दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों का मौसम आते ही हवा जहरीली हो जाती है. अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 तक प्रदूषण का स्तर 'बहुत खराब' (Very Poor) से 'गंभीर' (Severe) और 'खतरनाक' (Hazardous) तक पहुंच गया. 19 जनवरी 2026 को सुबह दिल्ली के कई इलाकों में AQI 418 से 665 तक दर्ज हुआ, जैसे आनंद विहार (489) और अशोक विहार (463).
घना कोहरा, स्मॉग और कम हवा की गति से प्रदूषण वाले तत्व नीचे जम गए हैं. लाखों लोग सांस की तकलीफ, आंखों में जलन और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. स्कूल हाइब्रिड मोड में चल रहे हैं, फ्लाइट्स लेट हो रही हैं. अस्पतालों में मरीज बढ़ गए हैं.
लेकिन सवाल यह है कि इतने सालों के बाद भी सरकार और सरकारी सिस्टम क्यों लाचार है? पर्यावरण विशेषज्ञ और CSE (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट) की रिपोर्ट्स क्या कहती हैं? आइए विस्तार से समझते हैं.
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2025-2026 सर्दी में प्रदूषण की स्थिति
AQI का ट्रेंड: अक्टूबर 2025 से प्रदूषण बढ़ना शुरू हुआ. नवंबर में पीक पर पहुंचा, जहां AQI 400-500 (Severe) से ऊपर रहा. दिसंबर में थोड़ा कम हुआ, लेकिन जनवरी 2026 में फिर बढ़ गया. 15-16 जनवरी को AQI 343-354 (Very Poor), 17-18 को 400-439 (Severe) और 19 जनवरी को 418-665 (Hazardous) तक. पूरे साल दिल्ली में कोई 'अच्छा' (Good) AQI वाला दिन हीं रहा.

PM2.5 और अन्य प्रदूषक: सालाना PM2.5 औसत 96 µg/m³ रहा, जो WHO के सुरक्षित स्तर (5 µg/m³) से 19 गुना ज्यादा. NO2 (नाइट्रोजन डाइऑक्साइड) और CO (कार्बन मोनोऑक्साइड) जैसे गैस भी बढ़े – CSE की रिपोर्ट के मुताबिक, NO2 ट्रैफिक पीक टाइम में ज्यादा और CO 30+ दिनों में स्टैंडर्ड से ऊपर.
मौसम की भूमिका: IMD के अनुसार, जनवरी 2026 में ठंडी लहर (Cold Wave), कम हवा की गति (
GRAP का क्रियान्वयन: GRAP (Graded Response Action Plan) स्टेज-3 और 4 लागू हुए – निर्माण बंद, BS-III/IV डीजल वाहन प्रतिबंधित, ट्रक एंट्री पर रोक, ऑफिस में 50% स्टाफ, स्कूल हाइब्रिड. लेकिन असर कम रहा क्योंकि मौसम ने साथ नहीं दिया और उल्लंघन ज्यादा हुए.
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मुख्य कारण: क्यों कंट्रोल नहीं हो रहा प्रदूषण?
CSE की दिसंबर 2025 रिपोर्ट Toxic Cocktail of Pollution during Early Winter in Delhi-NCR और अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि समस्या अब पराली जलाने से ज्यादा लोकल स्रोतों से है. 2025 में पराली जलाना 2021 से 77.5% कम हुआ. दिल्ली के PM2.5 में इसका योगदान कम हो गया (पीक पर 22% से कम, ज्यादातर
वाहन उत्सर्जन (Vehicular Emissions): CSE रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के PM2.5 का 51% वाहनों से आता है. दिल्ली में 1 करोड़+ वाहन हैं, जो सालाना बढ़ रहे हैं. पुराने BS-III/IV डीजल वाहन अभी चल रहे. ट्रैफिक से NO2 और CO जैसे जहरीले गैस बढ़ते हैं – CSE का कहना है कि ट्रैफिक जाम और पीक ऑवर्स में NO2 ज्यादा रहता है. ORF (Observer Research Foundation) रिपोर्ट में भी वाहन मुख्य कारण बताए गए.

