अटलांटिक महासागर की करीब 4700 मीटर गहराई में पड़ा रेडियोएक्टिव कचरा अब वैज्ञानिकों की जांच का हिस्सा है. 2026 में फ्रांस के CNRS की टीम ने NODSSUM रिसर्च के तहत समुद्र की गहराई में जाकर इन पुराने बैरल की जांच की. टीम को कई बैरल बुरी तरह जंग लगे मिले. कुछ जगहों पर इनसे निकला सामान समुद्र की तलहटी में फैला हुआ भी दिखा.
ये बैरल कई दशक पहले यूरोपीय देशों ने समुद्र में डाले थे. NODSSUM प्रोजेक्ट के मुताबिक 1950 से 1990 के बीच नॉर्थ-ईस्ट अटलांटिक में 2 लाख से ज्यादा बैरल लो-लेवल रेडियोएक्टिव कचरा डाला गया था. यह कचरा करीब 3000 से 5000 मीटर की गहराई में डंप किया गया था. 2026 में वैज्ञानिकों ने Nautile नाम की सबमर्सिबल से 20 बार समुद्र में डाइव की और 4700 मीटर से ज्यादा गहराई तक जाकर इनकी जांच की.
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4700 मीटर नीचे जाकर क्या देखा?
वैज्ञानिकों की टीम रिसर्च शिप पोरक्वा पा से नॉटिल सबमर्सिबल के जरिए समुद्र की गहराई में गई. टीम ने कई पुराने बैरल को सीधे देखा. इसके साथ ही बैरल के आसपास के पानी, समुद्र की मिट्टी और समुद्री जीवों के सैंपल भी लिए.
ज्यादातर बैरल काफी पुराने और खराब हालत में मिले. उन पर जंग लगी हुई थी. कुछ जगहों पर बैरल के अंदर का सामान बाहर निकलकर समुद्र की तलहटी पर फैला हुआ दिखाई दिया. वैज्ञानिक अब इन सैंपल की लैब में जांच कर रहे हैं, ताकि पता चल सके कि रेडियोएक्टिव पदार्थ आसपास के इलाके में कितना फैला है.

बैरल पर चिपके मिले समुद्री जीव
इन पुराने बैरल के आसपास समुद्री जीव भी पाए गए. वैज्ञानिकों ने बैरल पर स्पंज और एनेमोन्स जैसे जीव देखे. केकड़े और दूसरे छोटे समुद्री जीव भी इनके आसपास मौजूद थे.
अब रिसर्च टीम यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन जीवों पर रेडियोएक्टिव कचरे का कोई असर पड़ रहा है या नहीं. इसके लिए पानी, मिट्टी और समुद्री जीवों के सैंपल लिए गए हैं. इनकी जांच से यह पता चलेगा कि रेडियोएक्टिव पदार्थ समुद्री जीवों तक पहुंच रहा है या नहीं.
कचरा कहां से आया था?
समुद्र में डाला गया यह रेडियोएक्टिव कचरा कई जगहों से आया था. इसमें न्यूक्लियर पावर प्लांट, न्यूक्लियर फ्यूल से जुड़े काम, अस्पताल, रिसर्च सेंटर और इंडस्ट्रियल यूनिट का कचरा शामिल था. OSPAR के मुताबिक उस समय इस तरह के लो-लेवल रेडियोएक्टिव कचरे को समुद्र में डालना इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका था.
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कुल मिलाकर 1.5 लाख टन से ज्यादा सामग्री समुद्र में डंप की गई थी. इसमें सीजियम-137, प्लूटोनियम के आइसोटोप और ट्रिटियम जैसे रेडियोन्यूक्लाइड शामिल थे. बाद में समुद्र में रेडियोएक्टिव कचरा डालने पर रोक लगा दी गई. 1992 में नॉर्थ-ईस्ट अटलांटिक में इस तरह की डंपिंग पर रोक लगी. इसके बाद 1993 में दुनिया भर में समुद्र में रेडियोएक्टिव कचरा डंप करने पर बैन लागू हुआ.
अब वैज्ञानिक क्या पता लगाएंगे?
2025 में NODSSUM की पहली रिसर्च के दौरान समुद्र की तलहटी में पड़े हजारों बैरल की लोकेशन खोजकर उनका मैप तैयार किया गया था. 2026 की रिसर्च में वैज्ञानिक इन जगहों तक पहुंचे और वहां से पानी, मिट्टी और समुद्री जीवों के सैंपल लेकर आए. अब इन सैंपल की लैब में जांच होगी.
वैज्ञानिक यह पता लगाएंगे कि इतने साल बाद इन पुराने बैरल से रेडियोएक्टिव पदार्थ समुद्र के पानी, मिट्टी और समुद्री जीवों तक पहुंचा है या नहीं. फिलहाल वैज्ञानिकों का फोकस इसी बात पर है कि इन पुराने बैरल की खराब होती हालत का समुद्र और वहां रहने वाले जीवों पर लंबे समय में क्या असर पड़ सकता है.