मां दुर्गा की आराधना का पावन पर्व शारदीय नवरात्र इस बार 11 अक्टूबर से शुरू होगा. 19 अक्टूबर को महानवमी के साथ ही शारदीय नवरात्र समाप्त हो जाएंगे. नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि पर कलश स्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा होती है. फिर नौ दिन की इस पवित्र अवधि में मां दुर्गा के पावन स्वरूपों की पूजा, दुर्गा सप्तशती का पाठ, व्रत और साधना की जाएगी. आइए शारदीय नवरात्र की तिथि और घटस्थापना का शुभ मुहूर्त आपको बताते हैं.
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल 11 अक्टूबर को चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग रहेगा. इस दिन कलश स्थापना का श्रेष्ठ मुहूर्त कलश स्थापना का पहला शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 32 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 26 मिनट तक रहेगा. आप चाहें तो अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापना कर सकते हैं. इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक बताया गया है.
हालांकि, मुहूर्त में स्थानीय स्तर पर थोड़ा अंतर हो सकता है. इसलिए श्रद्धालुओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करने की सलाह दी जाती है. नवरात्रि के पहले दिन घर में विधि-विधान से कलश स्थापना कर मां दुर्गा की आराधना शुरू की जाती है. पहले दिन देवी के स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी. श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार, व्रत, जप, पाठ और साधना करते हैं. नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा का विधान बताया गया है.
महाअष्टमी तिथि कब है?
शारदीय नवरात्र में 18 अक्टूबर दिन रविवार को दुर्गा अष्टमी का व्रत रखा जाएगा. इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है. श्रद्धालु व्रत रखने के साथ माता की पूजा और कन्या पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं. बहुत सारे लोग महा अष्टमी तिथि पर कन्या पूजन करते हैं.
महानवमी तिथि कब है?
19 अक्टूबर दिन सोमवार को नवमी तिथि का व्रत और पूजा किए जाएंगे. अष्टमी तिथि की तरह नवमी तिथि पर भी कन्या पूजन किया जाता है. इस दिन छोटी-छोटी कन्याओं और एक बटुक यानी छोटे बालक को घर आने के लिए आमंत्रित करते हैं. फिर उन्हें हलवा, पूरी, चने के प्रसाद का भोग लगता है. महानवमी की पूजा के साथ ही नवरात्र समाप्त हो जाते हैं. इसके बाद दशमी तिथि पर व्रत का पारण किया जाता है.
हाथी पर आएंगी मां दुर्गा
इस वर्ष देवी दुर्गा के हाथी पर आगमन की धार्मिक मान्यता बताई गई है. परंपराओं में हाथी को समृद्धि, स्थिरता और ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है. इसी आधार पर हाथी पर देवी के आगमन को अच्छी वर्षा, कृषि में उन्नति, सुख-समृद्धि और खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है.