शंकराचार्य पद को लेकर चल रहे विवाद ने एक बार फिर धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है. खुद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बताने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं आदि के बयानों के बाद यह मामला सुर्खियों में है. गुरुवार को इसी विषय पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से आजतक ने बातचीत की, जहां उन्होंने अपनी बात रखी.
वहीं इस बहस के दौरान अखिल भारतीय संत समिति स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने भी कड़े शब्दों में जवाब दिया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पहले अपने शंकराचार्य होने के दावे को लेकर बात की, इसके साथ ही उन्होंने कहा कि माघ मेले में हमारा अपमान हुआ. उनके ऐसा कहने पर स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा- जब पूरे माघ मेले में सभी संत पैदल गंगा स्नान के लिए जा रहे थे तो आपको ही पालकी से जाने की क्या चुल्ल थी?
क्या बोले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आजतक से कहा कि शंकराचार्य वही होता है, जिसे शेष तीन आम्नाय पीठ मान्यता दें. उनका आरोप है कि प्रशासन से बातचीत में सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर जो तथ्य रखे गए, वे अधूरे और भ्रमित करने वाले थे. उनके अनुसार, जिस आदेश का हवाला दिया जा रहा है, उससे लगभग एक महीने पहले ही उनका शंकराचार्य के रूप में विधिवत पट्टाभिषेक हो चुका था. इसकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दे दी गई थी.
विवाद के बारे में दी जानकारी
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मुताबिक, उनके पद पर आसीन होने के बाद प्रतिपक्षी स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, जिनसे उनके गुरु का पहले से विवाद चल रहा था, ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर उन्हें शंकराचार्य के रूप में कार्य करने से रोकने की मांग की थी. यह मामला 21 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट में सुना गया, जहां अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया. उनका कहना है कि इसके बाद उन्होंने 12 अक्टूबर को पुरी के शंकराचार्य से जुड़ा एक कथित छद्म हलफनामा अदालत में पेश किया, जिसमें कहा गया कि पुरी पीठ ने उन्हें मान्यता नहीं दी है और भविष्य में किसी अन्य का पट्टाभिषेक न कराया जाए. इसी आधार पर अदालत ने एक आदेश पारित किया, जिसे अब संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है.
पालकी से जाने को लेकर उठा सवाल
माघ मेला में हुई घटना को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि माघ मेला में हमारे साथ गलत व्यवहार हुआ. हमारे शिष्यों, बटुकों के साथ मारपीट हुई. हम इसका विरोध कर रहे हैं. ये गलत तरीका है. इस पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद से जुड़े स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि माघ मेला में शाही स्नान और पालकी से स्नान की कोई परंपरा नहीं है. उनके अनुसार, ऐसी क्या मजबूरी थी कि 50 मीटर पैदल भी नहीं चला जा सका. उन्होंने सवाल उठाया कि जब अन्य संत और श्रद्धालु पैदल स्नान के लिए जाते हैं, तो गंगा स्नान के लिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से खास व्यवस्था क्यों अपनाई गई.
अपमानजनक लहजे का लगाया आरोप
इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जवाब देते हुए कहा कि पैदल जाकर स्नान करने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन जहां तक पालकी से जाने की अनुमति थी, वहां तक जाना स्वाभिमान और परंपरा से जुड़ा विषय है. उन्होंने कहा कि उन्हें विवेक संपन्न व्यक्ति मानते हुए उनके विवेक पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए. उनका आरोप है कि पुलिस ने बातचीत के दौरान अपमानजनक लहजे का इस्तेमाल किया. उन्होंने गलत तरीके से कहा और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाया.
इसके बाद स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने इस पूरे विवाद को राजनीतिक रंग देने की कोशिशों का भी आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विरोध में इस हद तक अंधे हो चुके हैं कि देशद्रोह की सीमा तक चले जाते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे लोग (स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद) बिहार में चुनाव क्यों लड़ने गए थे, उन्होंने इसे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति बताया.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि दंडी संन्यासियों, बटुकों और शंकराचार्य परंपरा का अपमान हो रहा है, लेकिन इस पर सत्ताधारी दल की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है. वहीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जिसे अहम कहा जा रहा है, वह वास्तव में स्वाभिमान का सवाल है.
जितेंद्रानंद सरस्वती ने कही ये बात
इस पर जितेंद्रानंद सरस्वती ने तीखे शब्दों में कहा कि शाही स्नान केवल अर्ध कुंभ और महाकुंभ में होता है, माघ मेला में नहीं, फिर भी पालकी और विशेष व्यवस्था को लेकर विवाद खड़ा किया गया. आखिर आपको ही क्यों चुल्ल मची थी कि आप भीड़ में व्यवस्था खराब कर रहे थे. आपमें ही चुल्ल क्यों मची थी कि गंगा स्नान के लिए पालकी से जा रहे थे. आपमें भगदड़ मचवाने की चुल्ल क्यों मची थी. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग राजनीतिक दलों के 'हथियार; बनकर बोल रहे हैं.
इस आरोप पर अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जो गाय माता के मुद्दे पर साथ नहीं है, वह उनके साथ भी नहीं हैं. चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो. कुल मिलाकर, शंकराचार्य पद का यह विवाद अब केवल धार्मिक सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है. इसमें न्यायिक आदेशों की व्याख्या, प्रशासनिक व्यवहार, परंपराओं की समझ और राजनीति सब एक-दूसरे से टकराते दिख रहे हैं.