'दौड़ जा दिल्ली रोड... बल्ले की फैक्ट्री में विराट कोहली आया है.' 18 साल पहले मेरठ के माधवपुरम में मुझे यह खबर मिली तो मैं भागा. रास्ते पूछे, फैक्ट्री तलाश की और आखिरकार उस लड़के के सामने जा पहुंचा, जिसने कुछ महीने पहले भारत को 2008 का अंडर-19 विश्व कप जिताया था. श्रीलंका दौरे से पहले वह नया बल्ला लेने मेरठ आया था. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उसका पदार्पण होना बाकी था. आधे घंटे बातचीत हुई. उसने कहा, 'मुझे खुद को साबित करना होगा.' तब न अंदाजा था कि यह लड़का एक दिन दुनिया के गेंदबाजों की नींद उड़ाएगा, न यह कि उसकी पहचान के आगे एक दिन 'किंग' जुड़ जाएगा. आज वही विराट कोहली 38 साल के हो गए हैं.
कभी-कभी जिंदगी में कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जिनकी अहमियत उस वक्त नहीं समझ आती. वक्त गुजरता है, साल बीतते हैं और फिर पीछे मुड़कर देखते हैं तो एहसास होता है कि वह कोई सामान्य मुलाकात नहीं थी. मेरे लिए मेरठ की एक बल्ला फैक्ट्री में विराट कोहली से हुई मुलाकात भी ऐसी ही है.
आज विराट कोहली का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. क्रिकेट के मैदान पर उनका आक्रामक अंदाज, रिकॉर्ड्स की लंबी फेहरिस्त, शतकों का जश्न और जीत के लिए आखिरी दम तक लड़ने का जुनून उन्हें करोड़ों दिलों का चहेता बनाता है. लेकिन 2008 में जब उनसे मुलाकात हुई थी, तब वह भारतीय क्रिकेट में अपनी जगह बनाने की दहलीज पर खड़े एक युवा खिलाड़ी थे. उनके चेहरे पर न आज जैसी मूंछें थीं, न दाढ़ी. न स्टारडम का कोई तामझाम था और न ही आसपास प्रशंसकों की भीड़. बस एक युवा क्रिकेटर था, जिसके सामने एक बड़ा सपना था.
अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतकर चर्चा में आए थे विराट
यह मार्च 2008 की बात है. विराट कोहली की कप्तानी में भारत ने कुआलालंपुर में अंडर-19 विश्व कप का खिताब जीता था. इस जीत ने उन्हें क्रिकेट की दुनिया में पहचान दिलाई. अब लोग कम से कम इतना जानने लगे थे कि दिल्ली का एक लड़का है, जिसका नाम विराट कोहली है. उसने अपनी कप्तानी में भारत को जूनियर विश्व चैम्पियन बनाया है.
विराट नवंबर 2006 में ही दिल्ली की ओर से फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू कर चुके थे. अंडर-19 विश्व कप जीतने के बाद उन्हें IPL (इंडियन प्रीमियर लीग) के पहले सीजन में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) ने अपने साथ जोड़ा. लेकिन आईपीएल 2008 में उनका प्रदर्शन ऐसा नहीं रहा कि वह घर-घर में पहचाने जाने लगते. 12 पारियों में 163 रन, औसत 15 और सर्वोच्च स्कोर 38 रन. आरसीबी का हाल भी अच्छा नहीं था. टीम 14 मुकाबलों में सिर्फ चार जीत सकी.
1 जून 2008 को आईपीएल का पहला सीजन खत्म हुआ. इसके कुछ ही समय बाद विराट के करियर ने ऐसी करवट ली, जिसने उन्हें टीम इंडिया के दरवाजे तक पहुंचा दिया. लेकिन इस मोड़ की कहानी समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना होगा.
वेंगसरकर की नजर में पहले ही चढ़ चुके थे
विराट कोहली को भारतीय टीम तक पहुंचाने में तत्कालीन मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर की अहम भूमिका रही. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने विराट को पहली बार 15 साल की उम्र में देखा था. उस समय विराट दिल्ली की अंडर-16 टीम की ओर से कोलकाता में मुंबई (तब बॉम्बे) के खिलाफ खेल रहे थे. टीम की कप्तानी तेजस्वी यादव कर रहे थे. वेंगसरकर ने विराट की बल्लेबाजी देखने के बाद कहा था, 'वह बहुत अच्छा लगा.' यानी टीम इंडिया में चयन से काफी पहले ही विराट ने अपनी प्रतिभा से वेंगसरकर का ध्यान खींच लिया था.
अंडर-19 विश्व कप में विराट की कप्तानी और बल्लेबाजी ने इस भरोसे को और मजबूत किया. इसके बाद उन्हें ऑस्ट्रेलिया में इमर्जिंग प्लेयर्स टूर्नामेंट के लिए चुना गया. 18 जुलाई 2008 को न्यूजीलैंड की इमर्जिंग टीम के खिलाफ विराट ने नाबाद 120 रन बनाए और भारत को जीत दिलाई. वेंगसरकर खुद यह मुकाबला देखने पहुंचे थे. इस पारी ने उन्हें विराट की प्रतिभा और मानसिक परिपक्वता का भरोसा दिलाया.
आखिरकार 7 अगस्त 2008 को श्रीलंका दौरे के लिए भारतीय टीम का ऐलान हुआ. 16 सदस्यीय वनडे टीम में विराट कोहली का नाम भी था. पांच मैचों की सीरीज 18 अगस्त से शुरू होनी थी. विराट को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करना था.
और इसी दौरे पर जाने से पहले विराट मेरठ पहुंचे थे. उन्हें एक नया बल्ला चाहिए था.
मेरठ से था विराट का पुराना नाता
मेरठ क्रिकेट के बल्लों के लिए जाना जाता रहा है. यहां की बल्ला फैक्ट्रियों की पहचान देशभर में थी. विराट का भी इस शहर से पुराना रिश्ता था. उनके बचपन के कोच राजकुमार शर्मा ने किशोरावस्था में ही उन्हें बीडीएम से जोड़ा था.
विराट क्रिकेट में आगे बढ़ना चाहते थे और एक अच्छे बल्ले की तलाश में रहते थे. उनके कोच राजकुमार शर्मा ने बीडीएम के प्रतिनिधियों से उनकी सिफारिश की थी. कंपनी ने विराट के किशोरावस्था के दिनों में उन्हें सालाना दो बल्ले उपलब्ध कराए. यह साथ भारतीय टीम में पहुंचने के बाद भी कुछ समय तक जारी रहा.
श्रीलंका दौरे से पहले भी विराट मेरठ पहुंचे थे. उन्हें क्या पता था कि बल्ले की तलाश में आया यह युवा खिलाड़ी एक दिन क्रिकेट की दुनिया में बल्ले से ऐसी छाप छोड़ेगा कि उसका नाम ही एक ब्रांड बन जाएगा.
सामने बैठे थे विराट, शुरू हो गया सवाल-जवाब का सिलसिला
अब उस दिन की अपनी याद पर लौटता हूं. फैक्ट्री पहुंचने के बाद अंदर जाने के लिए थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी. काफी पता करने के बाद भीतर जाने की अनुमति मिली. वहां कुछ स्थानीय प्रेस फोटोग्राफर भी मौजूद थे. सभी विराट का इंतजार कर रहे थे.
कुछ देर बाद वह हॉलनुमा कमरे में दाखिल हुए. सामने से देखा तो एकदम युवा चेहरा. न मूंछ, न दाढ़ी. वह सामने रखी कुर्सी पर बड़े इत्मीनान से बैठ गए.
वहां मौजूद लोगों में शायद मैं ही था, जिसने बातचीत शुरू करने की पहल की. मैंने उनसे सवाल पूछने शुरू किए और विराट सहजता से जवाब देने लगे. बाकी लोग अपनी नोटबुक में बातें दर्ज करने में जुट गए.
करीब आधे घंटे तक बातचीत चली. यह कोई बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं थी. न ही किसी स्थापित सितारे का इंटरव्यू. सामने एक ऐसा युवा क्रिकेटर था, जिसने कुछ महीने पहले देश को अंडर-19 विश्व कप जिताया था और अब भारतीय सीनियर टीम में अपनी जगह बनाने जा रहा था.
शायद यह विराट कोहली के अंतरराष्ट्रीय पदार्पण से पहले लिए गए शुरुआती इंटरव्यू में से एक था. कम से कम मेरे लिए वह मुलाकात आज भी बेहद खास है.
धोनी की कप्तानी में खेलने पर दिया था यह जवाब
मुझे उस बातचीत का एक सवाल और उसका जवाब आज भी याद है. मैंने विराट से पूछा था कि वह महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में खेलने जा रहे हैं. धोनी 2007 में भारत को टी20 विश्व कप जिता चुके थे और उस समय भारतीय क्रिकेट के बड़े सितारे थे. ऐसे में अंडर-19 टीम की कप्तानी करने के बाद सीनियर टीम में धोनी के नेतृत्व में खेलना कैसा रहेगा?
विराट ने मुस्कुराते हुए कहा था, 'मुझे खुद को साबित करना होगा. मुझे अपना सौ फीसदी देना होगा.'
उस जवाब में कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं थीं. न ही टीम में चयन को लेकर कोई दिखावा. एक युवा खिलाड़ी की सोच साफ थी. उसे पता था कि अंडर-19 विश्व कप जीतना एक उपलब्धि है, लेकिन सीनियर टीम में अपनी जगह बनाना अलग चुनौती है.
आज उनके करियर को पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस दिन का जवाब उनके पूरे क्रिकेट सफर की झलक था. खुद को साबित करने की जिद, हर बार बेहतर करने की चाह और मैदान पर अपना सब कुछ झोंक देने का जुनून.
