भारतीय क्रिकेट का इतिहास सिर्फ महान खिलाड़ियों ने नहीं लिखा, बल्कि उन चयनकर्ताओं ने भी लिखा, जिन्होंने सही समय पर सही प्रतिभा पर दांव लगाया. अगर 1989 में 16 साल के सचिन तेंदुलकर को मौका देने का साहस नहीं दिखाया जाता, तो शायद क्रिकेट इतिहास की सबसे महान कहानियों में से एक कभी लिखी ही नहीं जाती.
आज, करीब चार दशक बाद, भारतीय क्रिकेट फिर एक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार नाम वैभव सूर्यवंशी का है. सवाल यह नहीं है कि वैभव अगले सचिन बनेंगे या नहीं. सवाल यह है कि क्या भारतीय क्रिकेट अपने चुने हुए भविष्य को सही समय पर मौका देने का साहस दिखाएगा?
जब चयन समिति भी बंटी हुई थी...
1989 में पाकिस्तान दौरे के लिए भारतीय टीम चुनी जा रही थी. सामने दुनिया के सबसे कठिन दौरों में से एक था. कप्तान इमरान खान, वसीम अकरम की रफ्तार, उभरते हुए वकार यूनिस की तेजी और अब्दुल कादिर की फिरकी. ऐसे दौरे पर 16 साल के एक किशोर को भेजना किसी भी चयन समिति के लिए आसान फैसला नहीं था.
बाद में उस चयन समिति के सदस्य रहे अकाश लाल ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि सचिन तेंदुलकर का चयन सर्वसम्मति से नहीं हुआ था. पांच सदस्यीय चयन समिति में लंबी बहस चली और आखिरकार 3-2 के बहुमत से सचिन के पक्ष में फैसला हुआ.
कुछ चयनकर्ताओं का मानना था कि इतनी कम उम्र के बल्लेबाज को पाकिस्तान जैसे दौरे पर भेजना जल्दबाजी होगी. दूसरी राय यह थी कि अगर खिलाड़ी में असाधारण प्रतिभा है, तो उसे इंतजार नहीं, अवसर मिलना चाहिए. अकाश लाल के मुताबिक, सचिन के पक्ष में सबसे मजबूत दलील यही थी कि जितनी जल्दी वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखेंगे, उतने लंबे समय तक भारत की सेवा कर सकेंगे.
सिर्फ प्रतिभा नहीं, प्रदर्शन भी था
सचिन का चयन किसी भावनात्मक फैसले का नतीजा नहीं था. उसके पीछे लगातार प्रदर्शन था.
1987-88 रणजी सीजन में उन्हें मुंबई की टीम में चुना गया, लेकिन अंतिम एकादश में जगह नहीं मिली. वह सब्स्टिट्यूट फील्डर बने रहे. अगले ही सीजन, 11 दिसंबर 1988 को रणजी ट्रॉफी में पदार्पण किया और पहले ही मैच में गुजरात के खिलाफ नाबाद शतक जड़ दिया. पूरे 1988-89 रणजी सीजन में उन्होंने 583 रन बनाए.
इसके बाद चयनकर्ताओं ने इंतजार नहीं बढ़ाया. लगभग एक साल बाद 15 नवंबर 1989 को 16 साल 205 दिन के सचिन ने कराची में पाकिस्तान के खिलाफ भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया. दरअसल, चयन समिति के अध्यक्ष राज सिंह डूंगरपुर और कप्तान कृष्णमाचारी श्रीकांत समेत टीम प्रबंधन ने बेबी सचिन की प्रतिभा पर भरोसा दिखाया था. ईरानी कप में भी शतक लगाकर सचिन ने चयनकर्ताओं को यकीन दिला दिया था कि वह सिर्फ प्रतिभाशाली नहीं, बल्कि बड़े स्तर के लिए तैयार भी हैं.
उस समय किसी को नहीं पता था कि यही किशोर आगे चलकर 100 अंतरराष्ट्रीय शतक बनाएगा, 24 साल तक भारतीय क्रिकेट का चेहरा रहेगा और 'क्रिकेट के भगवान' कहलाएगा. लेकिन इतना जरूर तय है कि अगर उस दिन चयनकर्ता सिर्फ सुरक्षित विकल्प चुनते, तो भारतीय क्रिकेट का इतिहास शायद कुछ और होता.
वैभव का मामला अलग है... लेकिन सवाल वही है
यह कहना गलत होगा कि वैभव सूर्यवंशी और सचिन तेंदुलकर की परिस्थितियां एक जैसी हैं. सचिन घरेलू प्रथम श्रेणी क्रिकेट में लगातार प्रदर्शन करके राष्ट्रीय टीम तक पहुंचे थे. वैभव ने जूनियर क्रिकेट और आईपीएल में अपने खेल से चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा है. इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा.
लेकिन दोनों कहानियों को जोड़ने वाला एक सवाल जरूर है. जब भारतीय क्रिकेट किसी खिलाड़ी को अपना भविष्य मान लेता है, तो उस भविष्य के लिए उसकी योजना क्या होती है?
अगर टीम मैनेजमेंट मानता है कि वैभव को अभी और समय चाहिए, तो यह पूरी तरह स्वीकार्य है. हर युवा खिलाड़ी की अपनी तैयारी का समय होता है. लेकिन अगर उन्हें राष्ट्रीय टीम तक लाया गया है, तो यह भी साफ होना चाहिए कि उन्हें अवसर देने की रूपरेखा क्या है. क्या वह सिर्फ ड्रेसिंग रूम का अनुभव लेने आए हैं या सही समय पर उन्हें अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका भी मिलेगा?
इतिहास मौके से शुरू होता है
किसी भी युवा खिलाड़ी को मौका देना इस बात की गारंटी नहीं होता कि वह महान ही बनेगा. सचिन भी अपने पहले टेस्ट में शतक नहीं बना पाए थे. महान खिलाड़ियों की पहचान पहले मैच से नहीं, बल्कि लगातार मिले अवसरों और उन पर दिए गए जवाब से बनती है.यही किसी भी बड़ी कहानी की शुरुआत होती है.
चयन प्रतिभा की पहचान है, लेकिन मौका उस पहचान पर लगाया गया सबसे बड़ा दांव. भारतीय क्रिकेट का इतिहास गवाह है कि उसकी सबसे बड़ी सफलताएं वहीं से निकली हैं, जहां चयनकर्ताओं ने सिर्फ प्रतिभा नहीं देखी, बल्कि सही समय पर उसे अवसर भी दिया.
आज वैभव सूर्यवंशी अगले सचिन बनेंगे या नहीं, इसका जवाब किसी के पास नहीं है. लेकिन इतिहास इतना जरूर सिखाता है कि महान खिलाड़ी पहले मौका पाते हैं, इतिहास बाद में बनाते हैं.अब देखना सिर्फ यह है कि वैभव की बारी कब आती है.