अल-नीनो की वजह से भारत के कई सूखा प्रभावित इलाकों में नया संकट गहरा गया है. यूनिसेफ के हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले करीब 41 करोड़ बच्चों पर कुपोषण, स्वास्थ्य समस्याओं और परिवारों की आजीविका छिनने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है.
यह स्थिति सिर्फ मौसम की मार नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक घटनाओं का मिला हुए प्रभाव है, जो बच्चों के विकास को लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकता है.
अल-नीनो की घटना यानी प्रशांत महासागर के इक्वेटर लाइन के आसपास समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से जुड़ी होती है. सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत (पेरू-इक्वाडोर तट) में ठंडा पानी ऊपर आता है, लेकिन अल-नीनो के दौरान ट्रेड विंड्स कमजोर हो जाती हैं या उल्टी दिशा में चलने लगती हैं. इससे गर्म पानी पश्चिम से पूर्व की ओर फैल जाता है.
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यह परिवर्तन दुनिया भर में वायुमंडलीय सर्कुलेशन को प्रभावित करता है. वॉकर सर्कुलेशन कमजोर पड़ जाता है, जिससे भारत सहित दक्षिण एशिया में मॉनसूनी बारिश घट जाती है. वैज्ञानिक रूप से यह ENSO (El Nino-Southern Oscillation) का गर्म चरण है, जो 2 से 7 साल में एक बार होता है.
भारत में अल-नीनो अक्सर कमजोर या देरी से आने वाले मॉनसून, कम बारिश और सूखे का कारण बनता है. इस बार की स्थिति में अल-नीनो की तीव्रता ने सूखे को और बढ़ा दिया है, जिससे कृषि, जल स्रोत और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो रही है.

भारत में सूखे की स्थिति और UNICEF रिपोर्ट
भारत में 41.16 करोड़ बच्चे कम से कम दो जलवायु या आपदा संबंधी खतरों के संपर्क में हैं. इनमें से 97% बच्चे सूखा और अत्यधिक गर्मी के संयुक्त खतरे का सामना कर रहे हैं. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में 15.88 करोड़ से ज्यादा बच्चे कुपोषण के ज्यादा जोखिम में हैं. कृषि और मौसम संबंधी सूखा से 41 करोड़ से अधिक बच्चे प्रभावित हैं.
सूखे की वजह से फसलें सूख रही हैं. पानी के स्रोत सूख रहे हैं. पशुपालन प्रभावित हो रहा है. इससे परिवारों की आय घट रही है. खाद्यान्न की कमी हो रही है. बच्चों का पोषण स्तर गिर रहा है. सूखा प्रभावित राज्यों में बच्चे कुपोषण, डायरिया, सांस संबंधी बीमारियों और विकास संबंधी समस्याओं का शिकार हो रहे हैं.
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कुपोषण और बच्चों पर लंबे समय का असर
कुपोषण बच्चों के लिए सबसे बड़ा खतरा है. जब परिवार में भोजन की कमी होती है, तो बच्चे पहले प्रभावित होते हैं. सीवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन से बच्चे का वजन और ऊंचाई दोनों प्रभावित होती है, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है. यूनिसेफ चेतावनी देता है कि ऐसे बच्चे स्कूल छोड़ने, बीमार पड़ने और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के शिकार ज्यादा होते हैं.
सूखे में महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. माताओं में कुपोषण बढ़ने से नवजात शिशुओं का वजन कम होता है. लंबे समय में यह पूरे समाज पर बोझ बन जाता है क्योंकि स्वस्थ बच्चे ही भविष्य का मजबूत आधार होते हैं. भारत जैसे देश में जहां आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है. सूखा परिवारों को पलायन के लिए मजबूर करता है, जिससे बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं.

आजीविका संकट और आर्थिक प्रभाव
सूखा सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं है. किसान परिवारों की आय मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर करती है. कम बारिश से रबी और खरीफ फसलों को नुकसान होता है. मजदूरी के अवसर घटते हैं. ग्रामीण अर्थव्यवस्था ठप हो जाती है. यूनिसेफ की रिपोर्ट में उल्लेख है कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में परिवार खाद्य सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे बच्चे मजदूरी या घरेलू कामों में लग जाते हैं.
यह स्थिति जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है. बढ़ते तापमान और अनियमित मौसम पैटर्न अल-नीनो को और खतरनाक बना रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल-नीनो की घटनाएं अधिक तीव्र और बार-बार हो सकती हैं.
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सरकारें सूखा राहत, जल संरक्षण, फसल बीमा और पोषण कार्यक्रम चला रही हैं, लेकिन चुनौती बहुत बड़ी है. जरूरत है बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली, जल संचयन, सूखा-प्रतिरोधी फसलों और बच्चों केंद्रित पोषण अभियानों की. एनजीओ और यूनिसेफ जैसे संगठन मैदानी स्तर पर काम कर रहे हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए जलवायु अनुकूलन नीतियां मजबूत करनी होंगी.
अल-नीनो संकट के बीच 41 करोड़ बच्चों पर मंडराता यह खतरा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है. वैज्ञानिक समझ, सामुदायिक प्रयास और तत्काल कार्रवाई से हम इस संकट को कम कर सकते हैं. स्वस्थ बच्चे ही मजबूत भारत का आधार हैं. सूखे से लड़ना, पोषण सुनिश्चित करना और जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन करना आज की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए.