जब पृथ्वी पर लोग चंद्र ग्रहण देखते हैं तो चंद्रमा काला होता नजर आता है. यानी परछाई आती है. धीरे-धीरे लाल रंग का दिखने लगता है. लेकिन अगर आप चंद्रमा पर खड़े हों तो यह घटना पूरी तरह अलग नजर आती है. वहां से यह एक लंबा सूर्य ग्रहण जैसा लगता है जिसमें पृथ्वी सूरज को पूरी तरह ढक लेती है.
सामान्य सूर्य ग्रहण पृथ्वी पर कुछ मिनट ही रहता है लेकिन चंद्रमा से यह कई घंटों तक चलता है, क्योंकि पृथ्वी सूरज से बहुत बड़ी दिखती है. इस दौरान पृथ्वी के वायुमंडल की वजह से सूरज की रोशनी मुड़कर आती है. पृथ्वी के चारों ओर एक लाल घेरा बन जाता है जो चंद्रमा को हल्की लाल रोशनी देता है.
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यही वजह है कि पृथ्वी पर चंद्रमा लाल दिखता है. यह अनोखा नजारा वैज्ञानिकों को चंद्रमा की सतह और वातावरण को बेहतर समझने में मदद करता है. आज 3 मार्च 2026 को होने वाले चंद्र ग्रहण के दौरान चंद्रमा पर यह सब कुछ कई घंटों तक चल रहा है.
From the Moon, a lunar eclipse looks like a total solar eclipse, but it lasts a LOT longer. For NASA's Lunar Reconnaissance Orbiter, that means the team has to plan carefully for the 4 hours that the spacecraft — and its solar panels — will be in the dark and the cold.
— NASA Solar System (@NASASolarSystem) March 2, 2026
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LRO क्या है और यह चंद्रमा का अध्ययन कैसे करता है?
नासा का लूनर रेकॉनिसेंस ऑर्बिटर यानी LRO एक स्पेसक्राफ्ट है जो 2009 में लॉन्च किया गया था. तब से लगातार चंद्रमा का चक्कर लगा रहा है. यह अब तक का सबसे लंबे समय तक काम करने वाला चंद्रमा ऑर्बिटर है. LRO हाई क्वालिटी वाली तस्वीरें लेता है. चंद्रमा की सतह का डिटेन नक्शा बनाता है. तापमान मापता है. रेडिएशन का अध्ययन करता है.
पानी और बर्फ जैसी चीजों की खोज करता है. LRO ने भारतीय विक्रम लैंडर के क्रैश साइट की भी तस्वीर ली थी और कई अन्य मिशनों को मदद पहुंचाई है. इसने अब तक लाखों तस्वीरें भेजी हैं जो चंद्रमा के गड्ढों, पहाड़ों और मैदानों को बहुत साफ दिखाती हैं. LRO का डेटा भविष्य के मिशनों जैसे आर्टेमिस के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे लैंडिंग साइट चुनने में मदद मिलती है.
16 साल से ज्यादा समय से यह मिशन चंद्रमा के राज खोल रहा है. LRO ने चंद्रमा की सतह का 98 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा मैप कर लिया है. अपोलो लैंडिंग साइट्स की बेहतरीन तस्वीरें ली हैं.

चंद्र ग्रहण के दौरान LRO को क्या समस्या आती है?
LRO सौर पैनलों से बिजली लेता है जो सूरज की रोशनी से चार्ज होते हैं. चंद्रमा की एक सामान्य परिक्रमा में यह लगभग एक घंटे तक अंधेरे में रहता है लेकिन ग्रहण के समय यह 4 घंटे या उससे ज्यादा समय तक सूरज की रोशनी से दूर रहता है.
इतने लंबे समय तक अंधेरे में रहने से इसके सोलर पैनल बिजली नहीं बना पाते और बैटरी तेजी से खाली होने लगती है. साथ ही ठंड बहुत बढ़ जाती है जो स्पेसक्राफ्ट के उपकरणों के लिए खतरनाक हो सकती है.
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बैटरी पुरानी होने के कारण अब पहले जितनी अच्छी नहीं है इसलिए सावधानी जरूरी है. अगर बिजली खत्म हो गई तो स्पेसक्राफ्ट बंद हो सकता है. दोबारा चालू करना मुश्किल हो सकता है. नासा की टीम के लिए यह 4 घंटे का अंधेरा और ठंडा समय सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि LRO पूरी तरह सूरज की रोशनी पर निर्भर है.

LRO टीम ने ग्रहण से निपटने की क्या योजना बनाई है?
LRO की टीम ने इस समस्या का हल निकाल लिया है. ग्रहण से पहले वे स्पेसक्राफ्ट को पहले से गर्म कर लेते हैं. बैटरी को पूरी क्षमता से चार्ज कर लेते हैं. फिर ग्रहण के दौरान विज्ञान संबंधी उपकरणों और मुख्य एंटीना को अस्थाई रूप से बंद कर देते हैं ताकि बिजली बच सके. इससे केवल जरूरी सिस्टम चालू रहते हैं.
मुख्य एंटीना बंद होने से संचार भी कम हो जाता है लेकिन यह जरूरी है ताकि बैटरी खाली न हो. इस प्लानिंग से LRO ग्रहण के बाद दोबारा सामान्य रूप से काम शुरू कर पाएगा. टीम हर छोटी-छोटी बात का ध्यान रखती है क्योंकि चंद्रमा पर कोई भी गलती महंगी पड़ सकती है. इस तरह LRO को बचाने के लिए साइंस इंस्ट्रूमेंट्स और मुख्य एंटीना को बंद करके पावर बचाई जाती है ताकि ग्रहण खत्म होने के बाद स्पेसक्राफ्ट को फिर से ऑनलाइन ला सकें.