युवराज सिंह के टैटू पर भी हुई थी बात
उन दिनों युवराज सिंह भारतीय टीम के बड़े सितारे थे. उनके छक्के, उनकी बल्लेबाजी और उनके टैटू तक खूब चर्चा में रहते थे. मैंने विराट से पूछ लिया कि क्या वह भी युवराज की तरह टैटू बनवाने के बारे में सोचते हैं?
विराट यह सवाल सुनकर हंस पड़े. उन्होंने कहा था, 'नहीं भइया, मैं अपने खेल पर फोकस करूंगा.'
यह जवाब भी मेरे जेहन में आज तक दर्ज है. उस उम्र में भी उनकी प्राथमिकता बिल्कुल साफ थी. उन्हें क्रिकेट पर ध्यान देना था. अपनी पहचान बनानी थी. बाकी चीजों की उन्हें कोई जल्दी नहीं थी.
बातचीत के दौरान विराट ने अंडर-19 विश्व कप जीतने वाली अपनी टीम के दूसरे खिलाड़ियों का भी जिक्र किया. सौरभ तिवारी जैसे साथियों की बातें हुईं. करीब आधे घंटे बाद बातचीत खत्म हुई. मैंने अपनी नोटबुक संभाली और फैक्ट्री से वापस लौट आया.
तब कहां पता था कि जिस युवा खिलाड़ी से बातचीत करके लौट रहा हूं, उसका नाम आने वाले वर्षों में भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी पहचान बन जाएगा.
दांबुला से शुरू हुआ सफर, दुनिया ने देखा विराट का जलवा
18 अगस्त 2008 को विराट कोहली ने श्रीलंका के खिलाफ दांबुला में अपना वनडे डेब्यू किया. पहली पारी में वह 12 रन बनाकर आउट हो गए. शुरुआत भले ही साधारण रही, लेकिन आगे का सफर असाधारण साबित हुआ.
धीरे-धीरे विराट भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों में शामिल हो गए. रनचेज में उनकी महारत की मिसालें दी जाने लगीं. बड़े मुकाबलों में उनका बल्ला बोलने लगा. वनडे, टेस्ट और टी20 क्रिकेट में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. कप्तानी की जिम्मेदारी संभाली और भारतीय क्रिकेट को नई आक्रामकता दी.
रिकॉर्ड टूटते गए, शतकों की गिनती बढ़ती गई और उनके प्रशंसकों की संख्या दुनिया भर में फैलती चली गई. जिस खिलाड़ी ने मेरठ की एक बल्ला फैक्ट्री में बैठकर कहा था कि उसे खुद को साबित करना है, उसने एक दिन अपनी बल्लेबाजी से पूरी दुनिया के सामने अपनी काबिलियत साबित कर दी.
वह आधा घंटा आज भी यादों में जिंदा है
18 साल का वक्त गुजर चुका है. क्रिकेट बदल गया, दुनिया बदल गई और विराट कोहली की पहचान भी पूरी तरह बदल गई. आज वह 38 साल के हैं. उनके नाम के साथ 'किंग' जुड़ चुका है. मैदान पर उनका हर कदम खबर बनता है. उनकी हर पारी का इंतजार होता है.
लेकिन मेरी स्मृतियों में विराट की एक दूसरी तस्वीर भी हमेशा रहेगी. मेरठ की उस बल्ला फैक्ट्री का हॉलनुमा कमरा. सामने रखी कुर्सी पर बैठा एक युवा क्रिकेटर. चेहरे पर मुस्कान. मेरे सवाल और उनके सहज जवाब.
कभी-कभी सोचता हूं कि उस दिन मुझे कहां पता था कि सामने बैठा यह लड़का एक दिन क्रिकेट का 'किंग' बन जाएगा. अगर अंदाजा होता तो शायद कुछ और सवाल पूछता, कुछ और तस्वीरें लेता और उस मुलाकात को और ज्यादा सहेजकर रखता.
लेकिन पत्रकारिता की खूबसूरती भी यही है. खबर की तलाश में निकले पत्रकार को कई बार ऐसे पल मिल जाते हैं, जिनकी असली कीमत वक्त गुजरने के बाद समझ आती है. उस दिन मैं एक युवा खिलाड़ी का इंटरव्यू लेने गया था. आज उसी मुलाकात को याद करते हुए लगता है कि यह मेरे पत्रकारिता जीवन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है.
जन्मदिन मुबारक हो विराट! 18 साल पहले आपने कहा था, 'मुझे खुद को साबित करना होगा.' आपने सिर्फ खुद को साबित नहीं किया, बल्कि क्रिकेट की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना ली. आज दुनिया आपको 'किंग कोहली' कहती है. लेकिन मेरी यादों में आप हमेशा वही युवा विराट रहेंगे, जो मेरठ की उस फैक्ट्री में मुस्कुराते हुए कह रहा था, 'मैं अपने खेल पर फोकस करूंगा.' वक्त ने आपकी उस बात को सच कर दिखाया.