घरेलू और बायोमास जलाना (Residential and Biomass Burning): 13% PM2.5 घरेलू स्रोतों से, जैसे कचरा जलाना, रोडसाइड आग तापना इनसे बढ़ता है. सर्दियों में लोग गर्मी के लिए कचरा या लकड़ी जलाते हैं, जो स्मॉग बढ़ाता है. CSE की रिपोर्ट कहती है कि स्टबल बर्निंग कम होने के बाद भी स्मॉग बढ़ रहा है, क्योंकि बायोमास बर्निंग मुख्य ड्राइवर है.
उद्योग और निर्माण (Industries and Construction): उद्योगों से 11%, निर्माण से 7% PM2.5 मिलता है. उसके बाद रोड डस्ट 4%, एनर्जी सेक्टर 5%, कचरा जलाना 5% से मिलता है. NCR के जिलों से 32.8% प्रदूषण आता है, अन्य जिलों से 25.8%. निर्माण से धूल और इंडस्ट्री उत्सर्जन साल भर चलते हैं.
क्षेत्रीय और मौसमी कारक (Regional and Meteorological Factors): 65% PM2.5 बाहर से आता है (NCR और पड़ोसी राज्य). उत्तर-पश्चिमी हवाएं (Northwesterly Winds) पाकिस्तान-अफगानिस्तान से धूल लाती हैं. सर्दियों में कम हवा, कम तापमान और इनवर्शन से प्रदूषक जमा हो जाते हैं. CSE कहती है कि लंबे समय में PM2.5 बढ़ रहा है, NO2 और CO के साथ – जो वाहनों और जलाने से आते हैं.
अन्य कारक: 2025 में ग्रीन पटाखों से भी AQI खराब रहा. रेगिस्तानी धूल और पड़ोसी राज्यों से बायोमास बर्निंग की वजह से प्रदूषण फैलता है.
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सिस्टम क्यों लाचार है? विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण विशेषज्ञ और रिपोर्ट्स बताते हैं कि समस्या जानी-पहचानी है, लेकिन कार्रवाई कमजोर...
CSE की रिपोर्ट्स (2025-2026): अनुमिता रॉयचौधरी कहती हैं कि पराली अब कम है, लेकिन लोकल स्रोत मजबूत हो गए. नीतियां हैं, लेकिन लागू नहीं हो रही – GRAP उल्लंघन NCR में आम है. रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली का प्रदूषण 'बहुत खराब' से 'गंभीर' रहता है, भले पराली कम हो।. NO2 और CO जैसे 'टॉक्सिक कॉकटेल' पर ध्यान कम है. 2024 में PM2.5 3.4% बढ़ा. NCR के छोटे शहरों (जैसे बहादुरगढ़) में स्मॉग ज्यादा, क्योंकि 65% प्रदूषण बाहर से.
अन्य विशेषज्ञ: ORF रिपोर्ट में कहा गया कि स्टबल बर्निंग अब मुख्य नहीं, लोकल उत्सर्जन जैसे वाहन, कचरा जलाना, निर्माण मुख्य हैं. प्रदूषण साल भर की समस्या है, सर्दी में ज्यादा नजर आती है. सतही उपाय (जैसे पानी छिड़कना) काम नहीं करते. NCAP (National Clean Air Programme) का 2026 तक 40% कमी का लक्ष्य मुश्किल, क्योंकि फंड्स का 64% धूल पर, सिर्फ 12% वाहनों पर और
स्वास्थ्य विशेषज्ञ: डॉ. देबाशीष चौधरी कहते हैं कि प्रदूषण से माइग्रेन जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याएं बढ़ रही हैं – दिल्ली-NCR में माइग्रेन दर 25.2% (ग्लोबल 14.7%). लंबे समय का एक्सपोजर माइग्रेन थ्रेशोल्ड कम करता है. नए केस बढ़ते हैं. WHO मानकों से 20 गुना ज्यादा PM2.5 से दिल, फेफड़े, स्ट्रोक का खतरा. यह पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है.

सिस्टम की कमियां
समाधान: क्या किया जा सकता है?
विशेषज्ञ तत्काल और लंबे समय के उपाय सुझाते हैं...
दिल्लीवासी हर साल इस गैस चैंबर में फंसते हैं. CSE और विशेषज्ञ चेताते हैं – अगर अब समन्वित, सख्त और स्थायी कदम नहीं उठाए, तो स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और जीवन सब खतरे में पड़ जाएगा. 2026 में बदलाव की उम्मीद है, लेकिन कार्रवाई जरूरी.