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12 साल, अनगिनत इंतजार... क्या 'ऑलराउंडर' के मोह में कुलदीप यादव को भूल गई है टीम इंडिया?

12 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर और शानदार रिकॉर्ड के बावजूद कुलदीप यादव आज भी टीम इंडिया में अपनी जगह पक्की नहीं कर पाए हैं. लॉर्ड्स वनडे में भी स्पिन के अनुकूल हालात के बावजूद उन्हें मौका नहीं मिला. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कुलदीप पर भरोसा कब किया जाएगा और क्या टीम इंडिया की चयन नीति विशेषज्ञ गेंदबाजों के साथ न्याय कर रही है?

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स्पेशलिस्ट की अनदेखी! (Photo, PTI)
स्पेशलिस्ट की अनदेखी! (Photo, PTI)

कुछ खिलाड़ियों का करियर रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि इंतजार से पहचाना जाता है. कुलदीप यादव शायद उन्हीं खिलाड़ियों में हैं. 2014 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखने वाले कुलदीप अब 32 साल के करीब हैं. इन 12 वर्षों में उन्होंने जितने मैच खेले हैं, उससे कहीं ज्यादा समय अपनी बारी का इंतजार करते हुए बिताया है. यही वजह है कि उनके नाम सिर्फ 50 फर्स्ट क्लास और 136 लिस्ट-ए मैच दर्ज हैं. किसी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के लिए यह आंकड़ा चौंकाने वाला है.

लॉर्ड्स वनडे ने इस बहस को फिर हवा दे दी. भारत चार टेलएंडर्स के साथ उतरा. पिच को स्पिन के लिए मददगार माना जा रहा था. ऐसे में लगभग तय माना जा रहा था कि कुलदीप यादव को मौका मिलेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कुलदीप क्यों नहीं खेले. बड़ा सवाल यह है कि अगर ऐसी परिस्थिति में भी वह प्लेइंग इलेवन में जगह नहीं बना सकते, तो आखिर उन्हें मौका कब मिलेगा?

आंकड़े नहीं, सोच सवालों के घेरे में है

कुलदीप के प्रदर्शन पर उंगली उठाना आसान नहीं है. वनडे क्रिकेट में डेब्यू के बाद से उन्होंने दुनिया के किसी भी स्पिनर से ज्यादा विकेट लिए हैं. इस दौरान उनका औसत और इकॉनमी दोनों ऑस्ट्रेलिया के एडम जाम्पा और इंग्लैंड के आदिल राशिद जैसे दिग्गजों से बेहतर रहे हैं. टेस्ट क्रिकेट में भी उनका गेंदबाजी औसत 22 के आसपास है.

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यानी रिकॉर्ड यह नहीं कहते कि कुलदीप टीम से बाहर रहने लायक गेंदबाज हैं. फिर सवाल उठता है कि आखिर दिक्कत कहां है?

पहले मजबूरी थी, अब तर्क कमजोर पड़ता है

एक दौर था, जब कुलदीप के सामने रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा जैसे दो विश्वस्तरीय ऑलराउंडर थे. दोनों बल्लेबाजी भी करते थे और गेंदबाजी भी. ऐसे में टीम संयोजन के कारण कुलदीप का बाहर रहना समझ में आता था. लेकिन आज स्थिति अलग है.

अब कुलदीप अक्सर उन खिलाड़ियों से पीछे रह जाते हैं, जो न बल्लेबाजी में अपनी जगह पक्की कर पाए हैं और न गेंदबाजी में. यही वह जगह है, जहां भारतीय टीम की चयन नीति सवालों के घेरे में आती है.

पिछले कुछ समय से भारतीय टीम ऐसे खिलाड़ियों को तरजीह देती दिख रही है, जो थोड़ा बल्लेबाजी और थोड़ा गेंदबाजी कर लेते हैं. टी20 क्रिकेट में यह रणनीति कई बार काम कर जाती है, क्योंकि वहां चार ओवर और 20 ओवर की बल्लेबाजी होती है.

