क्रिकेट में किसी टीम की असली ताकत सिर्फ उसके 11 खिलाड़ियों से नहीं पता चलती. असली ताकत तब सामने आती है, जब एक साथ कई बड़े नाम उपलब्ध न हों और फिर भी टीम का स्तर नीचे न गिरे. भारतीय क्रिकेट के सामने अगले कुछ हफ्तों में ऐसा ही मौका आने वाला है. जापान में एशियन गेम्स होंगे और उसी दौरान भारत में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे सीरीज खेली जाएगी. सवाल यह नहीं है कि किस खिलाड़ी की जगह कौन लेगा. बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अब इतनी गहराई हासिल कर चुका है कि एक साथ दो मजबूत अंतरराष्ट्रीय टीमें उतार सके?
यह स्थिति भारतीय क्रिकेट के लिए परेशानी कम और परीक्षा ज्यादा है.
एशियन गेम्स के लिए चुनी गई टी20 टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जो हाल तक भारत की वनडे योजनाओं का भी हिस्सा रहे हैं. यानी जब वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे सीरीज शुरू होगी, तो कुछ स्थापित नाम उपलब्ध नहीं होंगे. यही वह स्थिति है, जहां भारतीय क्रिकेट की बेंच स्ट्रेंथ की असली तस्वीर सामने आ सकती है.
मसलन, विकेटकीपिंग में ईशान किशन एशियन गेम्स के लिए उपलब्ध होंगे. इसका मतलब यह नहीं कि वनडे टीम में उनकी जगह भरने के लिए सिर्फ ऋषभ पंत का नाम देखा जाए. असली सवाल यह होना चाहिए कि केएल राहुल के बाद भारत के पास ऐसा कौन सा विकेटकीपर है, जिस पर 2027 वर्ल्ड कप के दौरान जरूरत पड़ने पर भरोसा किया जा सकता है?
पंत का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है. वह बड़े मैचों के खिलाड़ी हैं और वनडे क्रिकेट में उनका रिकॉर्ड भी उनके पक्ष में है. लेकिन अगर उन्हें मौका मिलता है तो इसे सिर्फ एक स्टार की वापसी के तौर पर नहीं देखना चाहिए. यह भारत के लिए यह जांचने का मौका होना चाहिए कि पंत की भूमिका अगले वर्ल्ड कप चक्र में क्या हो सकती है. ध्रुव जुरेल भी इसी तस्वीर का हिस्सा हैं. यानी एक खिलाड़ी को मौका देने से ज्यादा जरूरी है एक पूरी बैकअप योजना तैयार करना.
बल्लेबाजी में भी यही बात लागू होती है
श्रेयस अय्यर एशियन गेम्स में कप्तानी कर रहे होंगे. ऐसे में वनडे सीरीज में ऋतुराज गायकवाड़ और यशस्वी जायसवाल जैसे बल्लेबाजों को मौका मिल सकता है. दोनों के मामले में सवाल सिर्फ फॉर्म का नहीं है. सवाल यह है कि क्या भारत के पास ऐसे बल्लेबाज तैयार हैं, जो जरूरत पड़ने पर पहली पसंद के खिलाड़ियों की जगह बिना टीम की गुणवत्ता गिराए उतर सकें?
यशस्वी का मामला तो और दिलचस्प है. पिछले तीन वनडे में उनके नाम दो शतक हैं. ऐसे प्रदर्शन के बाद भी अगर उन्हें नियमित वनडे योजना में जगह नहीं मिलती, तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी की निराशा नहीं होगी. यह इस बात पर सवाल होगा कि भारतीय चयनकर्ता भविष्य के लिए अपनी प्राथमिकताएं कैसे तय कर रहे हैं.
गेंदबाजी में चुनौती और बड़ी है. जसप्रीत बुमराह और अर्शदीप सिंह एशियन गेम्स के लिए उपलब्ध होंगे तो वनडे सीरीज में दूसरे तेज गेंदबाजों को जिम्मेदारी मिल सकती है. मोहम्मद सिराज, मयंक यादव और दूसरे विकल्पों के पास खुद को साबित करने का मौका होगा.
यहीं भारत की असली गहराई का पता चलेगा
क्योंकि बड़ी टीमों की पहचान यह नहीं होती कि उनके पास बुमराह जैसा गेंदबाज है. पहचान यह होती है कि बुमराह के उपलब्ध नहीं होने पर अगला गेंदबाज कितना भरोसा पैदा करता है. वर्ल्ड कप जैसे टूर्नामेंट में चोट, वर्कलोड और फॉर्म किसी भी समय समीकरण बदल सकते हैं. इसलिए दूसरी कतार तैयार रखना कोई विलासिता नहीं, जरूरत है.
ऑलराउंडरों में भी यही परीक्षा होगी. अक्षर पटेल एशियन गेम्स में होंगे तो रवींद्र जडेजा के लिए वनडे में वापसी का रास्ता खुल सकता है. लेकिन इसे सिर्फ अनुभवी खिलाड़ी की वापसी बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा. चयनकर्ताओं को यह भी देखना होगा कि अगले बड़े टूर्नामेंट के लिए टीम को किस तरह के ऑलराउंडर की जरूरत है.
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि वनडे सीरीज में रोहित शर्मा, विराट कोहली और शुभमन गिल जैसे बड़े नाम भी मौजूद होंगे. यानी एक तरफ भारत की पहली पसंद के कई सितारे होंगे और दूसरी तरफ उन खिलाड़ियों की परीक्षा होगी, जिन्हें जरूरत पड़ने पर उनकी जगह संभालनी है.
यही कारण है कि इस वनडे सीरीज को सिर्फ वेस्टइंडीज के खिलाफ तीन मैचों की सीरीज मानना गलत होगा. यह भारत की दूसरी टीम की ऑडिशन सीरीज भी हो सकती है.
भारत लंबे समय से अपनी बेंच स्ट्रेंथ की चर्चा करता रहा है. आईपीएल, घरेलू क्रिकेट और इंडिया-ए के जरिए लगातार नए खिलाड़ियों का बड़ा पूल तैयार होने की बात होती है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में असली परीक्षा अलग होती है. वहां सिर्फ प्रतिभा काफी नहीं होती. दबाव में प्रदर्शन, भूमिका की समझ और बड़े खिलाड़ियों की अनुपस्थिति में जिम्मेदारी उठाने की क्षमता भी चाहिए.
एशियन गेम्स और वेस्टइंडीज वनडे सीरीज का टकराव भारत को यही परीक्षा दे रहा है. और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सकारात्मक पहलू है.
अगर भारत इस मौके का इस्तेमाल सिर्फ खाली जगह भरने के लिए करता है, तो फायदा सीमित रहेगा. लेकिन अगर हर नए खिलाड़ी को स्पष्ट भूमिका देकर आजमाया गया, तो कुछ मैचों में ही 2027 वर्ल्ड कप के लिए तस्वीर काफी साफ हो सकती है.
कौन से 11 खिलाड़ी मैदान पर उतरेंगे, यह तो बाद की बात है. असली ताकत तब दिखेगी, जब इन 11 के अलावा भी ऐसे खिलाड़ी तैयार हों, जो मौका मिलते ही जिम्मेदारी संभाल सकें. एशियन गेम्स ने भारत को यही मौका दे दिया है.
अब गेंद खिलाड़ियों के साथ-साथ चयनकर्ताओं के पाले में है- क्या वे इसे मजबूरी मानेंगे या दो मजबूत भारतीय टीमें तैयार करने का मौका?