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पिठोरी अमावस्या व्रत कथा (Pithori Amavasya Vrat Katha)

पिठोरी अमावस्या व्रत कथा

पिठोरी अमावस्या का व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से रखा जाता है. मान्यता है कि व्रत और कथा सुनने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं. माता दुर्गा और 64 योगिनियों की पूजा से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है.

पिठोरी अमावस्या व्रत कथा
पिठोरी अमावस्या व्रत कथा

प्राचीनकाल में एक परिवार में सात भाई रहते थे. सभी भाइयों की शादी हो चुकी थी. सभी भाइयों के अपने-अपने बच्चे भी थे. परिवार में सुख-शांति थी, लेकिन बच्चों की सलामती को लेकर घर की महिलाओं के मन में हमेशा चिंता रहती थी. पिठोरी अमावस्या के दिन सातों भाइयों की पत्नियों ने अपनी संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से व्रत रखने का फैसला किया. 

 

सबसे बड़े भाई की पत्नी ने भी पूरे श्रद्धा भाव से व्रत किया. लेकिन व्रत के बाद उसके एक बेटे की मृत्यु हो गई. उसकी मां इस घटना से बहुत आहत हुई.

 

अगले वर्ष उसने फिर संतान की कुशलता के लिए व्रत रखा, लेकिन इस बार भी उसके एक बेटे की मृत्यु हो गई. इसी तरह हर साल व्रत रखने के बाद उसके एक-एक बेटे की मृत्यु होती रही. सातवें वर्ष तक वह अपने सातों बेटों को खो चुकी थी. अपने बच्चों की मौत का दुख वह मां सह नहीं पा रही थी. इस बार उसने अपने मृत बेटों के शवों को छिपा दिया. उसी समय गांव की देवी मां पोलेरम्मा वहां लोगों की रक्षा के लिए भ्रमण कर रही थीं. उनकी नजर उस दुखी महिला पर पड़ी. देवी ने उसकी परेशानी जानने के लिए उससे पूछा कि वो क्यों दुखी है.

 

महिला ने रोते हुए अपनी पूरी कहानी देवी को सुनाई. उसकी पीड़ा देखकर मां पोलेरम्मा का हृदय द्रवित हो गया. उन्होंने उसे एक उपाय बताया. देवी ने कहा कि जिन-जिन जगहों पर उसके बेटों का अंतिम संस्कार किया गया था, वहां जाकर हल्दी छिड़के. मां ने देवी के बताए अनुसार हर उस स्थान पर हल्दी चढ़ाई और फिर अपने घर लौट आई. घर पहुंचकर उसने जो देखा, उससे उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए. उसके सातों बेटे जीवित थे.

 

मां के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था. उसने देवी को धन्यवाद दिया और इस घटना को गांव की दूसरी महिलाओं को बताया. इसके बाद गांव में माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से पिठोरी अमावस्या का व्रत रखने लगीं. 

 

इसी मान्यता के कारण पिठोरी अमावस्या को संतान की मंगलकामना से जुड़ा महत्वपूर्ण दिन माना जाता है. इस दिन आटे से 64 देवियों की आकृतियां बनाकर पूजा करने की परंपरा भी बताई जाती है. व्रत रखने वाली महिलाएं श्रद्धा से देवी का स्मरण करती हैं और अपने बच्चों के स्वस्थ, सुरक्षित और खुशहाल जीवन की प्रार्थना करती हैं.

 

कथा पढ़ने के बाद भक्त चाहें तो माता दुर्गा की आरती या विष्णुजी की आरती तथा पितृ देव की आरती कर सकते हैं.

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