लेकिन वनडे और टेस्ट क्रिकेट अलग खेल हैं. यहां 50 या 90 ओवर निकालने होते हैं. ऐसे में आधे-अधूरे ऑलराउंडर की तुलना में एक विशेषज्ञ गेंदबाज ज्यादा असर छोड़ सकता है.

2023 विश्व कप इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. हार्दिक पंड्या के चोटिल होने के बाद भारत ने बल्लेबाजी की अतिरिक्त गहराई छोड़कर मोहम्मद शमी जैसे विशेषज्ञ गेंदबाज को मौका दिया. नतीजा सबके सामने था. शमी टूर्नामेंट के सबसे बड़े मैच विनर बनकर उभरे. यानी जब दबाव बढ़ा, तब भारत ने विशेषज्ञ खिलाड़ी पर भरोसा किया था.

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लॉर्ड्स का फैसला इसलिए चौंकाता है. लॉर्ड्स में हालात कुलदीप के पक्ष में थे. सूखी पिच थी. स्पिन की उम्मीद थी. भारत पहले ही चार टेलएंडर्स के साथ उतर चुका था. कुलदीप टीम के सबसे अनुभवी गेंदबाजों में थे.

इसके बावजूद टीम मैनेजमेंट ने नए तेज गेंदबाजों को चुना और कुलदीप को बाहर रखा. यहीं से यह सवाल और गहरा हो जाता है कि आखिर टीम मैनेजमेंट कुलदीप से चाहता क्या है?

चयनकर्ता और टीम मैनेजमेंट की सोच अलग?

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चयनकर्ता लगातार कुलदीप को टीम में चुन रहे हैं. यानी उनके मुताबिक कुलदीप देश के सर्वश्रेष्ठ स्पिनरों में हैं. लेकिन प्लेइंग इलेवन बनते समय टीम मैनेजमेंट उन पर भरोसा नहीं दिखा रहा.

अगर ऐसा बार-बार हो रहा है, तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी की समस्या नहीं, बल्कि चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट की सोच में अंतर का संकेत भी है.

संभव है कि टीम मैनेजमेंट को लगता हो कि कुलदीप 2023 विश्व कप वाले गेंदबाज नहीं रहे. अगर ऐसा है तो उनकी तकनीकी कमियों को दूर करना कोचिंग स्टाफ की जिम्मेदारी है. और अगर उन्हें लगता है कि कुलदीप फिलहाल खेलने लायक नहीं हैं, तो उन्हें घरेलू क्रिकेट भेज देना चाहिए, ताकि वह लगातार गेंदबाजी कर सकें.

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लेकिन सबसे खराब विकल्प यह है कि उन्हें हर सीरीज में टीम के साथ रखा जाए और फिर पूरे दौरे में बेंच पर बैठाए रखा जाए.

सवाल सिर्फ कुलदीप का नहीं

यह बहस सिर्फ कुलदीप यादव तक सीमित नहीं है. सवाल भारतीय क्रिकेट की चयन सोच का है. क्या टीम इंडिया विशेषज्ञ खिलाड़ियों पर भरोसा करेगी या फिर 'बिट्स-एंड-पीसेज' ऑलराउंडरों के सहारे टीम संतुलन तलाशती रहेगी?

कुलदीप यादव ने अब तक भारत के लिए 18 टेस्ट, 121 वनडे और 54 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले हैं. तीनों प्रारूपों को मिलाकर उनके नाम 368 विकेट दर्ज हैं.

टेस्ट: 18 मैच, 79 विकेट, औसत 22.35, सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 5/40
वनडे: 121 मैच, 194 विकेट, औसत 27.04, सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 6/25
टी20I: 54 मैच, 95 विकेट, औसत 13.74, सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 5/17

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