सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ बुधवार को 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार द्वारा दायर उस याचिका पर अपना फैसला सुना दिया है, जिसमें कोर्ट ने हरीश के लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट को वापस लेने की अनुमति दे दी है.
इच्छामृत्यु यानी वह प्रक्रिया जिसमें किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की जान को जानबूझकर खत्म किया जाता है ताकि उसे और दर्द न झेलना पड़े. यह मुद्दा दुनिया भर में बहुत विवादास्पद है क्योंकि इसमें जीवन और मौत का सवाल जुड़ा होता है. कुछ लोग इसे दया की हत्या कहते हैं तो कुछ इसे गरिमापूर्ण मौत का अधिकार मानते हैं.

आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु कितने प्रकार की होती है, इसे कैसे दिया जाता है, दुनिया में इसका इतिहास क्या है, भारत में कितनी बार यह दी गई है और किन देशों में यह कानूनी है या प्रतिबंधित. यह जानकारी केवल जागरूकता के लिए है, कोई चिकित्सकीय या कानूनी सलाह नहीं.
इच्छामृत्यु के प्रकार क्या हैं?
इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो तरीकों से बांटी जाती है – सक्रिय (Active) और निष्क्रिय (Passive).
सक्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर सीधे घातक दवा का इंजेक्शन देकर मरीज की मौत कर देता है.
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर जीवन रक्षक उपचार जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाएं रोक देता है. मरीज को अपनी बीमारी से स्वाभाविक रूप से मरने देता है.
इसके अलावा तीन और श्रेणियां हैं – स्वैच्छिक, गैर-स्वैच्छिक और अनैच्छिक. स्वैच्छिक में मरीज खुद सहमति देता है. गैर-स्वैच्छिक में मरीज बेहोश या कोमा में होता है तो परिवार या कोर्ट फैसला करता है. अनैच्छिक में मरीज की इच्छा के खिलाफ किया जाता है जो कानूनी रूप से हत्या माना जाता है.
इसके अलावा फिजिशियन असिस्टेड सुसाइड यानी डॉक्टर की मदद से आत्महत्या भी होती है जिसमें डॉक्टर घातक दवा की गोली लिख देता है. मरीज खुद ले लेता है. ये सभी प्रकार अलग-अलग देशों में अलग-अलग कानूनों के तहत चलते हैं.
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इच्छामृत्यु कैसे दी जाती है? मेडिकल प्रोसेस क्या है?
इच्छामृत्यु देने का मेडिकल प्रोसेस बहुत सावधानी से और कानूनी नियमों के तहत किया जाता है. निष्क्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर वेंटिलेटर बंद कर देता है. आर्टिफिशियल फीडिंग रोक देता है. या दवाएं बंद कर देता है. मरीज धीरे-धीरे अपनी बीमारी से मर जाता है. इसमें कोई नई दवा नहीं दी जाती.
सक्रिय इच्छामृत्यु में सबसे पहले मरीज को बेहोश करने वाली दवा जैसे पेंटोबार्बिटल दी जाती है फिर मांसपेशियां ढीली करने वाली दवा का इंजेक्शन लगाया जाता है ताकि दिल और सांस रुक जाए. पूरा प्रोसेस 5-10 मिनट में पूरा हो जाता है और मरीज को कोई दर्द नहीं होता.
फिजिशियन असिस्टेड सुसाइड में डॉक्टर घातक गोली की दवा लिखता है. मरीज घर पर खुद वह गोली खा लेता है. पहले दवा से बेहोशी आती है फिर कुछ घंटों में मौत हो जाती है. हर देश में यह प्रोसेस सख्त निगरानी में होता है – कई डॉक्टरों की टीम, मनोचिकित्सक की जांच और लिखित सहमति जरूरी होती है.

दुनिया में इच्छामृत्यु का इतिहास क्या है?
इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है. प्राचीन ग्रीस और रोम में लोग हेमलॉक नामक जहर से दर्द रहित मौत चुनते थे. सुकरात और प्लेटो जैसे दार्शनिकों ने भी कभी-कभी इसका समर्थन किया था. मध्य युग में ईसाई धर्म ने इसे पाप माना क्योंकि हत्या निषेध है. आधुनिक इतिहास 19वीं सदी में शुरू हुआ जब डॉक्टरों ने दर्द निवारक दवाओं से मौत को आसान बनाने की बात की.
1935 में ब्रिटेन में वॉलंटरी यूथेनेशिया सोसाइटी बनी. लेकिन नाजी जर्मनी में 1930-40 के दशक में विकलांगों और बूढ़ों को मारने के लिए इसका दुरुपयोग हुआ जिससे पूरी दुनिया में नकारात्मक छवि बनी. 1997 में अमेरिका के ओरेगॉन राज्य में पहली बार डॉक्टर असिस्टेड सुसाइड कानूनी हुआ.
2002 में नीदरलैंड और बेल्जियम ने सक्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी बना दिया. उसके बाद कई देशों ने इसे अपनाया. आज यह मुद्दा मेडिकल टेक्नोलॉजी के विकास और बुजुर्ग आबादी की वजह से और ज्यादा चर्चा में है.
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भारत में इच्छामृत्यु: कानूनी स्थिति और कितनी बार दी गई?
भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु पूरी तरह अवैध है और इसे हत्या माना जाता है. लेकिन निष्क्रिय इच्छामृत्यु 2011 के अरुणा शानबाग केस और 2018 के कॉमन कॉज केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी बना दिया. मरीज लिविंग विल यानी पहले से लिखित इच्छापत्र बना सकता है कि अगर वह कोमा में चला जाए तो वेंटिलेटर बंद कर दिया जाए.
हर मामले में मेडिकल बोर्ड और कोर्ट की मंजूरी जरूरी है. अब तक भारत में औपचारिक रूप से सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी से इच्छामृत्यु दी गई है या नहीं – यह संख्या शून्य या बेहद कम है. पहले कई याचिकाएं आईं लेकिन ज्यादातर खारिज हो गईं या प्रक्रिया पूरी नहीं हुई.
असल में अस्पतालों में निजी तौर पर कई बार जीवन रक्षक उपचार रोक दिया जाता है लेकिन कानूनी रिकॉर्ड में यह गिना नहीं जाता. भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु की मांग अब भी जारी है लेकिन कानून नहीं बदला है.
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किन देशों में इच्छामृत्यु कानूनी है और कहां प्रतिबंधित?
2026 तक सक्रिय इच्छामृत्यु कानूनी देशों में नीदरलैंड, बेल्जियम, लग्जमबर्ग, स्पेन, कनाडा, कोलंबिया, इक्वाडोर, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के सभी राज्य शामिल हैं. पुर्तगाल और उरुग्वे में कानून पास हुआ है लेकिन अभी पूरी तरह लागू नहीं. इन देशों में सख्त शर्तें हैं – मरीज को असहनीय दर्द हो, बीमारी लाइलाज हो और कई डॉक्टरों की मंजूरी हो.
फिजिशियन असिस्टेड सुसाइड स्विट्जरलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और अमेरिका के कई राज्यों (जैसे ओरेगॉन, कैलिफोर्निया) में कानूनी है. ज्यादातर देशों में इच्छामृत्यु प्रतिबंधित है. भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, चीन और ज्यादातर मुस्लिम देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है. यहां केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु कुछ मामलों में मानी जाती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मुद्दा अभी भी बहस का विषय है क्योंकि एक तरफ दर्द से मुक्ति तो दूसरी तरफ दुरुपयोग का खतरा.
यह पूरी जानकारी बताती है कि इच्छामृत्यु मानवीय गरिमा और दर्द से राहत का सवाल है लेकिन इसमें बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है. भारत जैसे देशों में जहां परिवार बड़ा होता है और चिकित्सा सुविधाएं कम, यह और भी जटिल है.