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ओले बन जाएंगे तबाही के गोले, मौसम पर हुई स्टडी में वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

ओले बड़े होते जा रहे हैं. अंगूर के आकार से लेकर बेसबॉल जितने. क्लाइमेट चेंज के कारण इनका आकार बढ़ रहा है. भारत में राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में भी ज्यादा खतरा है.

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ओलों के बीच रखा ये स्केल उनका आकार बता रहा है. (Photo: Reuters)
ओलों के बीच रखा ये स्केल उनका आकार बता रहा है. (Photo: Reuters)

इस साल अप्रैल के अंत में अमेरिका के मिसौरी राज्य के स्प्रिंगफील्ड शहर में भीषण ओला-वृष्टि हुई. ओले बेसबॉल के आकार के थे. कुछ तो अंगूर से भी बड़े थे. इन ओलों ने कारों को तोड़ दिया. घरों की छतें और खिड़कियां क्षतिग्रस्त कर दीं तथा कई लोगों और जानवरों को चोटें पहुंचाईं. ऐसी घटनाएं अब पहले से ज्यादा हो रही हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में बड़े और ज्यादा खतरनाक ओले गिरने की संभावना बढ़ रही है. ओले तब बनते हैं जब तेज तूफानी हवाएं नमी को ऊपर की तरफ ले जाती हैं, जहां तापमान बहुत कम होता है. वहां पानी की बूंदें छोटे-छोटे कणों के चारों ओर जम जाती हैं. 

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धीरे-धीरे बड़े होकर ओले का रूप ले लेती हैं. जब ये ओले भारी हो जाते हैं तो हवाएं उन्हें नीचे गिरा देती हैं. सामान्य रूप से लोग सोचते हैं कि गर्म दुनिया में ओले आसानी से पिघल जाएंगे, लेकिन नई रिसर्च बताती है कि वास्तविकता इससे उलट हो सकती है.

नई रिपोर्ट क्या कहती है?

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27 मई को नेचर जर्नल में छपी स्टडी में पेकिंग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि गर्म होती दुनिया में बड़े ओले ज्यादा आम हो सकते हैं. शोधकर्ताओं ने एक कंप्यूटर सिमुलेशन बनाया जो बादलों के अंदर ओलों के बनने की प्रक्रिया को समझता है. इस मॉडल में तापमान, नमी और हवाओं जैसे मौसम संबंधी कारणों को शामिल किया गया.

large hailstones

वैज्ञानिकों ने 2014 से 2021 तक दुनिया भर में हुए 14,000 से ज्यादा असली ओला-वृष्टि वाले तूफानों का डेटा लिया और फिर भविष्य के जलवायु परिदृश्य में इसे लागू किया. नतीजे चौंकाने वाले थे. अगर इतने बड़े ओले गिरे तो बड़े पैमाने पर तबाही होगी. 

जलवायु परिवर्तन का दोहरा प्रभाव

गर्म होती हवा ज्यादा पानी की वाष्प (नमी) को अपने अंदर रख सकती है. इससे ओलों को बढ़ने के लिए ज्यादा सामग्री मिलती है. दूसरी तरफ, गर्म वायुमंडल में नीचे की तरफ एक मोटी परत बन जाती है जहां तापमान ओलों को पिघलाने के लिए पर्याप्त होता है. 

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता किंगहोंग झांग के अनुसार, छोटे ओले इस गर्म परत में पूरी तरह पिघल जाते हैं. बारिश की बूंदों में बदल जाते हैं. लेकिन बड़े ओले इतनी जल्दी नहीं पिघलते. वे काफी बड़े टुकड़ों के रूप में जमीन तक पहुंच जाते हैं. इस वजह से ओले की घटनाएं कम हो सकती हैं, लेकिन जो ओले गिरेंगे वे ज्यादा बड़े और ज्यादा विनाशकारी होंगे.

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उत्तर और दक्षिण में अलग-अलग खतरा

यह खतरा हर जगह एक समान नहीं है. अध्ययन बताता है कि भूमध्य रेखा से दूर वाले क्षेत्रों यानी हाई एल्टीट्यूड में बड़ा ओला गिरने का खतरा ज्यादा बढ़ जाएगा. वहीं ट्रॉपिकल और उसके नीचे के क्षेत्रों में ओले का खतरा कम भी हो सकता है.

इसके पीछे मुख्य कारण है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में तापमान ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. इससे तूफानी बादलों में ऊपर उठने वाली हवाएं और मजबूत हो जाती हैं. ये मजबूत हवाएं ओलों को और ऊपर उठाती हैं, जिससे वे ज्यादा समय तक बढ़ने का मौका पाते हैं. बड़े आकार के बन जाते हैं.

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भारत और दक्षिण एशिया पर क्या असर?

भारत सहित दक्षिण एशिया में भी इस बदलाव का असर देखा जा सकता है. उत्तर भारत, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्र जहां पहले से ही प्री-मॉनसून में आंधी-तूफान और ओले पड़ते हैं. वहां बड़े ओलों की संख्या बढ़ सकती है. किसानों के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि फसलें, बागान और पशुधन को भारी नुकसान पहुंच सकता है.

दूसरी तरफ, देश के कुछ दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में ओले की घटनाएं कम हो सकती हैं, लेकिन कुल मिलाकर मौसम की अनिश्चितता बढ़ेगी.

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फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के जलवायु वैज्ञानिक डेविड फरांडा का कहना है कि यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन और ओले के खतरे को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है. उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं ने फिजिक्स के नियमों को जलवायु मॉडल के साथ अच्छी तरह जोड़ा है.

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ओला पूरी तरह स्थानीय घटना है. वैश्विक जलवायु मॉडल इतने छोटे पैमाने पर ओलों को पूरी सटीकता से नहीं दिखा सकते. फिर भी, चीन और अमेरिका के पिछले दशकों के आंकड़ों से मिलान करने पर शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके नतीजे विश्वसनीय हैं.

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अगर तापमान लगातार बढ़ता रहा तो 21वीं सदी के अंत तक कई क्षेत्रों में बड़े ओले ज्यादा आम हो जाएंगे. इससे संपत्ति का नुकसान, बीमा दावे और कृषि क्षति बढ़ेगी. शहरों में पार्किंग वाली कारें, सोलर पैनल और इमारतों की छतें ज्यादा प्रभावित होंगी.

वैज्ञानिक झांग कहते हैं कि यह स्पष्ट चेतावनी है - अगर हम ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित नहीं करते तो बड़े ओले कई क्षेत्रों में बड़ी समस्या बन जाएंगे. 

गर्म होती दुनिया में ओले पिघलने की बजाय और बड़े होकर गिरने लगेंगे. स्प्रिंगफील्ड की घटना भविष्य की झलक हो सकती है. जलवायु परिवर्तन सिर्फ गर्मी या बारिश ही नहीं बदल रहा, बल्कि ओला-वृष्टि जैसे स्थानीय मौसम पैटर्न को भी पूरी तरह बदल रहा है.

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वैज्ञानिकों का यह अध्ययन हमें फिर याद दिलाता है कि जलवायु संकट दूर की समस्या नहीं है. यह आज हमारे आसपास घट रही घटनाओं के रूप में दिख रहा है. अगर हम अभी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं करते तो आने वाले सालों में अंगूर के आकार के ओले आम हो जाएंगे और उनका विनाशकारी प्रभाव बढ़ता जाएगा.

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