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Garud Puran: अंतिम संस्कार के बाद पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखना चाहिए? जानें इसका रहस्य

Garud Puran: 18 महापुराणों में से एक गरुड़ पुराण में वैराग्य, धर्म और मृत्यु के बाद की स्थितियों का विस्तृत वर्णन मिलता है. दाह संस्कार के बाद पीछे न देखना और बच्चों को श्मशान न ले जाने के पीछे आत्मा के मोह व उनकी मानसिक स्थिति से जुड़ी कई अहम मान्यताएं हैं.

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गरुड़ पुराण (Photo: ITG)
गरुड़ पुराण (Photo: ITG)

Garud Puran: जब मृत शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है, तो वैदिक मंत्रों के साथ उसे अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है. शास्त्रों में बताया गया है कि अग्नि में भस्म होने के बाद शरीर जिन पंचतत्वों से बना है, वह उन्हीं पंचतत्वों में वापस मिल जाता है.

अक्सर श्मशान में दाह संस्कार करने के बाद लौटते समय लोगों को हिदायत दी जाती है कि वे पीछे मुड़कर न देखें और सीधे घर की ओर जाएं. क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है और इसके पीछे क्या वजह है? 

गरुड़ पुराण को 18 महापुराणों में से एक माना जाता है. इसमें व्यक्ति को सदाचार, नीति, यज्ञ, जप, वैराग्य और धर्म से जुड़ी कई बातें बताई गई हैं. साथ ही मृत्यु के नियमों और मृत्यु के बाद की स्थिति का भी वर्णन मिलता है. इसमें दाह संस्कार से जुड़े नियमों का भी उल्लेख किया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दाह संस्कार के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए. इसके पीछे आत्मा के मोह और सांसारिक लगाव से जुड़ी मान्यताएं बताई जाती हैं.

गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, शरीर नष्ट होने के बाद भी आत्मा नष्ट नहीं होती. मृत्यु के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर धारण करती है और अपने कर्मों के अनुसार आगे की यात्रा करती है. समय आने पर वह दूसरा शरीर धारण करती है.

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मान्यता है कि दाह संस्कार के दौरान आत्मा अपने शरीर को भस्म होते हुए देखती है. जब शरीर पूरी तरह अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है, तो यह आत्मा के लिए इस बात का संकेत माना जाता है कि अब उसका इस शरीर और सांसारिक जीवन से संबंध समाप्त हो चुका है. उसका इस शरीर पर अब कोई अधिकार नहीं है और उसे अपने आगे के सफर की ओर बढ़ना चाहिए.

संसार के मोह और रिश्तों का लगाव छोड़ना आसान नहीं होता. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यही मोह आत्मा की आगे की यात्रा में बाधा बन सकता है. इसलिए अंतिम संस्कार के बाद पीछे मुड़कर न देखने की परंपरा को आत्मा को सांसारिक मोह से दूर करने से जोड़कर देखा जाता है.

मान्यता है कि शरीर छोड़ने के बाद भी जीवात्मा का अपने परिजनों के प्रति मोह तुरंत खत्म नहीं होता. वह अपने प्रियजनों को देखकर दुखी या प्रसन्न हो सकती है. ऐसे में पीछे मुड़कर देखने को आत्मा के प्रति अपने लगाव को बनाए रखने का संकेत माना जाता है.

इसी वजह से श्मशान से लौटते समय पीछे न देखने की परंपरा है. इसके पीछे भाव यह माना जाता है कि परिजन आत्मा को यह संदेश देते हैं कि अब इस संसार से उसका संबंध पूरा हो चुका है. अब उसे अपने मोह को छोड़कर आगे की यात्रा पर बढ़ना चाहिए.

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एक अन्य मान्यता यह भी है कि शरीर जलने के बाद आत्मा अपने परिजनों के पीछे-पीछे घर तक आने की कोशिश कर सकती है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर देखता है, तो इसे आत्मा के लिए अपने परिजनों के प्रति मोह का संकेत माना जाता है. हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं, इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

इन्हीं धार्मिक मान्यताओं के कारण श्मशान से लौटते समय पीछे मुड़कर न देखने की परंपरा चली आ रही है. बच्चों को श्मशान न ले जाने की परंपरा भी कई जगह इसी तरह की मान्यताओं और उनकी मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए बताई जाती है.

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