दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के बीच हो रही G7 समिट में इस बार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर पूरा फोकस है. पहले जहां इन बैठकों में युद्ध, अर्थव्यवस्था और कूटनीति की बात होती थी, अब वहां AI को लेकर खींचतान साफ नजर आ रही है. अमेरिकी ट्रंप सरकार ने हाल ही में फैसला किया है कि एंथ्रॉपिक का सबसे पावरफुल मॉडल का ऐक्सेस दूसरे मुल्कों को नहीं दिया जाएगा. इससे यूरोप सहित कई जगहों पर अमेरिका के खिलाफ नाराजगी देखने को मिल रही है. खास तौर पर, टक्नोलॉजी शेयरिंग को लेकर.
दरअसल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्पेस में अमेरिका की मोनोपॉली साफ देखी जा सकती है. तमाम बड़ी एआई कंपनियां अमेरिका की ही हैं और वो दूसरे मुल्कों के साथ टेक शेयर करने में कतराती हैं. दूसरे देशों को ये कंपनियां कई बार अपने मॉडल्स ट्रेन करने के लिए यूज करती हैं और बदले में यूजर्स और देश को कुछ खास नहीं मिलका.
AI पर अमेरिका का कब्जा, दूसरे देश मुश्किल में
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक G7 देशों के नेता इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि एडवांस AI टेक्नोलॉजी तक किसे और कैसे पहुंच दी जाए. खासतौर पर अमेरिका के पास मौजूद कटिंग-एज AI मॉडल्स को लेकर यूरोप और दूसरे देशों में चिंता बढ़ रही है. सवाल ये है कि क्या AI पर एक ही देश का कंट्रोल रहेगा या बाकी देशों को भी बराबर मौका मिलेगा.
फ्रांस में 15 से 17 जून तक G7 Summit 2026 चल रहा है. आज आखिरी दिन है. इस बार के G7 Summit में ओपन एआई हेड सैम ऑल्टमैन, एंथ्रॉपिक हेड डारियो अमोडेई और गूगल एआई चीफ डेमिस हसाबिस भी शामिल हैं. टोटल 13 अमेरिकी कंपनी के हेड यहां पहुंचे हैं.
दरअसल हर देश चाहता है कि उनके पास सॉवरेन AI हो. यानी अपने ही देश में तैयार किया गया फुल स्टैक एआई हो. लेकिन चूंकि अमेरिकी कंपनियों का डॉमिनेशन इस स्पेस में काफी है, इसलिए दूसरे मुल्क इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर अमेरिका एआई को कंट्रोल करेगा तो मुश्किल होगी.
इतना ही नहीं अमेरिकी AI कंपनियां वहां की सरकार के साथ भी मिल कर काम करती हैं. ऐसे में चिंता ये भी है कि वहां की सरकार और कंपनियां कुछ जरूरी AI टूल दूसरे देशों को कभी नहीं देंगे जिससे उनका विकास दूसरे मुल्कों के मुकाबले कम होगा.
AI रेस में अमेरिका आगे
अमेरिका इस समय AI रेस में सबसे आगे माना जा रहा है. OpenAI, Google और Anthropic जैसी कंपनियां ऐसे मॉडल बना रही हैं जो दुनिया भर में इस्तेमाल हो रहे हैं.
लेकिन अब खबर ये भी सामने आई है कि कुछ एडवांस AI मॉडल्स को लेकर कंट्रोल सख्त किया जा रहा है. रिपोर्ट्स में कहा गया है कि कुछ कंपनियों ने अपने सबसे पावरफुल मॉडल्स को सीमित कर दिया है ताकि सरकार के नियमों का पालन किया जा सके.
यूरोपीय देश चाहते हैं कि AI टेक्नोलॉजी सिर्फ अमेरिका तक सीमित न रहे. उनका कहना है कि अगर AI का कंट्रोल कुछ कंपनियों या एक देश के पास रहा, तो आने वाले समय में टेक्नोलॉजी का बैलेंस बिगड़ सकता है. यही वजह है कि G7 में ट्रस्टेड पार्टनर्स यानी भरोसेमंद देशों को AI एक्सेस देने का आइडिया सामने आया है.
ऐसा माना जा रहा है कि जिस देश के पास बेहतर AI होगा, वही आने वाले समय में अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और डिजिटल दुनिया में आगे रहेगा.
AI मॉडल का कंट्रोल सरकार के पास?
इसी बीच एक और दिलचस्प पहलू सामने आया है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि AI कंपनियां अब अपने मॉडल्स को कंट्रोल करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम कर रही हैं. इसका मतलब यह है कि AI अब सिर्फ टेक कंपनियों का मामला नहीं रहा, बल्कि यह सीधे-सीधे सरकारों के कंट्रोल में जा रहा है.
हाल ही में खबर आई है कि कोई भी पावरफुल AI मॉडल पब्लिक लॉन्च से पहले सरकार से इजात लेनी होगी, ताकि इससे लोगों का नुकसान ना हो. हालांकि ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अगर इस तरह से रोक लगी तो ग्रोथ स्लो हो जाएगी.
डोनाल्ड ट्रंप ने इशारा किया है कि अमेरिकी प्रशासन AI को लेकर सख्त रुख अपना सकता है. इससे यह साफ संकेत मिलता है कि आने वाले समय में AI सिर्फ इनोवेशन का टूल नहीं रहेगा, बल्कि पॉलिटिक्स का भी बड़ा हिस्सा बनने वाला है.
इसका असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है. अगर AI एक्सेस सीमित होता है, तो डेवलपिंग देशों के लिए नई टेक्नोलॉजी तक पहुंच मुश्किल हो सकती है. वहीं दूसरी तरफ, अगर ट्रस्टेड पार्टनर्स का सिस्टम लागू होता है, तो भारत के लिए यह मौका भी बन सकता है कि वह इस क्लब का हिस्सा बने.
पूरी दुनिया अभी जिस दिशा में जा रही है, उसमें AI अब सिर्फ एक टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि एक पावर टूल बन चुका है. G7 की यह चर्चा इस बात का संकेत है कि आने वाले सालों में AI को लेकर ग्लोबल नियम, कंट्रोल और पॉलिटिक्स और भी तेज होने वाली है.