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इच्छामृत्यु

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इच्छामृत्यु (Euthanasia) का मतलब है किसी ऐसे व्यक्ति की जान जानबूझकर समाप्त करना, जो लंबे समय से गंभीर या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और बहुत ज्यादा दर्द या तकलीफ झेल रहा हो. इसका उद्देश्य अक्सर मरीज को असहनीय पीड़ा से राहत देना होता है. इच्छामृत्यु का मुद्दा काफी जटिल माना जाता है, क्योंकि इसमें चिकित्सा की जिम्मेदारी, नैतिकता और कानून तीनों जुड़े होते हैं.

भारत में इच्छामृत्यु के मुख्य रूप से दो प्रकार माने जाते हैं. पहला है सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia). इसमें किसी व्यक्ति की जान लेने के लिए जानबूझकर कोई कदम उठाया जाता है, जैसे घातक इंजेक्शन देना. भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी पूरी तरह गैरकानूनी है.

दूसरा प्रकार है निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia). इसमें मरीज को दी जा रही जीवन रक्षक मशीनें या इलाज बंद कर दिया जाता है और मरीज को प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने दी जाती है. भारत में कुछ सख्त नियमों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है.

भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानून की स्थिति कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से तय हुई है. अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यह माना है कि गंभीर और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी होना चाहिए. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने “लिविंग विल” की व्यवस्था को भी मान्यता दी है. इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखकर यह बता सकता है कि अगर भविष्य में वह ऐसी बीमारी में फंस जाए जहां ठीक होने की उम्मीद न हो, तो उसे जीवन बढ़ाने वाले इलाज न दिए जाएं.

हालांकि, इसके लिए बहुत सख्त सावधानियां भी तय की गई हैं. हर मामले की जांच मेडिकल बोर्ड करता है और मरीज या उसके परिवार की सहमति भी जरूरी होती है. इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज की इच्छा का सम्मान हो और किसी तरह का गलत इस्तेमाल न हो.

इच्छामृत्यु को लेकर समाज में आज भी बहस जारी है. कुछ लोग इसे मरीज के लिए दया और सम्मान का कदम मानते हैं, जबकि कुछ लोगों को डर है कि इसका दुरुपयोग हो सकता है या कमजोर मरीजों पर दबाव डाला जा सकता है.

भारत में कानून अभी केवल कड़ी शर्तों के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देता है, ताकि चिकित्सा नैतिकता और मानव अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे.

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