभर में आयोजित धार्मिक सभाओं, विचार-विमर्श कार्यक्रमों और सामाजिक आयोजनों में भाग लेते हैं तथा समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार रखते हैं.
 

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