
राजस्थान के पाली जिले के बाड़सा गांव में पशु प्रेम, गौ संरक्षण और लोक संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला. गांव की सामूहिक सहमति से एक बछड़ा और बछड़ी का विवाह पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराया गया. इस अनोखे आयोजन में सैकड़ों ग्रामीणों ने उत्साह के साथ भाग लिया और पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल रहा.
विवाह समारोह की शुरुआत 'पाट बिठाने' की रस्म से हुई. बछड़ा और बछड़ी को चुनरी ओढ़ाकर तिलक लगाया गया व विधि-विधान से गणपति पूजन, पीपल और बरगद के वृक्ष की पूजा की गई. महिलाओं ने मंगल गीत गाकर शुभ अवसर को पारंपरिक रंग दिया. दूसरे दिन देर रात बैंड-बाजों के साथ बंदोली निकाली गई. यजमान रथ में पीपल और बरगद का पौधा लेकर बैठे, जबकि सजे-धजे ट्रैक्टर में बछड़ा और बछड़ी को बैठाया गया. शोभायात्रा के दौरान महिलाएं लोकगीतों पर नृत्य करती हुईं पूरे आयोजन का आकर्षण बनी रहीं.

विवाह पर पूरे गांव के लिए हुआ भोज का आयोजन
तीसरे दिन बछड़े को यजमान की गोद में बैठाकर भव्य निकासी निकाली गई, जो गांव के मंदिर पहुंची. वहां तोरण की रस्म के बाद वेद मंत्रों के बीच बछड़ा और बछड़ी के फेरे कराए गए. फिर बछड़े को साफा पहनाया गया, जबकि बछड़ी को चुनरी ओढ़ाई गई. विवाह के दौरान कन्यादान के रूप में हजारों रुपये की राशि एकत्र हुई, जिसे गौशाला में गायों की सेवा, संरक्षण और चारे की व्यवस्था के लिए दान कर दिया गया. इसके बाद सभी ग्रामीणों के लिए सामूहिक भोज का आयोजन किया गया और अंत में बछड़ा-बछड़ी की प्रतीकात्मक विदाई की गई.
ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह के आयोजन केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि पशुपालन, गौ संरक्षण और भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से किए जाते हैं. उनका मानना है कि पशुधन गांवों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और ऐसी परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं.