11 सितंबर भारतीय क्रिकेट के इतिहास की एक खास तारीख है. 115 वर्ष पहले यानी 1911 में इसी दिन टीम इंडिया के पहले शतकवीर लाला अमरनाथ का जन्म हुआ था. अमरनाथ आगे चलकर सिर्फ मैदान पर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट की व्यवस्था और संस्कृति पर गहरी छाप छोड़ने वाली शख्सियत बने. वह बल्लेबाज, गेंदबाज, कप्तान, चयनकर्ता, कोच और कमेंटेटर के रूप में लंबे समय तक भारतीय क्रिकेट से जुड़े रहे.
लाहौर में एक साधारण परिवार में जन्मे लाला अमरनाथ ने 1933-34 में सदर्न पंजाब की ओर से एमसीसी के खिलाफ 109 रनों की पारी खेलकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. इसके कुछ ही समय बाद उन्हें इंग्लैंड के खिलाफ भारत के पहले घरेलू टेस्ट में खेलने का मौका मिला. बॉम्बे के जिमखाना मैदान पर खेले गए उस मुकाबले में भारत मुश्किल स्थिति में था, लेकिन अमरनाथ ने इंग्लैंड के गेंदबाजों पर पलटवार किया. उन्होंने 117 मिनट में शतक पूरा किया और भारत के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट में सेंचुरी लगाने वाले पहले बल्लेबाज बन गए. उनकी आक्रामक बल्लेबाजी ने उन्हें तुरंत लोकप्रिय बना दिया, भले ही भारत वह मुकाबला हार गया.
...जब टीम के कप्तान से हुआ विवाद
1936 में इंग्लैंड दौरे पर लाला अमरनाथ भारतीय टीम के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में शामिल थे. हालांकि, एक मैच में बल्लेबाजी क्रम को लेकर टीम के कप्तान महाराजकुमार ऑफ विजयनगरम यानी 'विज्जी' से उनका विवाद हो गया. अमरनाथ को इसके बाद दौरे के बीच से ही भारत वापस भेज दिया गया. इस घटना का उनके टेस्ट करियर पर गहरा असर पड़ा. उन्हें करीब 12 साल तक टेस्ट क्रिकेट से दूर रहना पड़ा. इसके बावजूद घरेलू क्रिकेट में उनका प्रदर्शन जारी रहा और 1938-39 में उन्होंने हिंदूज की ओर से द रेस्ट के खिलाफ 241 रनों की शानदार पारी खेली.
लाला अमरनाथ की वापसी सिर्फ बल्लेबाजी तक सीमित नहीं रही. 1946 के इंग्लैंड दौरे पर उन्होंने लॉर्ड्स में खेले गए टेस्ट में गेंद से तहलका मचा दिया. उन्होंने इंग्लैंड की पहली पारी में लेन हटन, सिरिल वॉशब्रुक, डेनिस कॉम्पटन और वॉली हैमंड जैसे बल्लेबाजों को आउट किया. अमरनाथ की गेंदबाजी में खासियत यह थी कि वो सटीक लाइन-लेंथ से गेंद को अंदर लाने की क्षमता रखते थे. यही वजह थी कि वह भारतीय टीम के लिए बल्ले के साथ-साथ गेंद से भी उपयोगी भूमिका निभाते थे.

1947 में लाला अमरनाथ को भारतीय टीम के पहले ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए कप्तान बनाया गया. विजय मर्चेंट के हटने के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी मिली. उस दौरे पर डॉन ब्रैडमैन की अगुवाई वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम बेहद मजबूत थी और भारत को पांचों टेस्ट मैचों में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. खुद अमरनाथ का टेस्ट प्रदर्शन वहां उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, लेकिन राज्य स्तरीय टीमों के खिलाफ उन्होंने शानदार बल्लेबाजी की. विक्टोरिया के खिलाफ उनकी 228 रनों की पारी को ऑस्ट्रेलियाई महान बल्लेबाज नील हार्वे ने बेहद खास बताया था.
पाकिस्तान के खिलाफ रचा इतिहास
1952-53 में लाला अमरनाथ को एक बार फिर भारत की कप्तानी मिली और इस बार सामने पाकिस्तान था. यह दोनों देशों के बीच पहली आधिकारिक टेस्ट सीरीज थी. भारत ने सीरीज जीतकर इतिहास रचा. हालांकि, इसके बाद भी भारतीय क्रिकेट की राजनीति से अमरनाथ का रिश्ता आसान नहीं रहा. बोर्ड के तत्कालीन प्रभावशाली अधिकारियों के साथ मतभेद के कारण उन्हें कप्तानी और टीम से जुड़े फैसलों में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
लाला अमरनाथ ने भारतीय टीम के लिए 24 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 24.38 के एवरेज से 878 रन बनाए. टेस्ट क्रिकेट में अमरनाथ ने 1 शतक और 4 अर्धशतक जड़े. गेंदबाजी की बात करें तो उन्होंने 32.91 की औसत से 45 विकेट अपने नाम किए. अमरनाथ ने कुल मिलाकर 186 फर्स्ट क्लास मैच खेलकर 10426 रन बनाए और 463 विकेट झटके.
मोहिंदर-सुरिंदर भी भारत के लिए खेले
लाला अमरनाथ का खेल करियर खत्म हुआ, लेकिन भारतीय क्रिकेट में उनकी भूमिका नहीं. वह सेलेक्टर बने और 1959-60 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कानपुर टेस्ट मैच में ऑफ स्पिनर जसु पटेल को मौका देने के फैसले से उनका नाम खास तौर पर जुड़ा. पटेल ने उस मैच में शानदार गेंदबाजी करते हुए भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई. उनकी क्रिकेटिंग फैमिली भी आगे बढ़ी. उनके बेटे सुरिंदर अमरनाथ और मोहिंदर अमरनाथ ने भारत का प्रतिनिधित्व किया. सुरिंदर ने भी अपने टेस्ट डेब्यू पर शतक लगाया, जबकि मोहिंदर ने 69 टेस्ट और 85 ओडीआई मैच खेले.
लाला अमरनाथ का व्यक्तित्व बेबाक था. वह अपनी बात खुलकर रखने के लिए जाने जाते थे. उनके समकालीन खिलाड़ी मुश्ताक अली ने उनके व्यक्तित्व को बेहद जीवंत अंदाज में बताया था. भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान को देखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें एक 'आइकन' कहा था.