मैंने जीवन में कभी कुछ गलत नहीं किया. किसी का दिल नहीं दुखाया. किसी के साथ बेईमानी-ठगी नहीं की. फिर भी गरीबी मेरा पीछा नहीं छोड़ती. मेहनत ज्यादा और लाभ बहुत कम है. अक्सर आपने कई लोगों की जुबां से यह शिकायत सुनी होगी. जबकि कुछ लोग बेईमानी और दो नंबर का काम करके भी मौज में रहते हैं. गलत काम के बावजूद धन, सुख-समृद्धि और सारे ऐशोआराम उनके पास हैं.
ऐसे में मन एक सवाल उठता है कि क्या मां लक्ष्मी की कृपा केवल अच्छे कर्म करने वालों पर ही होती है? यदि ऐसा है तो अपराधियों, ठगों और बेईमान लोग भी इतने धनी कैसे हो जाते हैं? इसका जवाब जानने के लिए आपको लक्ष्मी और धन के स्वरूप के बीच अंतर को समझना होगा. मां लक्ष्मी को केवल धन या संपत्ति की देवी नहीं माना गया, बल्कि वे ऐश्वर्य, समृद्धि, सौभाग्य, वैभव और मंगल का प्रतीक हैं. धन का होना और लक्ष्मी का स्थायी वास होना दोनों अलग-अलग बातें हैं.
धन आना और धन टिकना अलग बात
धन की प्राप्ति व्यक्ति के पूर्वकर्म, वर्तमान प्रयास, व्यापारिक कौशल, अवसर और परिस्थितियों से भी जुड़ी होती है. हर धनी व्यक्ति का चरित्र आदर्श हो, यह जरूरी नहीं. कई बार व्यक्ति अपनी बुद्धि, चतुराई और योजनाओं का इस्तेमाल गलत कार्यों में करके भी बहुत धन इकट्ठा कर लेता है. लेकिन धन का मिलना उसके कर्मों को धर्मसम्मत नहीं बना सकता.
यही कारण है कि शास्त्रीय चिंतन में धन के साथ उसके कमाने के तरीके और उपयोग का भी बड़ा महत्व है. धर्मसम्मत तरीके से अर्जित धन परिवार में सुख, संतोष और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला माना गया है. जबकि छल-कपट से प्राप्त संपत्ति भय, विवाद, अपराधबोध और अस्थिरता का कारण बन सकती है.
कर्मों का फल तुरंत दिखाई नहीं देता
गीता का कर्म सिद्धांत भी इस विषय को समझाता है. व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता है. लेकिन प्रत्येक कर्म का परिणाम तुरंत दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं. किसी गलत तरीके से धन अर्जित करने वाले व्यक्ति को तत्काल आर्थिक सफलता मिल सकती है. लेकिन इससे उसके कर्म उचित सिद्ध नहीं हो जाते. उसके कर्मों के सामाजिक, नैतिक और कानूनी परिणाम अलग-अलग समय पर सामने आता हैं. इसलिए आज आपको जो मिला है पता, नहीं किन जन्मों के कर्म है. और आज जो आप कर्म कर रहे हैं, वो आगे के लिए संचित कर रहे हैं.
इसलिए अपराधियों और ठगों के पास धन देखकर यह नहीं सोचना चाहिए कि मां लक्ष्मी उनसे प्रसन्न हैं. वास्तविक लक्ष्मी कृपा का अर्थ केवल तिजोरी भरना नहीं, बल्कि धन के साथ सद्बुद्धि, संतोष, परिवार में प्रेम, समाज में सम्मान और जीवन में शांति का होना भी है. धन का वास्तविक सौभाग्य तभी है, जब उसे कमाने का रास्ता भी सही हो और उसका उपयोग भी शुभ कार्यों में किया जाए.